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पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

Padmavat with Hindi Commentary

मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा

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पृष्ठ 95

६४ पद्मावत ।
तस कुछ कहा न जाय निवेदा । अर्जुन बान राहु को बेधा ॥
दो० जनहुँ लङ्क सब लूसी, हनू बिधांसी बार ।
जाग उठ्यों अस देखत, कहु सखि स्वप्न विचार ॥
सखी सो बोली स्वप्न विचारी । काल्ह जो गई देवें करबारी ॥
पूजि मनायो बहुत बिनौती । परसन्र आय भयो तुम्हराती ॥
सूरज पुरुषँ चांद तुम रानी । अस वर देव मिलावै आनी ॥
पढ़ों खण्ड कर राजा कोई । सो आवै बर तुम कहँ होई ॥
कुछ पुनि जूझ लाग तुम रामा । रावण सेते होयँ संग्रामा ॥
चांद सूर्य सों होय बिवाहू । वारेबिधां सब बेधै राहू ॥
जस ऊषौ कहँ अनिरुध मिला । मेट न जाय लिखा परैवला ॥
दो० सुख सुहाग है तुम कहँ, पान फूल रस भोग ।
आजकाल्हभा चाहै, अस सपने का संयोग ॥
खण्ड सत्रहवां सतीखण्ड राजा रतनसेन ॥
किये बसन्त पद्मावत गई । राजा तब बसन्त सुध भई ॥
जो जागा न बसन्त न बौरी । ना सो खेल न खेलनहारी ॥
नावहिं की वह रूप सुहाई । गइ हिराइ पुनिदृष्टि १६ न आई ॥
फूल झड़ी सूखी फुलवारी । दृष्टि १७ परी उकटी सब छौरी ॥
कै यह बसत बसन्त उजारा । गा सो चांद अथवा ले तारा ॥
अबतेंहिबिनजगै भा अँधकूपी । वह सुखछांह जराहखधूपा ॥
बिरहदेंवां को जरत सिरावा । को पीतम सों करै मिलावा ॥
दो० हिये २२ देख जो चन्दन, मिलके लिखा विछोहैं ।
: लूटना १ हनुमानजी २ दरवाज़ा तोड़ना ३-११ महादेव के मंडफ ४
आजज़ी ५ खुश ६ मर्द ७ खाविन्द ८-६ लड़ाई १० नाम लड़की १२ ज़बर-
दस्त १३ ताबीर १४ बाग १५ निगाह १६-१७ जलजाना १८ दुनियां १६
कुवां २० आग २१ दिल २२ जुदाई २३ ॥