सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

Padmavat with Hindi Commentary

मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा

DevanagariAwadhipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 50, कुल 318 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 50

॥ पद्मावत ॥ ५६
पुहुपँ सुगन्ध करहि सब आसा। मगैं हरका थलेइ हम पासा॥
अधरें दशनें पर नासकँ शोभा। दाड़िमँ देखि लुभान मन लोभा॥
खंजनै वेहिदिशँ केलि कराहीं। वेहिँ वहर सको पाव कोउ नाहीं॥
दो० देखि अमी रस अधरनहूँ, भयो नास को कीरै।
पवनै बासु पहुँचावे, आश्रम छाडन तीरे॥
अधरै सुरंग अमी रस भरे। बिम्बेँ सुरँग लाज बन फरे॥
फूल दुपहरी जानहु रातैं। फूल झरहिं जो जो कहि बाता॥
हीरा लीन्ह सुविद्रुम धारा। बिहँसत जग तैं होय उजियारा॥
भइ मँजीठ बातहिं रँग लागैं। कुसुम रंग थिरैं रहैन आगैं॥
वहिके अधरैं अँमी भर राखे। अबहिं अछूति न काहूं चाखे॥
मुख तम्बोलैं धार नहिं रसा। केहि मुख योग सो अमृत वसा॥
राता जगत देख रँग राँती। रुधिरैं भरी आद्यहिं बिहँसाँती॥
दो० अमी अधर अस राजा, सब जगै आस करेइ।
केहिका कमल बिकासौ, को मधुकरै रस लेइ॥
दशनैं चौक बैठे जनु हीरा। औ बिच बिच रँग श्याम गँभीरा॥
जनु भादौं निशि दामिनि दीसी। चमक उठै तसत ही बत्तीसी॥
वह सो ज्योति हीरा उपराहीं। हीरा वेहिसों तेहि परछाहीं॥
जेहि दिन दशनैं ज्योति निरमई। बहुतै ज्योति ज्योति दा भई॥
रवि शशिन खत दीन्ह वह ज्योती। रतनैं पदारथ माणिक मोती॥
जेहि तेहि विहँसि सभामहँ हँसी। तहँ तहँ छिटक ज्योति परकँसी॥
फूल १ शायद २ बोलना ३ होंठ ४-११-१६-२४-३० दात ५-३४-३६
नाक ६-१२ अनार ७ ममोला ८ तरफ ६ अमृत १०-२५ तोता १३ हवा १४
किनारा १५ कुन्दरू १७ लाल १८-२७ मूंगा १६ हँसना २०-२६-४४ दुनियां
२१-३१ लाख २२ क़ायम २३ पान २४ खून २८ खिलना ३२ संवरा ३३ बहुत
काला ३५ राति ३६ बिजुली ३७ देख पड़ना ३८ बनाई गई ४० सूर्य ४१
चांद ४२ जवाहिऱात ४३ उजियारा ४५॥