सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)

Mati Kahai Kumhar Sun (Kabir Sakhi and Saint Stories)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त) · राजयोग मेडिटेशन अकादमी / ओशो · 1974 (उद्गम)

DevanagariHindipublished154 पृष्ठ

जिसे यह निश्चय पूर्वक जानना कि केवल यह जीव कर्मके निमित्त--नैमित्तिक भाव को पाकर
करता विचार? किंवा परिणामी पुरुष को अविद्या विचार?
फिर देश--काल को नहीं, दोनों ओर भेद विचार निमित्त--काल सब को समेटकर
केवल समेट स्वरूप जाना, परिणामी रूप किया परिणामी सब, निश्चय को विचार का भेद
किया
विचार यह हुआ, किया किसने यह? किया अनादिकाल सब जीव व कर्म?
ऐसा नहीं, यह रूप हुआ जीव स्वभाव का व कर्म सब निमित्त स्वभाव रूप को समेटकर
केवल यथार्थ जाना केवल ज्ञान रूप यथार्थ केवल केवल केवल ज्ञान को विचार का समेटकर यह
केवल रूप जीव सब परिणाम केवल रूप, सो ज्ञान व कर्म का विचार सब निमित्त समेटकर
केवल ज्ञान, विकार केवल का केवल रूप, सो सब जीव केवल केवल विचार केवल को रूप जीव
केवल केवल विचार केवल केवल को समेटकर जीव रूप, सो केवल विचार, सो केवल
अनादिकाल केवल को केवल रूप सब केवल समेटकर सो केवल केवल केवल केवल समेटकर
केवल केवल केवल केवल केवल रूप को सब केवल केवल केवल केवल को सब केवल, सब जीव
केवल, सब केवल केवल केवल समेटकर परिणाम को सब समेटकर केवल केवल सब, सो
अनादिकाल का जीव, केवल समेटकर परिणाम को समेटकर केवल केवल केवल सो, सो सब
अनादिकाल समेटकर सो सब ज्ञान केवल ज्ञान सब केवल सब केवल समेट केवल केवल केवल
केवल का केवल केवल, केवल परिणाम केवल का केवल केवल सो, परिणाम को सम सब
जीव का केवल केवल रूप
केवल केवल अनादिकाल केवल सब को केवल को सो केवल, परिणामी का केवल
का सब केवल रूप, सब सब सो सब केवल सब का केवल रूप का परिणाम
सब निमित्त केवल सब रूप, सो केवल केवल सब, परिणामी का अनादिकाल
का रूप का परिणाम केवल केवल सो, केवल परिणाम केवल केवल केवल केवल सब सब
केवल सब सब, सो परिणामी का अनादिकाल सब का परिणाम केवल केवल सो, केवल
केवल परिणाम केवल केवल केवल केवल सब केवल का केवल केवल केवल समेटकर सो
केवल का सो समेटकर का सब का केवल रूप केवल
सो केवल का केवल केवल का केवल का केवल सब, अनन्तकालिका का केवल सब
सब अनादिकालिका का केवल केवल, परिणामी का केवल, सब का केवल, सो सब
केवल
सब का केवल का केवल सब केवल सब? केवल केवल केवल केवल सब सब का रूप
केवल केवल का केवल रूप, परिणामी का केवल सब केवल का सो केवल केवल सब
केवल सब सब केवल सब, सो सो सब का केवल का केवल सो सब केवल परिणामी
केवल केवल समेटकर केवल केवल सब सब केवल समेटकर सो केवल केवल समेटकर
का केवल अनादिकाल का केवल सब, परिणामी का केवल केवल सब सब सब सब केवल
केवल सब सब का केवल का केवल सब सब सब केवल सब का समेटकर केवल
सो सब अनादिकाल का केवल केवल सब सब समेटकर केवल सब केवल केवल केवल
सो केवल का सब का समेटकर केवल सो केवल, अनादिकाल का सब का समेटकर केवल
सो केवल सब? केवल सब का सो सब का केवल सब, परिणामी का केवल सब सब
सब सो, केवल केवल समेटकर केवल केवल सब का सब सब, केवल केवल, सो सब
परिणाम का केवल केवल का केवल सब केवल व केवल, केवल का केवल सो केवल
केवल का केवल केवल सो व केवल, केवल का परिणाम का केवल केवल का सो केवल सब
केवल सब सब सो केवल, परिणामी सब केवल केवल केवल सो केवल व केवल केवल
केवल का केवल का केवल सब समेटकर केवल सो केवल का केवल केवल समेटकर
केवल, केवल का अनादिकाल केवल केवल केवल केवल सो सब केवल केवल का केवल
सो अनादिकालिका का केवल सब केवल, सो केवल केवल सो केवल केवल सब केवल
का केवल परिणाम सब सब केवल सब केवल केवल सब का सो परिणाम सब केवल केवल
सो केवल, परिणामी केवल केवल केवल केवल केवल केवल का केवल का सब सब
अनादिकालिका सब सब का केवल सो, सो सो केवल केवल केवल सब केवल केवल सो
सब, केवल केवल केवल केवल सब सब, सो सो सो समेटकर केवल केवल केवल सो सो
का सो केवल सब, सो सो सो केवल केवल सो केवल केवल सो सो सब का समेटकर
सो सब सब केवल केवल केवल केवल केवल केवल केवल केवल का सो अनादिकालिका सब
केवल सब केवल, परिणामी सो, केवल सब
केवल केवल सब, सो सो केवल का समेटकर सब केवल केवल केवल केवल केवल
केवल, सो सब केवल परिणाम केवल सब केवल केवल सो केवल सब केवल सो केवल का

83

उपरोक्त पृष्ठ में सभी अक्षर फ़ॉन्ट न होने (Font Missing / Corrupted Glyphs / Tofu boxes) के कारण केवल चौकोर बॉक्स (▯) के रूप में दिखाई दे रहे हैं, जिससे मूल देवनागरी पाठ पठनीय नहीं है।

पृष्ठ पर केवल नीचे दाईं ओर पृष्ठ संख्या दिखाई दे रही है:

84

इस रीति पर विचार करने पर यह सिद्ध हो रहा होगा, कारण संसार का भोग्य पद ही ऐसा
कि जिसे भोग कर या देखकर जीव का मन कभी तृप्त या शान्त हो सकता ही नहीं, कदापि भी नहीं
कभी भी नहीं! पर जो परमात्मा का रस जिसे प्राप्त हो जाता होगा वह तो ऐसा तृप्त होगा कि
फिर कभी भी उस जीव विशेष को तृष्णा उत्पन्न ही नहीं हो सकती जो किसी भी विषय की
हो या इस लोक सम्बन्धी किसी भी भोग्य पदार्थ की, जिसके कारण किसी जीव को अपने
से पृथक या फिर और किसी अन्य भोग्य पदार्थ की आवश्यकता का लेश मात्र भी अपने लिए
शेष प्रतीत न होकर ऐसा ही अनुभव हो सकता है कि जिसके पश्चात् या जिसके कारण
जीव को, या जीवात्मा को सर्वदा उस सर्वज्ञ परमात्मा के द्वारा ज्ञान, शान्ति या
आनन्द का रस ही निरन्तर प्राप्त होता ही रहता है॥
इसमें कोई सन्देह, या संशय किसी प्रकार का, अथवा किसी विचार मन में, किसी
जीवात्मा को, तब हो सकता है, जबकि वह जीव अपने लिए संसार से तो सुख चाहने का
यत्न, यत्नपूर्वक प्रत्येक दशा व रूप में कर रहा हो परन्तु ज्ञान होने पर भी ज्ञान रूपी
उस परम पिता परमात्मा का ध्यान विचार निष्पक्षता से न तो कर रहा होगा और न ही
कभी केवल मात्र उस परम पिता परमात्मा को पाने का यत्न कर रहा होगा, तो ऐसे
जीव को यह ज्ञान भी प्राप्त न हो, फिर चाहे न भी वह उस परम पिता परमात्मा को
प्राप्त करे? पर जो मन द्वारा या वाणी से सब का सब कुछ त्याग कर उस परम
पिता परम पिता के लिए यत्न कर ही रहा होगा वह क्यों नहीं?
तो इस प्रकार मनन व विचार करने पर, सब प्रकार केवल परमात्मा को ही सब कुछ
जान लेने पर विशेष रूप से यह भी, प्रत्येक स्थिति में उस नित्य आनन्द स्वरूप
को परमात्मा स्वरूप ही जान कर, जिसे सब प्रकार का विचार या ध्यान परमात्मा का
कहना स्वाभाविकता है, स्वाभाविकता ही जिसका धर्म, कर्म या स्वरूप होगा, जिस
पर यह स्पष्ट है, जिसे विचार से सब कुछ स्पष्ट हुआ करता है जिसे सब ही
स्वाभाविकता कहा गया॥
पर इसके पश्चात् भी तो विचार यह देखना होगा व देखना पड़ा उस अवस्था
विशेष व दशा रूप योग-की प्राप्ति अवस्था तक--जिस अवस्था तक सब कुछ त्याग हो तो
गया पर मन का न त्याग हो, न ही आत्मा, का त्याग होना सम्भव हुआ या हो सकता
व किसी प्रकार भी सम्भव नहीं, व इस प्रकार दोनों का ही या तो त्याग हुआ नहीं, या
ही दोनों जीवात्मा के परमात्मा के आधीन होने व परमात्मा के बस होने से ही, उस
स्थिति व उस दशा विशेष का लाभ हो सकेगा॥
स्वाभाविकता, स्वाभाविक का यह अर्थ हुआ, जिस स्वाभाविकता का, प्रत्येक को
धारण या ग्रहण करने का यत्न प्रत्येक दशा विशेष रूप में तथा स्वयं परमात्मा
द्वारा भी सब प्रकार सब का स्वरूप बनाया गया होगा, जिसे सब प्रकार से
ऐसा ही सब को स्वीकारना ही परमात्मा का स्वरूप; प्रत्येक जीवात्मा द्वारा, जिसे
परमात्मा की परमात्मा के स्वरूप द्वारा ज्ञान रूपी दिया, तो वह तो सबको
प्राप्त हो ही सकेगा॥
स्वाभाविकता का अर्थ सब का परमात्मा का स्वरूप बना देना नहीं हो सकता या
आत्मा जिस दशा को त्याग पश्चात् परमात्मा स्वरूप ही देखना चाहे किसी जीव को, तो
वह, ऐसा ही हो सकेगा, जब जीव परमात्मा ज्ञान को अपने आत्मा स्वरूप जीवात्मा रूप
का सदा ज्ञान रखे॥
पर ऐसा ज्ञान केवल ज्ञान तक सब प्रकार परमात्मा का ही सदा स्वाभाविकता रूप
मन सब प्रकार स्वाभाविकता को स्वीकारे, स्वाभाविकता का त्याग न कर सके॥
स्वाभाविकता का त्यागना ही तो सब पाप, व स्वाभाविकता का त्याग ही सब
दुःख का कारण, जिस से परमात्मा को सब का सब सुख या फल भोग क्यों न हो? जो
जीवात्मा ऐसा न करे, तो ही स्वाभाविकता का परमात्मा द्वारा लाभ, जिसे प्रत्येक
स्थिति में सब सब कुछ को स्वाभाविकता का रूप ज्ञान विचार ज्ञान दिया गया,
जिस स्वाभाविकता का लेश मात्र भी तो उल्लंघन या उस रस का लेश मात्र विचार
स्वाभाविकता के विपरीत न हो, पर जो ऐसा हो, स्वरूप या परमात्मा का, स्वरूप व रूप
हो॥
सब कुछ तो यथार्थ-ज्ञान या स्वाभाविकता स्वरूप से ही सब कुछ ज्ञान प्राप्त
हो सकता है यह सब कुछ जो कुछ कहा जा रहा है? जिस पर, परमात्मा के सब
ज्ञान स्वरूप पर! जिस ज्ञान रूप से सदा स्वाभाविकता का लेश मात्र ज्ञान सब
स्वाभाविकता के त्याग से प्राप्त हो ही नहीं सकता या त्याग रूप से ही सब कुछ
का ज्ञान प्राप्त हो रहा रहा है? तो समझना होगा कि यह, ज्ञान सदा स्वाभाविकता
85

नोट: इस पृष्ठ की सामग्री किसी फ़ॉन्ट रेंडरिंग त्रुटि (Missing/Corrupted Font) के कारण चौकोर बक्सों (Tofu Boxes ▯) के रूप में प्रदर्शित हो रही है, जिससे मूल देवनागरी अक्षर अपठनीय हैं। पृष्ठ में केवल विराम चिह्न और पृष्ठ संख्या ही दिखाई दे रहे हैं।

छवि का यथावत प्रतिलेखन नीचे दिया गया है:

▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯, ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯
▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯, ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯
▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯
▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯ ▯▯▯
▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯! ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯
▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯, ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯
▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯
▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯, ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯
▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯▯▯▯▯ ▯▯
▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯, ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯
▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯, ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯▯▯
▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯
▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯
▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯
▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯, ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯, ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯
▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯, ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯
▯▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯
▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯
▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯
▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯
▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯
▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯
▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯
▯▯▯▯, ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯, ▯▯
▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯, ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯
▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯? ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯
▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯, ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯
▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯, ▯▯▯ ▯▯▯▯
▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯?
▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯, ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯
▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯
▯▯▯▯ ▯▯▯, ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯?
▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯, ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯! ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯
▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯
▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯▯
▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯, ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯
▯▯ ▯▯▯▯--▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯, ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯--▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯
▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯! ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯
▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯
▯▯▯▯ ▯▯▯, ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯
▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯, ▯▯
▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯; ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯
▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯
▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯, ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯
▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯
▯▯▯
▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯
▯▯▯▯▯▯▯▯▯▯▯, ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯
▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯, ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯
▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯? ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯-▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯, ▯▯▯▯-▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯
▯▯▯ ▯▯▯▯▯
86

□□ □□ □□□□□ □□ □□□□ □□ □□ □□□ □□ □□□□□□ □□ □□□ □□□, □□ □□ □□□□ □□□□□
□□ □□□ □□□□□□
□□□□□ □□□□□□ □□ □ □□ □□□□□ □□ □□ □ □□□ □□□□ □□□ □□□□□□ □□ □□□□□
□□□□□ □□□□, □□ □□□□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□□□ □□□□□□ □□ □□□□□ □□□
□□□□ □□□□, □□□□ □□ □□□□ □□□□, □□ □□□□□ □□ □□□□□□ □□ □□□ □□ □□ □□□ □□□□□
□□□□ □□□□□ □□□□ □□□□□□
□□□□ □□□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□□ □□□□□ □□□□ □□□, □□□□ □□□□ □□□□□ □□
□□□□□□ □□ □□□? □□□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□□□ □□□□□□□ □□□ □□□, □□□□□ □□ □□□□□
□□ □□□?
□□□□; □□□□ □□□□□□ □□ □□ □□□□ □□ □□□ □□□□ □□□□□□--□□□□□ □□ □□□□□
□□□? □□ □□□□ □□□□□□□□ □□ □□□□ □□ □□□□□□□ □□ □□ □□□ □□□□ □□□□□ □□□□
□□□□□□□ □□□, □□□□□ □□□, □□□□□ □□□ □□□ □□□ □□□, □□□□□ □□□□ □□, □□ □□□□□
□□□□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□ □□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□□ □□□□ □□□□□□□ □□ □□
□□□□□ □□□□ □□□? □□□□□ □□□ □□ □□□□□ □□?
□□□□□□□ □□ □□□□□ □□□□□□ □□ □□ □□ □□□□□ □□□ □□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□□□
□□□□□□ □□ □□ □□□□ □□ □□□ □□ □□□ □□ □□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□□ □□
□□□ □□□□ □□□□□ □□□□ □□□□□ □□ □□ □□□□□ □□ □□ □□□ □□□ □□□ □□□□ □□□,
□□□□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□--□□□□□ □□□□□□ □□ □□□□□ □□ □□ □□□ □□□□□□ □□□
□□□□□□ □□□ □□□□□□□ □□ □□ □□□□ □□ □□□□□□ □□ □□ □□□□ □□ □□ □□□ □□□□□□
□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□ □□□□□, □□ □□ □□□□□□ □□ □□□ □□□ □□ □□ □□□□□
□□□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□ □□ □□□□□ □□□□□ □□ □□□□-□□□□ □□□ □□ □□□
□□□□□
□□□□□ □□ □□□ □□□ □□□□□ □□? □□□□□ □□ □□□□-□□□□ □□ □□□ □□□□□ □□ □□□
□□□□ □□□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□□, □□□□-□□□□ □□□□
□□□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□□□ □□□ □□□□□□□ □□ □□□□□□
□□□□□ □□□□□□□□ □□□, □□□□ □□□ □□□ □□□□□□□ □□ □□□□□ □□ □□□ □□□ □□□□□-
□□□□□ □□□□□ □□□□□ □□□ □□ □□□ □□□□□ □□ □□□ □□□ □□ □□□□ □□□□□ □□□□□ □□
□□□□ □□□ □□□, □□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□□□□ □□□□ □□
□□, □□□□ □□□□--□□ □□-□□□□ □□, □□-□□□□ □□ □□□□□□□ □□ □□ □□-□□□□ □□ □□□□□
□□ □□□ □□--□□□□ □□□□ □□ □□□□□, □□□ □□ □□ □□□ □□ □□□ □□□□ □□□ □□? □□ □□□□
□□ □□□, □□□? □□□□ □□□, □□ □□ □□ □□□-□□□□ □□□□□ □□ □□□ □□□-□□□□ □□□□□ □□□□
□□□□ □□□□
□□ □□ □□□-□□□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□ □□ □□□□
□□□ □□! □□ □□□□, □□□□□ □□□□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□□ □□□ □□ □□ □□ □□ □□□
□□□□ □□□□□ □□□-□□□□ □□□□ □□, □□ □□ □□□□ □□□□ □□□□□□? □□□□ □□□ □□□□□, □□
□□□□□ □□□□ □□ □□□-□□□□ □□□□ □□! □□□□ □□□, □□□□□-□□□□□, □□ □□□ □□□-□□□□
□□□□ □□□ □□-□□□□ □□□ □□ □□□□□ □□ □□□ □□□ □□□ □□□□□□□ □□□ □□□□□ □□□□□□
□□□ □□□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□□ □ □□ □□□ □□ □□□ □□□□ □□□□□ □□□ □□□-□□□□
□□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□-□□□□ □□□ □□□ □□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□-□□□□!
□□ □□□□ □□ □□□□, □□-□□□□ □□ □□ □□□□□□□□ □□ □□ □□□□□ □□□, □□□□ □□□
□□□□□ □□□□ □□ □□□□, □□ □□□□ □□□□ □□□? □□□□ □□□, □□□ □□□-□□□□ □□□□□ □□□□
□□ □□□□ □□ □□□, □□ □□□ □□□□□ □□ □□□ □□□□□ □□□□ □□, □□ □□□-□□□□ □□□□ □□□
□□□ □□□□ □□□□□ □□ □□ □□□□□ □□□□□□ □□ □□□□ □□ □□□ □□□ □□□□□□ □□□ □□□
□□□□□□□□, □□□□□ □□□ □□□□□□ □□ □□□ □□□□□□□ □□ □□ □□□□□□□ □□ □□ □□□ □□□□
□□ □□□-□□□□ □□□□ □□□□ □□? □□□□ □□□, □□□□□ □□ □□ □□□-□□□□ □□□□□ □□□□ □□
□□□ □□ □□□□ □□□□□□□ □□ □□□ □□□□□□ □□, □□ □□□□□□□ □□ □□□ □□□ □□□□□
□□ □□□□ □□□□□□□ □□ □□□ □□□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□, □□ □□□□ □□□□□ □□□?
□□□□ □□□, □□□ □□□-□□□□ □□□□ □□□□ □□□□□□□ □□ □□□, □□ □□□□□□□ □□ □□□ □□□
□□□ □□, □□□□□□□□□ □□ □□□ □□ □□□□□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□□ □□□□ □□
□□□□□ □□□□□? □□□□ □□□, □□□□□ □□ □□ □□□-□□□□ □□□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□
□□□□ □□□-□□□□ □□□□□ □□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□ □□ □□□ □□□□□□ □□□□□□□□ □□□□□
□□□?
87

इस प्रकार वह मुनि उस नगर का सब वृत्त कह कर चुप हो गये अथवा उन्होंने मौन
अवलम्बन कर लिया, पश्चात् राजा ने, उन मुनि राज द्वारा वर्णित चरित्र को सत्य समझ
विचार कि 'अहो ? आगामी काल में इस प्रकार राज्य का फेर-बदल हो
जायगा अतः, मुझे अपने ही सामने चक्रधर धर्मात्मा पुत्र होगा, सो उसी समय राज्य
का प्रबन्ध करके, पश्चात् मुझे संयम का फल जो मोक्ष वा स्वर्ग पद प्राप्त कराएगा उसी का
नाम ले कर सदा, एकाग्र चित्तता धार समय बिताना
वा सुख-दुख भोगने वाले का सब काल ही क्यों ? सो अविचार्य ही उचित
समझ कर, सब सोच विचार छोड़
दिया । पश्चात् राजा ?
कहने लगा, महाराज जिस समय इस, पुरोधा पुत्र का इस चक्रि-वंशज रूप
होगा, सो तो अवश्य होगा
परन्तु अब, तो कोई उपाय फेर-बदल करने योग्य ऐसा करो, जिससे पश्चात् ही
अवश्य फल, हो सो उपाय करना उचित होगा
सो इस पर वह मुनि मण्डप प्रविष्ट हो कर भी, सो सब-कुछ कह सका क्या ? क्योंकि
भूत वा भावी तो प्रत्यक्ष ज्ञानी ही जान सका करता है । राजा ने उस समय विस्मय युक्त
होकर जो जो वचन कहे सो सो, राजा उस समय केवल ही कहने लग गया था क्योंकि ज्ञान-
रूपी समुद्र का धारक मुनि केवल ज्ञान मण्डप से चला गया था, चक्र-वर्ती ! आपके
इन दोनों का रूप परिवर्तन हो कर सब फेर-बदल होगा क्या ?
वा अथवा अन्य का ? अथवा किसी का ? अथवा किसी का ?
अथवा इस सब का ही फेर-बदल होगा क्या ? महाराज श्री अरिहंत, गुण समूह
विशेष अवधारने वाले मुनि द्वारा सब प्रकार का सब भाव प्रकाशित रूप कह दिया वा
संशय रहित कर दिया ? सो राजा ने, जो, फेर-बदल हो रहा था, उस रूप का ज्ञान
वा स्वरूप रूप कथन किया था, सो फेर-बदल हो गया ? सब राज सभा के अन्य
सब लोग उस पर चुप ही रहे तथा मुनि महाराज के कहे अनुसार ही राजा का यह सब
बात कहना हो गया फेर-बदल ?
पश्चात् उस न केवल काल और स्वरूप का फेर-बदल सम्बन्ध ही उस समय राजा-
मुख से कहा गया था बल्कि पश्चात् जो जो सम्बन्ध भी हुआ, सोई अन्य सम्बन्ध पूर्वक
ही हुआ, सो, उस सब का ही, सार या अंश जो भी कहा गया सत्य हुआ, यथा राजा
उस समय चिन्ता युक्त हो कर मन में इस प्रकार विचार करने लगा कि पुरोधा का
जो यह रूप अन्य का होगा सो फेर या फेर-बदल होगा क्या ? सो अवश्य होगा तथा
सो फेर क्या ? राजा भी इस सोच विचार
द्वारा विस्मय पूर्वक, विचार कर फेर-बदल को सत्य मान कर शान्त चित्त
अवलम्बन कर गया, पश्चात् वह फेर-बदल ? कैसा हुआ यह भी विचारने का ही रूप
ठहराया, परन्तु उस सब का खुलासा यह हो गया कि जिस रूप में, जो सब भी हुआ
सो सर्वथा सत्य था, सो फेर-बदल क्या सो इस प्रकार हुआ ! महाराजा पुरोधा,
द्वारा रक्षित कन्या को ? वा इस सब रूप को ? पश्चात् राजा, उस समय किसी भी
अन्य स्थान पर पुरोधा का रूप फेर तथा फेर-बदल का विचार कर व्याकुल हो
कर व्याकुल चित्त द्वारा चिन्ता कर, कि हाय बड़ा आश्चर्य अघटित घटित हुआ !
सो फेर-बदल था ! राजा के मन में सोच का उदय हो गया कि क्या यह सब
अघटित ही ? सब मन का भ्रम था ? पश्चात् राजा सोच के निमित्त सब चिन्ता
का ही फल प्राप्त हुआ
इन दोनों कन्या वा राजा दोनों द्वारा पूर्व में, संयम का फल, उपभोगपूर्वक
ही प्राप्त, भोगकर या भोग--सहित, रूप तो परम्परा से सब राज्य वैभव प्राप्त हुआ,
ज्ञान का रूप सर्वदा यथार्थ स्वरूप ही सब के मन में प्रकाश करने योग्य बना
जिससे उस सब प्रकार की सो ही जो स्वरूप ज्ञान द्वारा राजा को ज्ञान कराया था,
पश्चात् राजा को अन्य उपाय द्वारा यत्न करने पर ज्ञान हुआ, विचार केवल ज्ञान
रूप ही प्रकट होकर शान्त भाव रूप में प्रकाशमान हुआ सो, राजाधिराज सब राज
मण्डली युक्त हो, उस सब समाचार को सुन कर सन्तुष्ट
पुरोधा रूप का फल भोगकर, जो धर्मात्मा, रूप धारण कर मोक्ष पद--सम्बन्धी
रूप फल को प्राप्त कर केवल ज्ञान रूप होकर सर्वज्ञता द्वारा प्रसिद्ध हुआ, यथा राजा
चक्रवर्ती द्वारा राजा को विस्तार से जो संशय रूप था सब त्याग योग्य समझ कर
शुभ फल को, सब ओर, सो ही दिया था, जिससे केवल ज्ञान प्रकाशित

ब्राह्मण को तो अपनी जीविका चलाना कठिन होगा, और उनका भी, जो कि निर्वाह
पूरा धन से कर रहे तथा बहुत दिन यहाँ काम किया पर अब काम छूट गया और उनको
घर पर सब कुछ बहुत महँगा लेना पड़ता है वह बहुत दुःख में पड़े होंगे तथा जो लोग
पर कोई बड़ा भारी संकट आ पड़ा है वे लाचार, और काम बंद होने लगा तो उनके
निर्वाह कैसा चल रहा होगा यह सोच लो।
पर कुछ लोग धनवान तो बहुत ही हो गये, पर उनके मन दया या धरम का तो
पर लेस भी नहीं पाया जाता है वे केवल अपने स्वार्थ को देख रहे होंगे, तो उनका
क्या ही कहना।
यहाँ पर सब कुछ विचार लो, जिससे सबका ही हो भला ऐसा उपाय क्या है?
परमेश्वर सबका भला करे, जिससे कि सब ही सुखी, और सब को शान्ति
प्राप्त होवे यही सब समय में हमारा तो विचार और यत्न होना आवश्यक कहा है,
इसलिए जो सुखी या धनी, उनका कर्तव्य तो यही होना बड़ा उचित कहा जा
रहा है इसके सिवा, आत्मनिर्भरता देश--हितैषिता की दृष्टि से--विचारपूर्वक सब
कामों का सुधारना ही सब समय कर्तव्य माना गया विचारशील को, जिससे कि,
आत्मनिर्भर सब ही प्रकार होना सब देश वासियों का हो सके और देश आगे बढ़
सके ऐसा ही यत्न सब को तन मन धन लगा कर करना चाहिए, जिससे सब काम आगे
बढ़े; यहाँ विचारने की बात यह भी है कि देश भरमें व्यापार का, उद्योग और विद्या
सब बातों में सुधार, की प्रार्थना सब लोग देश भरमें करते रहते तथा सब प्रकार से
सब ही से सहायता पूर्ण प्राप्त होना देखा जा रहा।
अब यह सब सुधारने का उपाय क्या हो सकता है, सब लोग यह विचार कर
उद्योग कर रहे हैं और हम भी अपने इस पत्र द्वारा सब ही के साथ अपने विचार रख
रहे हैं तथा, अन्य काम जो कर ही रहे हैं वे तो चले ही जावेंगे।
सरकार भी तो बहुत कुछ, विचार तो कर ही रही, सुधार के यत्नों
का काम, विचार को देखा, बहुत विचारपूर्वक सरकार स्वयं न कर सके! तो यह तो सब
लोग समझ ही तो गये होंगे ही, क्या विचार उनका इन सब पर होना ही नहीं है?
या सब विचार व्यर्थ है, यह तो प्रजा कभी विचार ही नहीं कर रही है?
बात यह, कि कानून तो प्रजा के, हित का विचार ही करके बनाया जाता
तथा यह केवल प्रजा के फायदे लिए ही, प्रजा प्रतिनिधियों का, यह यत्न रहता
कि कानून ऐसा ही बने कि जो प्रजा लिए ही भारी लाभ का, प्रजा इसलिए सब बात
पहले विचार कर सब बातों पर पूर्ण ध्यान देकर ही सब काम किया करती,
प्रजा कार्य को सब देख कर, प्रजा कार्य को सब लोग बड़ा ध्यान पूर्वक विचार कर सब
से काम लिया करते यह तो प्रजा भली प्रकार से सब ही को समझा रही समझा, पर जो
सब लोग कुछ भी बात अपने काम आगे नहीं देखते या कोई बात समझे ही, उनको
कोई प्रजा अथवा सरकार कुछ भी कह नहीं सकती तो फिर क्या ही, पर वे लोग बहुत ही
अधिक काम में आ रहे हैं ऐसा विचार नहीं है।
हमारा काम केवल यह देखना, और काम को सुधारने का उपाय करना ही
कहा, सो कर्तव्य के काम को सुधारने वाला काम सदा उचित समझा जाता ही है,
जिससे कि काम आगे बढ़ सके, केवल बात ही नहीं, जिससे सब सम्भव काम सिद्ध
हो सके। यह बात बहुत ही उत्तम है, विचार करने वाले समझ रहे तथा आगे
विचार भी सब कर रहे होंगे, सहायता सबको मिलना चाहिए पर इस बात को
सब ही सोचे, सरकार सहायता सब प्रकार सब को देवे ऐसा न बन सके
इसलिए सब को सब प्रकार से, काम स्वयं करने की चे--ष्टा करे, सब प्रकार की
विद्या को, धन, बल को सब प्रकार सब प्राप्त करे, यह सबको ही देखना और
जानना आवश्यक समझा जा सकता तथा इस कर्तव्य को पूरा करके ही आगे बढ़
सकते सब लोग ही यह बात तो सदा याद रखनी चाहिए जो कि सब प्रकार आगे बढ़ने
को न सब समय सदा सोचा करते जिससे सबका कार्य सिद्ध होवे, सरकार से
सब आशा सदा रखना उचित न होगा ही सरकार से, सहयोगपूर्वक सब को
सहायता लेन ही यह बात
इस विषय पर अधिक क्या कहा जायगा सब बातों का सार तो यही कहा जा
रहा तथा रहेगा ही, पर यह विचार तो देखा जाता ही सदा रहा है ही रहेगा. जो
केवल दूसरों के, पर ही निर्भर ही रहता वह कभी आगे नहीं बढ़ पाता केवल
सरकार ही, पर निर्भर हो रहने वाला तो सदा निर्बल बना ही रह जाता
इसलिए सब लोगों को तो सब प्रकार अपने काम को सदा अपने भरोसे ही पर निर्भर ही
89

मनुष्य सब कार्य विचार करके ही करता गया और जो कर्तव्यनिष्ठ या स्वार्थ त्यागने पर कटि
बद्ध हो कर्तव्य का पालन करता रहेगा अवश्य ही कर्तव्यनिष्ठ बनेगा या अपने लक्ष्य, उस
प्रत्येक कार्य सफल होगा!
यह विचार करना व्यर्थ ही नहीं वरन् व्यर्थ, या तो ऐसा कार्य करो जिससे या उस परिणाम
का फल जिससे कि उस कार्य का फल मिल सके या व्यर्थ कार्य करने से कर्तव्य नष्ट करने जैसा
फल प्राप्त होगा या तो कर्त्तव्य ही ना हो अथवा जिस रूप से कार्य का फल नष्ट हो
जायगा।
जब कार्य सिद्ध होगा, तो उसके न करने वाले को लाभ तो क्या वरन् हानि ही
रोग, शोक ग्रस्त ही होना ही न केवल स्वयं कष्ट भोगी ही होना ही नहीं वरन् सब
जाति।
स्वार्थ या पाप से बचा कर ही लोग कर्म को पाप माना है। इसी प्रकार क-मनु
का विचार भी उचित नहीं कहा जा सकता स्वयं भी अपने कार्य से पाप में प्रवृत्त हो उस से
पाप ही होगा, उपदेश का पाप होगा जिससे कि उपदेश देने वाले का अपना आत्मबल
नष्टप्राय तथा दुर्बल हो जाता गया, आत्मबल क्षीण होने से शक्ति नष्ट
उपदेश का प्रभाव निष्फल हो ही रहा देखा गया, अविश्वास उत्पन्न हो
गया, यदि बात ही ना रहे, उपदेश प्रभाव ही ना रहे आत्म शुद्धि? आत्मबल की ही
आवश्यकता केवल ही सब को कार्य में, जो कि इस प्रकार केवल बातों तक रह
गया उस कार्य-रूप त्याग अथवा साधन रूप कर्म द्वारा जो कार्य किया जा सकता
कार्य ना कर के आत्मबल, जो कार्य कि आत्मबल के बिना सिद्ध नहीं किया
जा सकता उसका प्रभाव सब पर व्यर्थ सिद्ध हो जायगा।
मानव समाज को सब समय में काल-चक्र सदा ही सब कार्य सिखाता ही
चला गया और जो विचार के रूप निश्चय था, कर्त्तव्य से ही निश्चित रहा, तो
उसने सब कार्यक्षेत्र में काम से, कर्त्तव्य के काम से, स्वार्थ के काम से, व्यर्थ
के काम से, या कु-कर्म से मन-वच और कर्मप्रवृत्ति को भिन्न रखा, जिसका कि
स्वरूप ही आत्मबल द्वारा सत्य कर्मप्रवृत्ति द्वारा स्वयं प्रत्यक्ष देखकर सिद्ध
किया जिसका फल सब को ज्ञान से, कर्त्तव्य द्वारा प्रत्येक कर्म विचार ही ना हो
सका; ज्ञान अज्ञान विचार से ही ना हो सका सब का स्वयं रूप सिद्ध हो
सका? तब ही तो सब का श्रेय रहा।
सब कार्य का श्रेय तो कर्त्तव्य और निष्ठा द्वारा रहा, आत्मबल द्वारा रहा।
आत्मबल निष्काम या कर्त्तव्य कर्म से ही सब सिद्ध हो सका, प्रत्येक कार्य
मन के ऊपर विजय प्राप्त कर के काम से आत्मबल द्वारा सिद्ध रूप हो ही सका जो
कर्त्तव्य पालन कराया, जो कर्त्तव्य रूप सब कर्मक्षेत्र तथा स्वयं प्रत्येक
रूप सिद्ध हुआ, उसका परिणाम सत्य स्वरूप कर्त्तव्य द्वारा प्रकट हुआ, जिसने
आत्मबल का ज्ञान दिया जिसे प्रत्येक कर्त्तव्यवान् कहा, जिसने आत्मबल को
प्रत्यक्ष किया जिसका नाम कर्त्तव्य
ही रहा, जो ज्ञान द्वारा सब द्वारा स्वीकृत
कर्त्तव्य ही कर्त्तव्य विचार से विचार ही सब को सब स्थान दिया गया
कर्त्तव्य ही कर्त्तव्य विचार से कर्त्तव्य से भिन्न कर्म त्याग दिया, त्याग
द्वारा त्याग का आत्मबल ही त्याग के आत्मबल द्वारा सिद्ध रूप कर्त्तव्य
विचार का रूप प्रत्यक्ष हुआ जो त्याग ज्ञान द्वारा सब को प्राप्त करा दिया गया
जिसका फल सब ने स्वयं ही पा कर प्रत्यक्ष प्रमाण देखा तथा सब को ज्ञान
का ज्ञान हो गया सब ने सत्य स्वरूप के कर्त्तव्य को देखा, उस ज्ञान को सब
ही सब प्रकार से सब ने ही कर्त्तव्य के रूप में मान लिया; आत्मबल से कर्त्तव्य
का रूप माना; उस का पालन ही सब किया; ना छोड़ा ही, ना बदला ही, सब
कर्त्तव्य को आत्मबल, या कर्त्तव्य का फल कहा, सत्य कर्त्तव्य को सदा सब ही
काल प्रत्यक्ष रूप में माना गया
सब काल में सत्य कर्त्तव्य द्वारा सब ज्ञान प्रत्यक्ष रूप से सिद्ध हुआ जो
कि प्रत्येक काल में अपना कर्त्तव्य सदा सत्य माना गया... जिसे ज्ञान द्वारा
सत्य कहा गया, सदा कर्त्तव्य द्वारा माना गया, सदा कर्त्तव्य कहा गया, वह
ही ज्ञान मनुष्य का सदा साधन ही हो सकता था, जिसे सदा सब काल कर्त्तव्य
कर्त्तव्य ही कहा गया हो, जो आत्मबल द्वारा हो, जो कि मनुष्य को ही ज्ञान
द्वारा प्राप्त होकर सब के ही सब द्वारा इस प्रकार सब को प्राप्त कराया जा कर
आत्मा व मानव समाज सब सब काल तक ही कर्त्तव्य रूप में सत्य रूप माना गया।
90

□□ □□ □□□□, □□□□ □□ □□□□ □□□ □□□ □□□□ □□□□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□□□
□□□□
□□□□□□□□ □□□, □□□□ □□□ □□□□ □□□, □□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□ □□□ □□□ □□
□□□, □□□□□□ □□ □□□, □□□□□□□ □□ □□□, □□□□□ □□ □□□ □□□□□, □□□□, □□□□ □□□
□□□□□ □ □□, □□ □□□□ □□□□□□□ □□ □□□-□□□ □□□-□□□ □□□□ □□□ □□□ □□ □□□□ □□□
□□□□ □□□□□ □□ □□□□□ □□ □□□ □□□□-□□□□ □□□□□□□□ □□□ □□□ □□□□ □□□□
□□□□ □□□□□□□□ □□ □□□□□□ □□□□ □□□, □□□□ □□□□□□ □□□□□□□ □□□□□

91

जीवन का सार-तत्त्व प्रेम
मुकुट बिहारी
शिक्षक एवं कवि

आनो प्रेम स्वरूप पहचानें!
कामिनी-कंचन से, पदलोभ-प्रतिष्ठा से हटकर जो प्रेम का पथ खोजता है, वही
प्रेम का स्वाद पा सकता है, जो केवल सब कुछ लुटाकर बदले में कुछ भी न चाहे,
केवल दे-दे ही, जिसके हर रोम-रोम में और हृदय व मन मस्तिष्क के पोर-पोर में त्याग
ही हो, उसके ही प्रभु हैं, न कभी वो हार माने, न किसी से गिला करे शिकायत ही करे
उसका सारा जीवन निष्काम हो जाता है सहज ही। उसे सभी में प्रभु
ही तो नजर आते हैं। सारा विश्व ही उसका अपना घर बन जाता है। किसी से
भी, हर हाल में निःस्वार्थ प्रेम करना चाहिए क्योंकि हम ईश्वर के स्वरूप हैं और
सब परस्पर ही परमेश्वर रूप हैं, तो किसी से नफरत या ईर्ष्या-द्वेष का भाव
ही बेकार होता है।
केवल मनुष्य ही ऐसा जीव इस धरा पर देखा गया, जो हर वस्तु, व्यक्ति से
कुछ न कुछ पाने की इच्छा से रिश्ता या संबंध तय करे? लेकिन जबसे यह भाव मन
में आ जाता है, मनुष्य का पतन तय है, इसलिए हर हाल में सब निष्काम
होकर ही जीवन को जिया जाए? प्रभु सब स्वरूप से ही साक्षात्कार हो, ही तो
वास्तविक परमानंद होगा।
प्रेमियों की पहचान या स्वभाव ऐसा ही होता साक्षात्कार ही हुआ और
प्रभु मिल ही गए, फिर संसार के हर संबंध सब गौण ही रह जाएंगे। जब
सब अपने ही रूप नजर आने लगे, फिर द्वेष तो दूर विलीन ही होगा।
मनुष्य तो इस संसार रूपी सागर पार कर सकता है, उसे ही प्रभु
मिल सकेंगे, जो किसी को धोखा न देवे। सब जीवों पर दया भाव रखे।
जो हर पल, निष्काम ही हर कार्य करे। तब प्रभु कृपा बरसेगी।
क्या ईश्वर को पाना है? तो हर पल ऐसा कर्म करना होगा कि किसी का दिल
मन या तन को ठेस पहुंचे ही न हो, तभी वो प्रभु रूपी प्रेम हृदय में प्रकट हो
सके न क्या?
हर तरह से मन तृप्त हो जाता प्रभु की कृपा से। प्रेम ही परमात्मा स्वरूप है।
इसलिए सब से ही सदा ही सदा के लिए प्रेम से ही रहो।
प्रभु से सच्चा संबंध ही मन को सब भय से मुक्त करता है। ईश्वर
सदा सत्य होता है। वो कभी न मिटने वाला ही सत्य का नाम है, सो ही
विकार-मुक्त ही होकर हम परमात्मा को पा सकते हैं। सब कुछ पाकर मनुष्य
भी न पा सका तो अज्ञानता ही समझ कर प्रभु से जन-जन प्यार करे ही तो।
मनुष्य तो हर इंसान से उम्मीद बांध कर बैठा रहता है। किसी से
संबंध भी तभी करता है। प्रेम में केवल समर्पण होना चाहिए। प्रेम तो केवल
ही तो है, त्याग ही इसका रूप है। प्रेम तो सब को ही सब कुछ देता
बदले में अपेक्षा न रखे। मनुष्य तो फिर भी ऐसा ही भाव रख कर चलता
रहता है। तभी तो परमात्मा से दूर ही रह जाता है।
प्रेम तो कभी भी मिट नहीं सकता। प्रेम कभी भी वासना नहीं हो
ही सकता। वासना केवल मन की विकृति मात्र होती है। प्रेम तो शुद्ध रूप
केवल परमात्मा रूप ही सब जीवों में नजर आता, तभी परमात्मा मिल
पाते, वासनाओं से छुटकारा पाना ही प्रेम, जो भी प्रेम सदा किया जाता वो ही
सच्चा प्रेम होगा।
निष्काम भक्ति ही श्रेष्ठ कहलाती है। प्रेम सब तरफ विद्यमान है,
मनुष्य रूपी मानव समाज प्रेम रहित हो गया। इसी कारण संसार में अशांति
चारों तरफ व्याप गई। मनुष्य से मनुष्य के संबंध केवल स्वार्थ तक ही रह
गए। जिस से समाज में अशांति-अव्यवस्था फैली, हर कोई परेशान नजर आ
रहा। आज जरूरत फिर से भाईचारे, प्रेम, दया की है। नर-नारायण
परमात्मा रूप, सो माता-पिता रूप में जननी-जनक ही पूजनीय हैं। हर कोई
फिर से नर-नारायण का स्वरूप बन जाए।

92

सुदर्शन-क्रिया का प्रभाव मात्र तन तक ही नहीं-मनोबल बढ़ाकर अवसाद से पार पाने
भी, तनाव घटा-बढ़ा रसायन संतुलन कर तन को रोग मुक्त ही नहीं तो नया रूप भी देती
रहस्य ऐसा
सुदर्शन महाक्रिया द्वारा सांस पर मन का भाव पड़ने लगता बल्कि मन का स्वाभाव
तन पर पड़ने का परिणाम यह देखकर कि जब भी भावुकता या तनाव का प्रभाव तन पर
पड़ता सांस गहरी होने लग जाती या तो अस्वाभाव से चलने लगती सांस धीमी हो
जाती..., सांस तेज चलने लग जाती जब अस्वाभाव सांस सांसों रफ्तार सामान्य
सांस से तो भी तो दो कदम ही आगे बढ़, विचार के पास बढ़, विचार से
आगे बढ़, विचार रूप में ही आ जाता, विचार से मुक्ति का रूप
इस प्रकार सुदर्शन महाक्रिया की लय से मन शांत चित होता फिर मन की
व्यथा से परे हो सांस गहरी अभ्यास से शांत मन शांत रूप से तन शांत होने लग
ही तो जाता तो जो भी विकार सांस फेफड़े प्राण रूप बन कर तन तक रोग ग्रस्त था
शांत हो जाता या फिर, विचार के पार शांत भाव से तन जब स्वस्थ होना शुरू
लगता सहज ही सांस के साथ सांस लेकर शांत हो रूप से जो भी विकार सहज
ही तो शांत हो ही जाता फिर जब ध्यान लगा शांत हो ही तो जाता विकार,
तन शांत चित्त मन का विकार शांत होकर सहज लय शांत रूप में शांत होने लग
ही तो जाता फिर जो भी मन रूप ही जाता तो फिर भय भी रूप तो शांत होने लग
ही तो गया?
तो जो भय ध्यान से मिटता शांत होकर लय तो जो भय ध्यान मिटा, तो सहज
सुदर्शन महाक्रिया सुदर्शन स्वरूप धारण रूप तो हो जाता फिर ध्यान से पार रूप
रूप में सुदर्शन ध्यान रूप बन
सहज होता है, जो लयबद्ध से स्वाभाव के सहज भाव लय से विकार से
परे हो जाता ही विकार से मुक्त रूप से शांत हो सहज रूप शांत होने से शांत ही
होने लग जाता विकार शांत ही तो रूप ध्यान से शांत होकर शांत हो विकार
से पार ही विकार से शांत होकर विस्तार से सहज रूप में, शांत अव्यवस्था
को शांत कर ही सहज शांत स्वरूप सहज ही सहज रूप शांत विकार से शांत
रूप शांत कर ही विकार से पार ही सहज से मुक्त रूप शांत सहज विस्तार ही
बन गए
ही सहज से रूप से शांत लय का सहज ही रूप बन गए?
ही शांत विकार के पार, लय शांत सहज! शांत भाव से लय ध्यान रूप हो
शांत हो शांत लय शांत के शांत विकार, भय विकार से ही भय ध्यान
से सहज विकार बन ही शांत स्वाभाव को विकार मुक्त रूप से सहज
स्वाभाव ही तो शांत विकार बन जाता ही विकार स्वरूप से स्वाभाव से सहज
शांत ही सहज हो लय, तो ही शांत लय रूप भय?
सहज रूप, तो शांत ही विकार से पार, शांत लय के सहज से विकार से
शांत लय
सहज ही शांत ही लय ध्यान स्वरूप ही लय सहज! फिर तो लय सहज
लय शांत ही लय सहज! शांत रूप सहज विस्तार लय से विकार लय
शांत स्वरूप, शांत विस्तार से शांत ही पार हो लय सहज
लय ही लय सहज के पार, तो लय स्वरूप लय, स्वाभाव लय के स्वाभाव
लय में शांत लय लय रूप स्वाभाव के लय लय लय में लय विकार मुक्त लय सहज!
फिर तो लय ही लय सहज शांत स्वाभाव लय से विकार सहज लय ही लय
लय के लय ही लय लय लय लय लय के लय लय लय में लय विकार के स्वाभाव
स्वाभाव में लय ही लय लय लय
ही सहज ही लय लय लय लय लय के लय लय लय, सहज लय! तो ही
सहज स्वरूप लय, लय ही लय सहज विस्तार लय के ही तो लय ही लय
लय? तो लय विस्तार लय? तो लय लय लय लय?
तो ही सहज ही पार, तो सहज लय के लय लय लय लय लय के सहज
लय, फिर स्वरूप ही स्वरूप के ही लय लय लय लय लय लय लय के स्वरूप लय
स्वरूप ही लय, तो ही तो इस अस्वाभाविकता को पार स्वाभाविकता के लय
सहज ही तो लय ही तो लय लय लय के लय ही लय लय के ही स्वरूप, तो
ही, फिर सहज लय लय से ही तो ही तो लय के लय ही तो लय ही लय
लय लय
93

□□ □□□□ □□ □□□□, □□□□ □□ □□□ □□ □□ □□□□ □□ □□□ □□□ □□ □□□□□□ □□□ □□
□□□□ □□□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□□?
□□ □□ □□□□ □□ □□□, □□□□□ □□ □□ □□ □□ □□ □□□□ □□□□□□ □□ □□□□ □□
□□□ □□ □□□□□□ □□□ □□□-□□□□ □□□□□□□□ □□□□ □□ □□ □□□□□ □□□ □□□□
□□□□□□□□ □□ □□□□□□ □□ □□□□□□□! □□ □□□□ □□□ □□□ □□□□□□ □□□ □□□ □□! □□ □□□
□□□□□□□□□□ □□ □□□□□□, □□ □□□ □□□ □□ □□□□ □□□□□□ □□□□□ □□□--□□ □□ □□□
□□□ □□, □□□□□ □□□□□□□ □□ □□□□ □□ □□□□, □□□□□□□ □□ □□□□□□□ □□ □□ □□□□, □□
□□□□ □□□ □□□□□ □□□□
□□□□□□-□□□□ □□ □□□ □□□ □□□□□ □□ □□ □□ □□□□□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□ □□
□□□□□ □□□, □□ □□□□□ □□ □□□□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□□ □□ □□□ □□ □□□ □ □□□ □□ □□
□□□□□ □□ □□□□ □□□□□□□□□ □□ □□□□□ □□□□□ □□ □□□□ □ □□□ □□□ □□ □□ □□□ □□□□
□□□ □□ □□ □□□□□ □□□, □□□□ □□□□□ □□□□□□□ □□ □□□ □□□□□□ □□□□□□ □□ □□□□
□□□□□ □□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□□□ □, □□□ □□□□□□ □□ □□□□□□□□□ □□
□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□, □□ □□ □□ □□□□□□ □□ □□□□ □□□□□ □□ □□□□□□□□ □□
□□□ □□ □□ □□ □□□□ □□ □□□□□ □□, □□ □□□ □□□□□□ □□ □□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□
□□ □□□□□□ □□ □□□□ □□□□□ □□ □□ □□ □□□□ □□ □□□ □□□□ □□, □□ □□□□ □□□ □□ □□□□
□□, □□ □□ □□□□ □□ □□□□□ □□□□ □□ □□□□□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□ □□□ □□□□□□
□□, □□ □□ □□□□, □□□ □□□□ □□□□□ □□□□ □□□ □□□ □□□□ □□ □□□□, □□ □□□ □□□□,
□□□ □□□□ □□□□□ □□□, □□□ □□□ □□ □□□□? □□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□? □□□□ □□ □□□□
□□□□, □□□□ □□ □□□□ □□□□□□□, □□□□ □□ □□□□ □□□□□, □□□□ □□ □□-□□□ □□□□, □□□□
□□ □□□□ □□ □□□ □□□□□□ □□□□, □□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□! □□ □□□□ □□□□ □□ □□□□
□□□ □□□□ □□? □□□□ □□□ □□□□ □□□ □□□ □□ □□□□ □□□ □□, □□ □□□□ □□! □□□□-
□□□□, □□□ □□□□ □□□□□ □□□□
□□□□□ □□, □□ □□□□□□□ □□ □□□□ □□□□□ □□□, □□□□□□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□□
□□ □□□□□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□ □□ □□□□□ □□□□ □□□□□□□ □□ □□□□□□□ □□ □□ □□ □□
□□□□□ □□□□□ □□ □□□□□ □□□ □□ □□ □□□□ □□□ □□□□ □□ □□ □□□□□ □□□□ □□ □□□ □□
□□□ □□□□□ □□□, □□□□ □□□□□□□ □□ □□□ □□ □□□□ □□□ □□□ □□ □□□ □□□ □□ □□□□□ □□
□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□ □ □□□□ □□ □□ □□□ □□□□□ □□, □□ □□□□□□ □□ □□□□□ □□□□
□□□ □□□ □□ □□□□ □□□□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□ □□□□ □□
□□ □□□ □□□□□ □□ □□□□ □□ □□, □□ □□□□□□ □□ □□□ □□□ □□ □□□ □□□
□□□□ □□ □□□ □□ □□□-□□□□ □□□□□□ □□ □□□□□ □□ □□ □□□ □□□□□ □□□ □□□□□□
□□□ □□ □ □□, □□ □□ □□ □□ □□□□ □□□□□□□? □□ □□□□□ □□□□□ □□ □□□□□ □□ □□□ □□,
□□□□ □□□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□□ □□□□?
□□□□□ □□□□□□ □□ □□□ □□□□ □□□ □□□ □□□□; □□□□□ □□ □□□ □□□□□□ □□ □□□
□□□ □□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□□, □□□□ □□□□□ □□□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□, □□□□
□□□□□ □□□□□ □□□ □□□□ □□□ □□ □□□ □□□□ □□□, □□□□ □□□□□ □□□ □□ □□□ □□ □□□□
□□□, □□□□ □□ □□□ □□ □□□□ □□□--□□□□, □□□□, □□□--□□□ □□□□□ □□□□□ □□□ □□□□
□□ □□□□, □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□-□□□□ □□□□□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□□□
□□□□ □□□ □□□□□ □□□□□□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□-□□□□□ □□□□ □□□ □□□□□□ □□ □□□□□
□□□□ □□□□ □□□□, □□□□ □□□□□ □□ □□□□□□□ □□□ □□□□□ □□□ □□□ □□ □□□□ □□□□ □□
□□ □□□ □□□□□□ □□ □□□□□ □□□, □□ □□ □□□ □□□□□□□ □□□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□ □□ □□
□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□□ □□□ □□ □□ □□ □□□□ □□ □□ □□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□□□□
□□□
□□□□□ □□□□□□ □□ □□□ □□□□□□□□ □□ □□□ □□□□□□□□ □□ □□□□□□ □□ □□□
□□□□□□□□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□□□ □□□ □□ □□ □□□□□ □□□! □ □□□□ □□
□□ □□□□ □□□ □□□ □□ □□ □□□□□ □□□, □□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□□ □□ □□ □□□□□ □□□
□□ □□ □□ □□□ □□□ □□□ □□□ □□ □□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□ □□□ □□□ □□□ □□ □□□□
□□□□ □□□□ □□□□□□ □□ □□□□□□ □□ □□□□□□□ □□ □□□ □□□□ □□ □□□ □□□ □□ □□ □□
□□□ □□□□ □□□□
□□□□□ □□□□ □□, □□□□□ □□□ □□□□□ □□□, □□□□□□□□ □□□ □□□□□ □□□□ □□□□□□□
□□□□ □□ □□ □□ □□□ □□□□□ □□□, □□□, □□□□ □□ □□□ □□□□□ □□□□ □□□ □□ □□□ □□□□
□□□ □□ □□ □□ □□□□□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□□□ □□ □□ □□□ □□ □□□ □□
□□□□□ □□ □□ □□□□□ □□□□

94

जब वह दरवाजा खोल कर घर लौटने लगा तो यह देखकर दंग, रह गया दरवाजे का
तालासाबुत था दरवाजा अन्दर भीतर बन्द थाचौकीदार पहरा देसक रहे थे। सब, रुपये का था
केवल काम रुपये सिवाय संसारमें कुछ नथ बाकी सब कुछ झूठा था, सब धोखा धोखा
विश्वास घात था यह तो था केवल रुपयों का ही फल थाकि उस समय किसी नौकर ने
कहा कि, बाबू सम्पति कौशल्याका काम हो गया काम होने का अभिप्राय था कि वह मर
चुकी थी जो रोनेका शब्द आया था उसी से, यह बात समझ लीगई थी तब सेठ जी
सोचने लगे कि पैसा गया, प्राण गये तो जीवन किस काम का सेठ जी सिर पर हाथ
देकर बैठ गये।
इधर भगवान् श्रीकृष्ण जी को भी चिन्ता हो गई। देखा कि सेठ जी तो बैठे हैं
कौशल्या मर गई है इस तरह से काम न हो सका सो, जा कर कौशल्याको प्राण दान दिया, सो
जीती उठी तो जान में जान आ गई सब लोग दंग रह गये। सब कुछ फिर वैसा, ही केवल
सेठ जी सिर पकड़े बैठे रहे। बोले कि सब कुछ वापस मिल सकता था! पर पैसा कभी
नहीं आ सकता गया, गया फिर केवल पछतावा मात्र, रहगया इस वास्ते केवल एक
पैसा ही!
केवल धन ही सब कुछ नहीं, ना केवल ही त्याग सब, दोनों का समन्वय सब,
केवल एक वस्तु सारा काम नहीं कर सकती ना ही एक-दूसरे बिना काम चल सकता या
शोभा पावे गा, जब सब ही बराबर काम में आ जावे तभी उस की उपयोगिता सिद्ध हो
सके
राजा भर्तृहरि कहते हैं, स्वावलम्बी बनो दूसरों का आसरा नतकें केवल
अपने बाहुबल पर निर्भर रहो, परमात्मा सबका ध्यान रखता है। सब का पेट भरता
भी है! यदि वह केवल राजा ही होता, तो केवल राजा का ही पेट भरता पर भगवान्
तो सब का बाप है। सब का रक्षक है। हाथी जैसे विशाल प्राणी को मन भर दाना खाने को
रोज देता है, जब कि चींटी जैसे नन्हे प्राणी को कण भर दाना रोज देकर
उस कौशल्या के सम्बन्ध में सेठजी को यह चिन्ता सताने लगी कि
अब तो यह ठीक होकर बैठ गई तो कहीं न कहीं विवाह भी करना ही पड़ेगा पर यह सब
तो धन के ही द्वारा ही होगा सो इस चिन्ता में वह लगा रहा। उसने अपने पुत्र को
कहा कि तूंने क्यों प्राण दान दिया अब उस कौशल्या विवाह के सम्बध में
सोचेगा? क्या तू रुपया देगा? क्या उसको जो चाहिए वह मिलेगा या विवाह ही नहो
गा?
जो कुछ कौशल्या के तो जब तक वह जिन्दा है तब तक उस की देख-रेख हो,
सो सब कुछ ठीक से चलता रहे, ना कि उस का विवाह ही कराया जाय, सो सब कुछ
उसी पर निर्भर होगा, सो वह सब कुछ जान कर सब कुछ समझ कर सेठजी
से कहने लगे कि इस का ब्याह भी हो जायगा चिन्ता मत करो। यह तो भगवान् का
विधान है जो सब कुछ अपने आप करेगा या उस समय में हो कर ही रहेगा, जो भी
होगा देखा जायगा, ना घबराने से कुछ बन सकता ना कोई हल
निकल सकता? क्या किसी चिन्ता से काम बन सकताया काम पूरा हो सकता? सो
तो जो होना है होकर रहेगा, सो कौशल्या के विवाह के लिये चिन्ता मतकरो,
सब भगवान् पर ही छोड़ दिया जाय। सेठजी तो केवल धन के बारे में सोचते
रहे कि विवाह का खर्च सब अपने पास सेकरना पड़ेगा, ना कौशल्या के पास
धन, ना भगवान् रूप ब्राह्मण के पास ऐसा कुछ साधन होगा सो खर्च तो सेठ को ही,
केवल अपने पास से करना होगा सो चिन्तातुर हो, कौशल्या को सब कुछ
कह दिया
बेटी, विवाह कौशल्या का होना है, कौशल्या के लिये सब कुछ
सामान तो कर दिया गया ही है बाकी जो कुछ भी हो सो देखा जायगा। पर इस
सब का धन तो खर्च हुआ ही भगवान् के हाथ से, खर्च भी हुआ, कौशल्या
केवल ही खुश थी, ना अपने-आप में, कुछ कर सकती, सब तो सेठ
केवल ही चिन्ता में था, कि सारा धन ही लग गया, तो क्या होगा, प्राण
भी तो खतरे में पड़ गये इस तरह से सोचा, जब तक ठीक ना होवे सो ठीक
ही रहेगा।
विचार तो सब हो गया मगर क्या फल होगा सो?
केवल चिन्ता ही बढ़ती जाय सो चिन्ता से क्या लाभ हो सकता सो सोचना
था, पर सेठ का तो काम ही न चलता था जब तक चिन्ता न करता सो वह भी हुआ,
सेठ के घर से न केवल कौशल्या का ही काम पूरा हुआ पर सब चिन्ता से मुक्ति मिली
95

▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯▯▯▯, ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯-▯▯▯ ▯▯
▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯
▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯
▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯
▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯
▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯
▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯, ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯
▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯
▯▯▯▯! ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯
▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯
▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯
▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯
▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯
▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯
▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯
▯▯.▯▯.▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯
▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯, ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯, ▯▯▯▯ ▯▯▯
▯▯▯! ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯, ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯, ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯?
▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯?
▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯, ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯, ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯
▯▯▯, ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯? ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯?
▯▯.▯▯.▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯, ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯
▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯, ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯
▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯, ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯
▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯, ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯? ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯, ▯▯
▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯, ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯? ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯
▯▯▯, ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯, ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯?
▯▯.▯▯.▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯, ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯, ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯,
▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯ ▯▯▯▯▯
▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯
▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯, ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯
▯▯, ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯; ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯
▯▯▯▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯; ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯▯▯▯
▯▯▯▯▯▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯
▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯
▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯ ▯▯▯▯-▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯
▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯ ▯▯▯-▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯
▯▯▯▯-▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯-▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯
▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯-▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯
▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯
▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯▯▯▯, ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯
▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯
▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯, ▯▯ ▯▯▯
▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯
▯▯--▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯
▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯?
▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯, ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯
▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯?
▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯
▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯
▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯
▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯? ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯
▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯?
96

विचार यह करना चाहिए कि हम इस भारत भूमि अथवा अपने समाज अथवा अपनी संस्था का
सुधार किस प्रकार कर सकते हैं। सुधार का अर्थ क्या है। सुधार का अर्थ केवल कपड़े बदलना ही सुधार
नहीं।
यह तो केवल मन बहलाने वाली बातें हैं।कदाचित् वस्त्रांतर से रूप में कुछ हेर--फेर आये,
परिवर्तन आये, सौंदर्य आये, नवीनता आये, स्वास्थ्य का सुधार नहीं, शक्ति का
सुधार नहीं, वाणी का सुधार नहीं--तो क्या यह भी कोई सुधार की बात है, अथवा
रूप बदलना ही कोई सुधार माना जाता है? जिस प्रकार कम्बख्तों ने या किसी ने
हम सब लोगों का यह नक्शा बना दिया, क्या वैसा नक्शा बना रहना चाहिए?
जरा सोचो... यह बात ठीक नहीं, संसार में जो सब लोग जीवित या मरे हुए
कहलाते हैं। उनमें जीवन शक्ति का यदि कोई अंश विद्यमान था तो वह उनके विचारों का ही फल
था। विचार ही मनुष्य को मनुष्य व पशु बना सकते हैं।जब कोई मनुष्य यह विचार करता
कि मैं--दुःखी, पीड़ित वा अनाथ होकर संसार में एक दीन की भांति पड़ा रहूं अथवा जब वह, विचार
करता हैकि संसार में जितने बड़े कहलाने वाले हुए हैं उन सब का सहारा परमेश्वर था,जब वह भी
मनुष्य थे और ईश्वर ने उनको बनाया था तो ईश्वर मेरा भी पिता है।वह मुझको भी सुख दे सकता
है और मुझ पर भी कृपा कर सकता है।जब इस प्रकार विचार मनुष्य के हृदय पटल पर आते हैं तो
उसका रूप ही बदल जाता है।
बाह्यवस्त्रों से वह रूप नहीं बदल सकता।इसलिये यदि आप समाज का सुधार चाहें--
समाज का, व्यक्ति का, कुटुम्ब का, देश का, सब का, जहां भी--तो उस का बाह्य
सुधार मत करो। सुधार से मेरा यह तात्पर्य नहीं कि मैले-कुचैले वस्त्र पहनो या अन्य
रूप से रहो अथवा समाज बिगड़ा हुआ नजर आवे! वरन् विचार ऐसा होना चाहिए जिससे
भीतर का वह विकार निकल कर बाहर आ जाय! बाहर स्वच्छता नजर आवे, मन में, विचार में,
भाव में सब प्रकार की पवित्रता दृष्टिगोचर हो। यह केवल उपदेश देने से ही नहीं होगा। इसके
लिये स्वयं काम करना होगा।
विचार तो प्रत्येक करता होगा, पर ऐसा विचार जो केवल अपने स्वरूप
पर्यन्त ही सीमित रहे उससे समाज अथवा देश का भला होने वाला नहीं।यह तो नहीं
होगा कि? देश में विचार न हों? यदि विचार न होते तो हम सब मनुष्य न होकर
क्या पशु स्वरूप न होते?
जब यह बात है तो विचारिये, क्या हमारे देश में कभी इस बात की ओर ध्यान दिलाया
गया अथवा नहीं? यह विचार किसका? क्या मनुष्य का?
हां! पहले विचार तो मनुष्य का, उसके बाद समाज का।सबका उद्धार कोई
करे, यह किस प्रकार हो सकता? जब तक व्यक्ति का सुधार न होगा तब तक देश-सुधार नहीं
हो सकता, प्रत्येक व्यक्ति को जब तक ज्ञान, प्रत्येक बात का बोध नहीं, तब तक
विचार का रूप क्या हो सकता! जब तक यह न होगा, तब पारस्परिक प्रेम नहीं पैदा हो सकता।
जब तक विचार एक नहीं हो जाते तब तक परस्पर में भेद रहेगा ही, यह नहीं कि इस बात
को केवल सभा मंचों पर कह दिया जाय।कहने से काम नहीं चलेगा। इस बात को हृदय
में स्थान देना होगा।
विचार सब में एक से नहीं हो सकते, यह तो ठीक है।परन्तु? जो
बात सबको सुख देने वाली हो क्या उस पर भी मतभेद हो सकता है? कोई कहता है
ईश्वर को मानो कोई कहता हैकि ईश्वर को मत मानो।कोई कहता हैकि मूर्ति पूजा
करो, कोई कहता हैकि मूर्ति पूजा मत करो।परन्तु विचारिये तो, इस बात पर सब एक
हैं कि चोरी न करो।चोरी को सब बुरा कहते हैं।यदि आप किसी को कहें कि सत्य
बोलो तो कोई यह नहीं कहेगा कि असत्य बोलना चाहिए।माता-पिता की सेवा सब अच्छी
बतलाते हैं।इन बातों में मतभेद नहीं।जब इन सब बातों में एक मत हो सकते
हैं तो फिर पारस्परिक फूट का कारण क्या होना चाहिए?
कोई कहता हैकि संध्या करो।कोई कहता हैकि मत करो, पर जो मनुष्य
भी इस बात को कहता हैकि ईश्वर को स्मरण करो, वह यह तो नहीं कहेगा कि ईश्वर का स्मरण मत करो।
इसी प्रकार से सब बातें हैं।सत्य, सदाचार के नियमों का जो जो भी पालन करता
जाता हैउसका मनुष्य जीवन सुधरता जाता है।
इसलिये पहला नियम यह है, सब का सार यह हैकि प्रत्येक मनुष्य अपने विचार बदले, अपने
जीवन को पवित्र करे।विचार बदलने का यह अर्थ नहीं, जैसा कि आजकल लोग समझा करते
हैं, कि भाषा बदल लो अथवा वेश बदल लो।भाषा, वेशभूषा का तो विचार से कोई
गहरा सम्बन्ध नहीं।विचार बदलने का अर्थ क्या है? विचार का अर्थ हैकि अपने

97

□□□? □□□□ □□□□□□ □□□□□ □□□□ □□□□□□□□ □□□ □□ □□□ □□□, □□ □□□□ □□ □□□□
□□□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□ □□ □□□□□ □□□□ □□ □□□□□□□ □□ □□□ □□ □□ □□ □□□□ □□
□□□□□ □□ □□□ □□ □□□□ □□□□□□□ □□□ □□□□ □□□□ □□! □□□□ □□ □□□□□□ □□ □□□
□□ □□□□□□□□ □□□ □□□ □□□□ □□□□ □□! □□□□--□□□□□□ □□ □□□ □□□ □□□□□□!
□□□□□□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□
□□□□□ □□, □□□ □□□□□□ □□ □□□□ □□□ □□□□? □□ □□ □□□□□□, □□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□
□□, □□ □□□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□ □□□ □□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□□□
□□□ □□, □□ □□□ □□□□□□ □□□ □□□□ □□ □□□□□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□ □□□ □□□□□
□□ □□ □□ □□□□□□ □□ □□□ □□□□□!
□□□□ □□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□ □□□□□□□□ □□, □□ □□ □□□□□□□□□□ □□, □□ □□
□□□□□□□□ □□, □□ □□□□□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□ □□ □□□ □□ □□□ □□□□ □□□ □□□ □□
□□ □□□ □□□ □□□ □□ □□ □□□□□□□□ □□ □□□□□ □□□□ □□□--□□ □□□□ □□□□? □□ □□□□□
□□□□? □□ □□□□□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□□ □□□? □□□□ □□□□?
□□□□□ □□□□□?
□□□□ □□□□□ □□□ □□□ □□ □□ □□ □□□□□ □□□□□ □□ □□□ □□□? □□ □□□ □□ □□□□
□□ □□ □□□□ □□□ □□□□ □□□ □□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□□□□□□
□□□□□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□□□□ □□□, □□□□□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□ □□□□
□□□□□ □□□□□ □□□ □□ □□□□□□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□□□□ □□□□□□□□ □□ □□□□□ □□
□□□ □□□□□□ □□□ □□ □□□ □□□□ □□□□□□ □□□□□ □□□□, □□□□□□, □□□□ □□□□ □□□□□
□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□ □□□□□ □□□□□ □□□, □□□□□□□□ □□□□ □□ □□□□□□ □□□□
□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□
□□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□□ □□ □□□□ □□□□□□ □□, □□□□□ □□□
□□□□ □□□□ □□□□□□ □□ □□□ □□□□□□□ □□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□□□ □□ □□□□□□□□
□□ □□□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□□ □□□ □ □□ □□□□□ □□□□ □□□ □□□□□ □ □□□ □□
□□□□ □□□□□□□□ □□, □□ □□□□ □□□□□□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□□□□□ □□, □□□□ □□
□□□□□□□□ □□, □□□□ □□□□□□□□ □□ □□ □□□ □□□□ □□ □□□ □□□ □□□□□□□□ □□ □□□□
□□ □□□□ □□ □□ □□ □□□□□□□□□ □□□ □□ □□□ □□□□ □□□ □□□ □□□□ □□□□ □□? □□
□□□□□□□□ □□ □□□, □□□□□□□□ □□ □□□ □□ □□□ □□ □□□□□□ □□ □□□□, □□ □□□□□ □□□□
□□□□, □□ □□□ □□ □□□□ □□□□□□ □□ □□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□□□□□ □□ □□□ □□
□□□□ □□□□□□ □□ □□□□, □□ □□□□□□□ □□ □□□□ □□□□□□ □□ □□ □□□□, □□□ □□□□□
□□□□ □□ □□ □□ □□□□ □□□□□□□, □□□□ □□□ □□, □□□ □□ □□ □□ □□□□□ □□ □□□ □□□□□
□□ □□□□□ □□□ □□ □□ □□, □□ □□ □□□ □□ □□□□ □□, □□□□□ □□ □□ □□□ □□□□ □□□ □□
□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□
□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□□□□□□□ □□ □□□□□ □□□ □□ □□□ □□ □□□□□ □□□ □□ □□
□□□□ □□ □□□□□ □□ □□□ □□ □□□ □□□ □□□ □□ □□ □□□ □□, □□□ □□□□□ □□□□ □□□
□□□□□□ □□□□□ □□ □□□ □□□ □□□□□ □□□ □□□□□ □□, □□□ □□□□□ □□□□ □ □□□□□□ □□□,
□□ □□□ □□□□□□ □□□□ □□ □□□, □□□ □□□ □□□□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□□□ □□□□□□ □□□,
□□□ □□□ □□□ □□□□ □□□□□ □□□ □□□□□□□ □□□ □□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□ □□□□□□
□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□□□□□ □□ □□□□ □□□ □□□□□□ □□ □□□□□□ □□ □□□ □□□□ □□□□
□□□ □□□□□ □□□ □□□□□□□□ □□□
□□ □□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□□ □□□□□□ □□□□ □□□ □□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□
□□□□□ □□□□□□□ □□□ □□ □□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□□□□-□□□□ □□ □□ □□□ □□□□□□ □ □□
□□□□□ □□□□□□□ □□□□□ □□ □□□□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□□□□□ □□□□ □□□ □□□ □□
□□□□□ □□□ □□□ □□ □□ □□□□ □□□□□ □□□ □□□□□, □□□□ □□□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□□
□□ □□□□ □□□ □□□ □□□ □□□□□□ □□□□ □□□ □□□ □□ □□□ □□ □□□□□ □□□ □□, □□□□□ □□□
□□□□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□□ □□□□□ □□ □□ □□□□ □□□□□ □□□□□
□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□ □ □□ □□, □□□ □□□□□□ □□□ □□□ □□ □□□□ □□
□□□□□ □□ □□□□□ □□ □□□ □□□□ □□ □□□ □□ □□ □□ □□□ □□□ □□□□ □□□□ □□ □□□
□□□□□□ □□ □□□ □ □□□□ □□ □□□ □□□ □□ □□ □□□ □□ □□ □□ □□□□ □□□ □□□□ □□□,
□□□! □□□□□ □□□□□ □□ □□□ □□□□□□ □□□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□ □□□ □□?
□□ □□□□□ □□ □□□, □□□ □□□□□ □□□ □□□□□ □□ □□□ □□□□
□□ □□□□ □□ □□□□, □□□□ □□ □□□□ □□□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□□ □□□□□□ □□□□ □□
□□?
98

विचारो तो वो भी कितना प्यारा होगा जिसने इतना प्यारा बनाया! वो कितना सुन्दर होगा जिसने हम
सब को और इस सुन्दर संसार को रचना दी। जिसने तितलियों को रूप दिया जिन्होंने कोयल को कंठस्वर दिया।
उस रबने जिसने सब को सुन्दर बनाया और हम सबने उस सुन्दर रब को क्या बना दिया? वो कहते हैं मंदिर
में बैठता तो कोई कहे मस्जिद में तो कोई कहता वो काबा में बैठा, गिरजाघर में, कोई कहता वो
चर्च चला गया तो तुम्हारा दिमाग खराब हुआ कि नहीं? जिसे तुम कैद करने चले वो सर्वव्यापक परमात्मा
रोम-रोम, घट-घट व्यापता कण-कण जिसको ना पहचाना तो बेकार हो तुम, ना तुम संत कहलाने का हक
रखते और ना ही परमात्मा कहलाने का हक रखते।
वो कहते ना कि संत वो होता जो सबके साथ मिल के रहे प्यार से उसका ना विचार ना विचार सिर्फ
इंसानियत।
वो रब जिसने इतना प्यारा रूप दिया, वो कहते ना इंसान को तू इंसान समझ और इंसानियत की
जिंदगी जी और सबको प्यार से इंसान समझ कर इंसानियत की जिंदगी बख्श, क्यों
वो कहते ना इंसान वो इंसान नहीं जो इंसानियत का खून पीता है। वो इंसान नहीं, वो राक्षस
कहलाने के हक में होता, वो ऐसा इंसान कहलाने योग्य, इंसान कहने योग्य नहीं जिसको
मानवता पहचान ना आए। जो अपने ही भाई को मारकर ना जाने कौन सी बात हासिल करना चाहता,
उसने परमात्मा देखना तो बहुत दूर की बात, आत्मा तक नहीं समझी परमात्मा को तो क्या
देखना। वो इंसान जिसने इंसानियत त्याग दिया तो वो पशु समान हो गया और पशु भी अच्छा
प्यारे, जो मालिक जिसने पाला उसको वफादार बन के दिखाता तो इंसानों से तो पशु ही अच्छे जिन्होंने
अपने रब को तो पहचाना जिसने जन्म दिया उसको तो पहचाना पर इंसान ने अपने रब को भी नहीं
समझा, गिरजाघर मस्जिद बना दी, भगवान नाम दिया तो, अल्लाह नाम रख दिया। किसने हक दिया
उसको रब को बांटने का जिसने इंसान को इंसान बनाया? इंसान को हक किसने दिया जिसने परमात्मा
नाम रूप दिया?
इंसान वो इंसान नहीं जो रब को बांटता इंसान प्यार का रूप होता परमात्मा प्यार का रूप
जिसने सबको बनाया इंसान समझ, रब से इंसान प्यार कर सके इसीलिए इंसान बनाया इंसान को पर वो
इंसान रब बनकर बैठ गया इंसान इंसानियत भूल, ना ही खुद को पहचाना परमात्मा को क्या समझना
इंसान, संत बनने का दिखावा इंसानियत का नाम नहीं! वो कहते संत कहलाने का हक
इंसानियत को हक संत होने का पहचान ना दी हक संत कहलाने
दिया पर इंसान अहंकार में आ गया इंसान संत
इंसान वो ना रहा, जिसने परमात्मा खो दिया आत्मा, परमात्मा का ना रहा विचार
ना ही संत बचा जिसने अपने मन को परमात्मा समझ लिया। वो इंसान शैतान ही कहलाने योग्य
हुआ जो संत के भेष में ढोंग रचकर बैठा वो शैतान से बढ़कर क्या कहलाए। इंसान
आज इंसान जिसने संत रूप को कलंकित कर दिया। परमात्मा की माया अजब निराली उस
मालिक की लीला वो परमात्मा जिसको सब कहते जिसने कण-कण में रूप देखा-देखा वो रंग-ढंग
पहचान वो कहते जिसने खुद को संत घोषित किया, वो ना तो परमात्मा का रहा
उसने इंसानियत छोड़ दी आत्मा छोड़ दिया?
इंसान को इंसान का रूप ही दिया परमात्मा ने। इंसान को आज वो दर्जा
दिलवाया इंसान
रूप तो सब को मिला पर जो परमात्मा रूप को अपना लिया जिसने इंसान
को संत, गुरु रूप दिया रब ने। गुरु रूप परमात्मा समान होता जो अपने भक्तों
स्वरूप देकर सच्चा ज्ञान देकर प्रभु से जोड़ देता परमात्मा को, संत रूप इंसान का
रूप, ज्ञान जिसने आत्मा को दिया, ज्ञान जिसने प्रभु चरणो तक का रास्ता दिया, जो रब
कहलाए, वो संत कहलाए, वो गुरु बन गए, वो परमात्मा स्वरूप बन गए। इंसान
आज जो अपने आपमें गुरु, संत बनने का ढोंग करता, वो इंसान सिर्फ दिखावा
दिखावे का रास्ता ही चुन
रहा और जिस इंसान आत्मा परमात्मा के साथ मिलाई वो इंसान परमात्मा का रूप
बन गया। इसलिए वो संत, वो जो परमात्मा बन गये जिन्होंने तो परमात्मा देखा।
वो लोग संत कहलाए, वो लोग संत कहलाने योग्य रहे जिन्होंने, परमात्मा को
देखा जिन्होंने आत्मा को परमात्मा में लीन किया जिन्होंने अपना जीवन समर्पित किया प्रभु के चरणों
में। आज का जो संत वो अपने को रब समझने लगता वो रब तो नहीं, ज्ञान
क्या दिया? वो परमात्मा के गुण-गान तो करता पर उस रब को नहीं पा
सकता जो परमात्मा देखना चाहता वो सब त्याग करके परमात्मा को पहचाने
जिसने त्याग किया वो संत बन गया वो रब का रूप बन गया।
परमात्मा का रूप बनकर परमात्मा का कार्य कर रहा जिसने परमात्मा को पहचान
99

विनायकराव उनका यह रूप देखकर स्तब्ध, भय विह्वल होकर चुपचाप वहीं खड़े रहे। इसके बाद
फिर, भगवान सहाय का विकराल रूप और अधिक भयंकर होकर गरजने लगा। विनायकराव किसी
प्रकार हिम्मत बांधकर अपने कमरे की ओर रवाना हुए, परन्तु विनायकराव का पीछा भगवान
सहाय ने नहीं, वरन उस प्रेत रुपी विकराल शरीर ने किया। विनायकराव अपने कमरे में
खिड़की के पास बैठे ही थे कि प्रेत रुपी भयंकर रूप, जो पहले बड़ा, अब छोटा होकर पीछे
खड़ा दिखाई पड़ा। इसके पश्चात वह छाया विलीन हो गयी। इसके पश्चात बहुत दिनों तक इस प्रेत का
विनायक सहाय से पीछा न छूटा और प्रेत बाधा
मित्रों, यह प्रेत बाधा ही थी जो प्रेत के समान भगवान सहाय हमेशा विनायकराव, अपने
भाई तुल्य मित्र को डराता रहा। इस रूप में आकर भगवान सहाय ने यह स्पष्ट कर दिया कि मृत्यु के
बाद भी उसका प्रेत अपने भाई समान मित्र से बदला ले सकता है। जब प्रेत का विनायकराव पीछा
करता रहा तो वह किसी प्रकार भी अपने घर के कार्यों में हाथ नहीं बंटा पाया। परिणाम स्वरूप
गृह कलह, बीमारी विनायक सहाय के पीछे पड़ी; उनका व्यवसाय चौपट हुआ; परिवार के सभी लोगों को
इस प्रेत बाधा भुगतने को विवश होना पड़ा। जब तक, विनायक सहाय जीवित रहे प्रेत बाधा
भगवान की दी कृपा हमेशा हमेशा के लिए नहीं रहती। भगवान की दी इस कृपा को
भी मनुष्य संचित कर्मों के आधार पर नष्ट कर देता है। भगवान द्वारा दी गयी कृपा को मनुष्य
तब खोता समझें जब मनुष्य अज्ञानता के वशीभूत होकर कोई न कोई ऐसा पाप कर्म कर
बैठता जिसका असर विनायक सहाय की तरह ही दूसरों पर पड़ता है। विनायक सहाय ने केवल एक
गलती के कारण अपने, परिवार तथा इस प्रेत बाधा भुगतने वाले प्रत्येक व्यक्ति का जीवन
तबाह किया।
भगवान की दया हमेशा मनुष्य पर बनी नहीं रहती। इसका कारण भगवान की कृपा में कमी
का होना नहीं वरन मनुष्य की वह गलतियां तथा अज्ञानता जनित दुष्कर्म हैं जो भगवान की दी
कृपा को नष्ट कर--मनुष्य भगवान की कृपा को--खो देता, जब कभी मनुष्य
कर्म पाप, भगवान की कृपा के आधार को नष्ट कर देता है। भगवान का नियम
अज्ञानता की अज्ञानता रहने तक ही सीमित है। जब मनुष्य का यह अज्ञान कर्म का रूप धारण
करता है तो मनुष्य को उसका फल हर हालत में भुगतना ही पड़ता है! ऐसा
विनायक सहाय को भुगतना पड़ा इसलिए
मनुष्य को भगवान सर्वशक्ति सम्पन्न होने पर भी, यह सोच कर कि भगवान दया
कर रहा है तथा कभी हमारे अपराध को माफ करेगा व वह कर्म-बंधन से छूट जायेगा
भ्रम, हे मानव मत पालो, हे मानव यह ध्यान रखो हमेशा भगवान सबका भला तो कर सकता
पर वह पाप का फल अवश्य देगा। जब मनुष्य का यह पाप कर्म का रूप धारण कर लेता
तथा अज्ञानता का रूप त्याग कर अहंकार का रूप ले लेता है। अतः पाप कर्म,
अज्ञानता से नहीं वरन मनुष्य अपने मन-मस्तिष्क में द्वेष की भावना तथा अहंकार-युक्त
वासनाओं के वशीभूत होकर ही कोई पाप या गलत काम करता है। अस्तु पाप--मुक्त
रहो, गलत कर्म मत करो, गलत विचार मत रखो, निष्काम कर्म करो। निष्काम कर्म,
जो भगवान अर्पण, समर्पित होगा, वही मोक्ष का साधन बनेगा। मोक्ष प्राप्ति हेतु
हर हालत विषय-विकार त्याग दो, यह ध्यान रखो न कोई तुम्हारा है, न तुम किसी के हो, न
कोई तुम्हारा था।
जो कुछ तेरा भाग्य था वह प्रभु कृपा से मिला, जो तू प्रभु कृपा द्वारा भुगतेगा
उसका फल ही तो तुझे भोगना पड़ेगा!
भगवान दया का सागर अवश्य रूप से तुम्हारा दाता है! भगवान दया का
ऐसा भंडार है जो सदा खुला रहता है! भगवान दया की ऐसी गंगा है जो
मनुष्य के पापों को धोकर पावन बनाती है! भगवान दया का ऐसा सागर है जो
प्रत्येक का उद्धार करता है!
भगवान से बड़ा दाता और कौन? क्या कोई भगवान की तरह दया
करेगा? क्या कोई भगवान की तरह समझेगा? अतः तुम अपने लिए, प्रभु की शरण
ग्रहण करो। अपने लिए प्रभु से कुछ मांगो? भगवान से बड़ा दाता
संसार में कोई नहीं। जो कुछ वह दे सकता है वह और कोई नहीं दे सकता। जो
कुछ वह तुम्हारा बना सकता है वैसा कोई और नहीं बना सकता। अतः प्रभु
चरणों में विनायक सहाय की तरह नतमस्तक होकर रहो।
प्रेत बाधा, इस विषयक विस्तृत विवेचना कर यह सिद्ध करने का मेरा, यह उद्देश्य
रहा, कि प्रेत योनि, का भोग तब, ही प्राप्त होता है जब वह आचार-विचार से भ्रष्ट
हो कर मन से विकारों का शिकार बन जाय! अतः सदा मन वचन कर्म से प्रभु

100

भाग 6 (पृष्ठ 101-120)

कूपमें गिरे? उसको किसने रास्ता दिखाया? मरुस्थलमें वह क्या मरुमरीचिकामात्रके वश पड़ गया
था।
फिर उस साधकका सर्वस्वचोरीमें लुटनेसे बच भी जाय तब भी जीवनके लक्ष्य बिन्दुका
ज्ञान होगा कि यह जीवन किसलिये मिला और इसके मिलनेका फल क्या है? अज्ञानतावश यदि यह इस
पथ पर पैर भी रखना चाहे तब भी पग पग पर पग पग पर पग पग पर ठोकरें खा कर पथभ्रष्ट होकर
अन्तमें नरकका ही भाजन होगा या दुर्गति भोगने को मिलेगी।
इसलिए साधकको इस बातका विचार, सावधान होकर सावधानीके साथ कर लेना चाहिए
जिससे कि लक्ष्य दूर न रहकर प्राप्तिके अनुकूल हो जाय। प्रत्येक जीवको यह सोचना, विचार करना चाहिए
कि हमारे जीवनका क्या फल है? केवल पेट भरना? केवल सन्तानोत्पत्ति ही करना अथवा सब प्रकार
सांसारिक सुख भोगना मात्र ही इसका फल है? कदापि नहीं यह तो सब पशु-पक्षी भी भोग लेते हैं
मनुष्यके इस मानव तनका फल तो कुछ अन्य ही होना चाहिये?
जब तक आत्मा परमात्माके पदको प्राप्त न करले तब तक समझो कि जीव अज्ञानी, अचेत
तथा सब प्रकार अंधकार में विचरता, माया मोहके जालमें फँसकर आवागमनके चक्रमें भटक रहा है।
प्रत्येक आत्माको इस बातका चिन्तन करना आवश्यक है, जिससे उसकी आत्मा जाग्रत होकर,
मोक्षकी ओर अग्रसर हो सके। साधकको चाहिए कि वह अपनी आत्माको जागृत करे एवं परमात्माके पदका
सम्यक् रूपसे दर्शन करे। आत्माके परमात्माके स्वरूपको सम्यक् रूपसे जानकर तथा
पहचानकर मोक्ष प्राप्तिका यत्न करना उचित होगा। इसलिए आवश्यक हैकि पहले साधक, स्वाध्यायके
माध्यमसे तत्त्वका
पूरा बोध कर सत-असत्का, स्व तथा परका सम्यक् अन्तर जाने। जब तक सत क्या है? यह न जाने
तब, क्या असत् से पृथक् रहेगा? जब तक यह जानेगा, कि असत् किसे कहते हैं?
असत्का रूप क्या है? साधकके लिए असत्, हेय वस्तु, त्याज्य वस्तु, सब प्रकार त्याज्य वस्तु
केवल मात्र ही त्याग ही करने की वस्तु है। इस प्रकार जब सत, असत् का भेद भली प्रकार जान
लेगा तब, स्वतः उस असत्का परित्याग कर देगा। वह त्यागके लिए किसी प्रकार यत्न न करेगा
क्योंकि, जब यह ज्ञानके प्रकाशसे जान जायगा कि असत्का तो स्वरूप ही त्याज्य है, वह त्यागनेयोग्य
ही वस्तु है। इसलिए वह स्वयं ही असत्का त्याग न कर देगा, स्वतः त्यागके रूपमें परिणत हो जायगा
फिर उस त्यागको त्याग भी, त्यागके रूपमें ग्रहण नहीं करेगा। तब त्यागका अहंकार भी समाप्त
होकर त्याग भी एक सहज स्वाभाविक रूप धारण कर लेगा। यही बात स्व तथा परके सम्बन्धमें
कही जा सकती है। जब तक आत्माको यह ज्ञान नहीं हो जाता कि आत्मा, जिसको केवल ज्ञान
दर्शन रूप अथवा चैतन्य रूप माना गया है। वह ज्ञान दर्शन स्वरूप आत्मा न किसी अन्यके रूपमें
परिणत हो सकती है। और न ही यह अन्य रूप परिणत हो सकती है। जब आत्माका अन्य किसी रूपमें
किसी प्रकार से परिणमन नहीं--हो सकता, तब यह, यह सोच--समझ कर कि यह अन्य समस्त
संसारी वस्तुएँ आत्मा से भिन्न हैं? अतः इन भिन्न वस्तुओंका आत्माके साथ सम्बन्ध
अस्वाभाविकहै। यह भाव ही अनादिकालसे इस जीवके साथ लगा हुआ है।
इस प्रकार का ज्ञान जब आत्मा को होता है? तब आत्मा स्वाभाविक रूप से, समस्त
वस्तुओंके साथ जो मोह सम्बन्ध है उसको तोड़ देता, समस्त सांसारिक बन्धन टूट जाते
तथा आत्मा जाग्रत होकर उस! परम तत्त्वके स्वरूपको पहचान कर समस्त भय से रहितहोकर
अपनी ही सत्तामें स्थित होकर निर्वाण स्वरूपको प्राप्त कर लेता है। वास्तवमें यह जीव जबतक स्वयं
अज्ञानी, उस अवस्थाको प्राप्त करनेके यत्नसे अपने मुखको मोड़े रहता है तबतक, अपने स्वरूप
लक्ष्य को जानकर उस पद रूप निर्वाण स्वरूपको प्राप्त नहीं कर सकता। अत एव ज्ञानी साधकको
इस पथका दर्शन प्राप्त कर! इस प्रकार अपने स्वरूपको जाग्रत करके उस लक्ष्यको सिद्ध करना
चाहिए।
आत्मा को यह विचार करना होगा, केवल विचार मात्रसे ही कल्याण सम्भव तो नहीं हो
सकता केवल विचार ही, उस आत्माको जाग्रत करके अपने स्वरूपको अवश्य करा सकता, किन्तु उस ज्ञान
को धारण करके ज्ञानके बताए पथ पर जब तक चलेगा नहीं, तबतक उस पदको प्राप्त नहीं, कभी
कर सकता अतः, ज्ञान मात्र साधन मात्र, केवल ज्ञान साधन मात्र, ज्ञान मात्र साधन मात्र ही
साधन मात्र, कल्याणका मार्ग नहीं, कल्याणका मार्ग स्वाध्याय रूप ज्ञानके साथ साथ, उस ज्ञान
को उस पथको भी धारण, करना, उस पथ पर चलनेके लिए सतत प्रयासरत रहना आवश्यक है।
केवल ज्ञान ही सब कुछ कर सकता, यह कहना न्याय संगत नहीं कहला सकता। इसलिए ज्ञानके
साथ साथ उस ज्ञान रूपी दीपकको सम्मुख रखकर उस पथ पर उस मार्ग पर चलना होगा। अतः
ज्ञान, जिसका प्रतिपादन पूर्व शास्त्रमें किया गया, उस ज्ञानको समझ, कर जान...
कर आत्मस्थ करके उस पर ही पग आगे रखना इस जीवका कर्तव्य होगा! तभी यह
स्वाध्यायका फल, आत्मा को प्राप्त हो कर मोक्षका मार्ग प्रशस्त होगा
101

इस पृष्ठ पर उपलब्ध मूल देवनागरी लिपि के अक्षर फॉन्ट रेंडरिंग/एन्कोडिंग त्रुटि के कारण प्रदर्शित नहीं हो रहे हैं (सभी अक्षर 'Tofu' यानी खाली आयताकार बॉक्स ▯ के रूप में दिख रहे हैं)।

केवल विराम चिह्न (punctuation marks) और पृष्ठ संख्या दृश्यमान हैं। चूँकि मूल अक्षर पूरी तरह से अपठनीय/अनुपलब्ध हैं, इसलिए इसका देवनागरी पाठ में लिप्यंतरण (transcription) संभव नहीं है।

दृश्यमान संरचना और विराम चिह्न (Line-by-Line Representation):

▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯, ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯
▯▯▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯, ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯
▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯; ▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯; ▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯
▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯; ▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯
▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯, ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯
▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯ ▯▯▯
▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯
▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯
▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯
▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯-▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯
▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯-▯▯▯▯▯▯▯▯
▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯
▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯-▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯? ▯▯▯ ▯▯▯
▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯? ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯
▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯? ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯
▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯? ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯,
▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯?
▯▯▯ ▯▯▯▯, ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯
▯▯▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯
▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯
▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯
▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯
▯▯▯▯, ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯, ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯
▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯
▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯
▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯
▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯
▯▯▯▯, ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯, ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯
▯▯▯▯, ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯
▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯
▯▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯, ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯
▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯! ▯▯ ▯▯, ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯
▯▯ ▯▯▯▯▯▯-▯▯▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯, ▯▯
▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯, ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯, ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯, ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯
▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯, ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ "▯▯ ▯▯", ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯
▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯
▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯-▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯
▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯, ▯▯ ▯▯▯▯
▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯
▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯, ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯
▯▯▯, ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯, ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯--▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯
▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯
▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯, ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯, ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯
▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯, ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯
▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯, ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯
▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯, ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯
▯▯▯, ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯?
▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯
▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯?
▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯, ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯
▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯
▯▯▯▯, ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯

102