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पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

Padmavat with Hindi Commentary

मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा

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पृष्ठ 256

पद्मावत । २५५
उपजी आग आग जस बोई । अब मतैं छीन आननहिं होई ॥
भा त्योहार जो चांचर जोरी । खेल फाग अब लाई होरी ॥
समन्द फागमेलैं शिर धूरी । कीन्ह जो शाकाँ चाही पूरी ॥
चन्दन अगर मलयगिरि काढ़ा । घर घर कीन्ह सरौ रच ठाढ़ा ॥
जून्हरें कहँ साजा रनवासू । जेहिंसतहियें कहां तेहिआंसू ॥
दो० पुरुषन खड्गँ सँवारी चन्दन खौरीं देह ।
मेहरिनि सेंदुर मेला चहहिं भई जर खेहँ ॥
आठ वरष गढ़ छेंका रहा । धन सुलतान कि राजामहा ॥
आय शाह अँवरेंउँ जोलाई । फरे झरे पै गढ़ नहिं पाई ॥
हठ जोरी तब जून्हर होई । पद्मिनी पावन मिन्नतें सोई ॥
यहि बिधि ढील दीन्ह तबताई । देहली की अरदाँसैं आई ॥
पछम हरवें दीन्ह जो पीठी । सो अब चढ़ा सौंहैं कैदीठी ॥
जेहिमुइँमाथगगनें शिरलागा । थाने उठे आवसब भागा ॥
वहां शाँहँ चितोरगढ़ छावा । यहां देश अब भयो परावा ॥
दो० परत दृष्टि जेहि पंथै में, बाढ़ा वेर बबूर ।
निशि अँधियारीजायतब, वेगैं उठै जो सूरै ॥
सुनाशाह अरदासँ जो पढ़ी । चिन्ता आन आनचिंतचढ़ी ॥
तब आगो मन चीते कोई । जो आपन चेता कुछ होई ॥
मन झूठा जिव हाथ पराई । चिन्ता एक भई दुइ ठाई ॥
गढ़ सो उरझ जाय तब छूटा । होय मिलाव कि सोगढ़ टूटा ॥
डरपोक १ फागखेलों २ बहादुरी ३ चिता ४ मौत ५ दिल ६ मर्दों ने
तलवारली ७ औरत ८ खाक ९ चारा १० शाह समझा कि वे मरे ११ मुश-
किल १२ अरज़ी १३नाममुलुक १४ सामने १५ आसमान १६ अलाउद्दीन १७
निगाह १८ राह १६ रात २० जल्द २१ सूर्य २२ अरज़दास्त २३ ॥