माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)
Mati Kahai Kumhar Sun (Kabir Sakhi and Saint Stories)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त) · राजयोग मेडिटेशन अकादमी / ओशो · 1974 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंजीवन का सार-तत्त्व प्रेम
मुकुट बिहारी
शिक्षक एवं कवि
आनो प्रेम स्वरूप पहचानें!
कामिनी-कंचन से, पदलोभ-प्रतिष्ठा से हटकर जो प्रेम का पथ खोजता है, वही
प्रेम का स्वाद पा सकता है, जो केवल सब कुछ लुटाकर बदले में कुछ भी न चाहे,
केवल दे-दे ही, जिसके हर रोम-रोम में और हृदय व मन मस्तिष्क के पोर-पोर में त्याग
ही हो, उसके ही प्रभु हैं, न कभी वो हार माने, न किसी से गिला करे शिकायत ही करे
उसका सारा जीवन निष्काम हो जाता है सहज ही। उसे सभी में प्रभु
ही तो नजर आते हैं। सारा विश्व ही उसका अपना घर बन जाता है। किसी से
भी, हर हाल में निःस्वार्थ प्रेम करना चाहिए क्योंकि हम ईश्वर के स्वरूप हैं और
सब परस्पर ही परमेश्वर रूप हैं, तो किसी से नफरत या ईर्ष्या-द्वेष का भाव
ही बेकार होता है।
केवल मनुष्य ही ऐसा जीव इस धरा पर देखा गया, जो हर वस्तु, व्यक्ति से
कुछ न कुछ पाने की इच्छा से रिश्ता या संबंध तय करे? लेकिन जबसे यह भाव मन
में आ जाता है, मनुष्य का पतन तय है, इसलिए हर हाल में सब निष्काम
होकर ही जीवन को जिया जाए? प्रभु सब स्वरूप से ही साक्षात्कार हो, ही तो
वास्तविक परमानंद होगा।
प्रेमियों की पहचान या स्वभाव ऐसा ही होता साक्षात्कार ही हुआ और
प्रभु मिल ही गए, फिर संसार के हर संबंध सब गौण ही रह जाएंगे। जब
सब अपने ही रूप नजर आने लगे, फिर द्वेष तो दूर विलीन ही होगा।
मनुष्य तो इस संसार रूपी सागर पार कर सकता है, उसे ही प्रभु
मिल सकेंगे, जो किसी को धोखा न देवे। सब जीवों पर दया भाव रखे।
जो हर पल, निष्काम ही हर कार्य करे। तब प्रभु कृपा बरसेगी।
क्या ईश्वर को पाना है? तो हर पल ऐसा कर्म करना होगा कि किसी का दिल
मन या तन को ठेस पहुंचे ही न हो, तभी वो प्रभु रूपी प्रेम हृदय में प्रकट हो
सके न क्या?
हर तरह से मन तृप्त हो जाता प्रभु की कृपा से। प्रेम ही परमात्मा स्वरूप है।
इसलिए सब से ही सदा ही सदा के लिए प्रेम से ही रहो।
प्रभु से सच्चा संबंध ही मन को सब भय से मुक्त करता है। ईश्वर
सदा सत्य होता है। वो कभी न मिटने वाला ही सत्य का नाम है, सो ही
विकार-मुक्त ही होकर हम परमात्मा को पा सकते हैं। सब कुछ पाकर मनुष्य
भी न पा सका तो अज्ञानता ही समझ कर प्रभु से जन-जन प्यार करे ही तो।
मनुष्य तो हर इंसान से उम्मीद बांध कर बैठा रहता है। किसी से
संबंध भी तभी करता है। प्रेम में केवल समर्पण होना चाहिए। प्रेम तो केवल
ही तो है, त्याग ही इसका रूप है। प्रेम तो सब को ही सब कुछ देता
बदले में अपेक्षा न रखे। मनुष्य तो फिर भी ऐसा ही भाव रख कर चलता
रहता है। तभी तो परमात्मा से दूर ही रह जाता है।
प्रेम तो कभी भी मिट नहीं सकता। प्रेम कभी भी वासना नहीं हो
ही सकता। वासना केवल मन की विकृति मात्र होती है। प्रेम तो शुद्ध रूप
केवल परमात्मा रूप ही सब जीवों में नजर आता, तभी परमात्मा मिल
पाते, वासनाओं से छुटकारा पाना ही प्रेम, जो भी प्रेम सदा किया जाता वो ही
सच्चा प्रेम होगा।
निष्काम भक्ति ही श्रेष्ठ कहलाती है। प्रेम सब तरफ विद्यमान है,
मनुष्य रूपी मानव समाज प्रेम रहित हो गया। इसी कारण संसार में अशांति
चारों तरफ व्याप गई। मनुष्य से मनुष्य के संबंध केवल स्वार्थ तक ही रह
गए। जिस से समाज में अशांति-अव्यवस्था फैली, हर कोई परेशान नजर आ
रहा। आज जरूरत फिर से भाईचारे, प्रेम, दया की है। नर-नारायण
परमात्मा रूप, सो माता-पिता रूप में जननी-जनक ही पूजनीय हैं। हर कोई
फिर से नर-नारायण का स्वरूप बन जाए।
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