माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)
Mati Kahai Kumhar Sun (Kabir Sakhi and Saint Stories)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त) · राजयोग मेडिटेशन अकादमी / ओशो · 1974 (उद्गम)
पृष्ठ 88, कुल 154 में से
संदर्भ में पढ़ेंइस प्रकार वह मुनि उस नगर का सब वृत्त कह कर चुप हो गये अथवा उन्होंने मौन
अवलम्बन कर लिया, पश्चात् राजा ने, उन मुनि राज द्वारा वर्णित चरित्र को सत्य समझ
विचार कि 'अहो ? आगामी काल में इस प्रकार राज्य का फेर-बदल हो
जायगा अतः, मुझे अपने ही सामने चक्रधर धर्मात्मा पुत्र होगा, सो उसी समय राज्य
का प्रबन्ध करके, पश्चात् मुझे संयम का फल जो मोक्ष वा स्वर्ग पद प्राप्त कराएगा उसी का
नाम ले कर सदा, एकाग्र चित्तता धार समय बिताना
वा सुख-दुख भोगने वाले का सब काल ही क्यों ? सो अविचार्य ही उचित
समझ कर, सब सोच विचार छोड़
दिया । पश्चात् राजा ?
कहने लगा, महाराज जिस समय इस, पुरोधा पुत्र का इस चक्रि-वंशज रूप
होगा, सो तो अवश्य होगा
परन्तु अब, तो कोई उपाय फेर-बदल करने योग्य ऐसा करो, जिससे पश्चात् ही
अवश्य फल, हो सो उपाय करना उचित होगा
सो इस पर वह मुनि मण्डप प्रविष्ट हो कर भी, सो सब-कुछ कह सका क्या ? क्योंकि
भूत वा भावी तो प्रत्यक्ष ज्ञानी ही जान सका करता है । राजा ने उस समय विस्मय युक्त
होकर जो जो वचन कहे सो सो, राजा उस समय केवल ही कहने लग गया था क्योंकि ज्ञान-
रूपी समुद्र का धारक मुनि केवल ज्ञान मण्डप से चला गया था, चक्र-वर्ती ! आपके
इन दोनों का रूप परिवर्तन हो कर सब फेर-बदल होगा क्या ?
वा अथवा अन्य का ? अथवा किसी का ? अथवा किसी का ?
अथवा इस सब का ही फेर-बदल होगा क्या ? महाराज श्री अरिहंत, गुण समूह
विशेष अवधारने वाले मुनि द्वारा सब प्रकार का सब भाव प्रकाशित रूप कह दिया वा
संशय रहित कर दिया ? सो राजा ने, जो, फेर-बदल हो रहा था, उस रूप का ज्ञान
वा स्वरूप रूप कथन किया था, सो फेर-बदल हो गया ? सब राज सभा के अन्य
सब लोग उस पर चुप ही रहे तथा मुनि महाराज के कहे अनुसार ही राजा का यह सब
बात कहना हो गया फेर-बदल ?
पश्चात् उस न केवल काल और स्वरूप का फेर-बदल सम्बन्ध ही उस समय राजा-
मुख से कहा गया था बल्कि पश्चात् जो जो सम्बन्ध भी हुआ, सोई अन्य सम्बन्ध पूर्वक
ही हुआ, सो, उस सब का ही, सार या अंश जो भी कहा गया सत्य हुआ, यथा राजा
उस समय चिन्ता युक्त हो कर मन में इस प्रकार विचार करने लगा कि पुरोधा का
जो यह रूप अन्य का होगा सो फेर या फेर-बदल होगा क्या ? सो अवश्य होगा तथा
सो फेर क्या ? राजा भी इस सोच विचार
द्वारा विस्मय पूर्वक, विचार कर फेर-बदल को सत्य मान कर शान्त चित्त
अवलम्बन कर गया, पश्चात् वह फेर-बदल ? कैसा हुआ यह भी विचारने का ही रूप
ठहराया, परन्तु उस सब का खुलासा यह हो गया कि जिस रूप में, जो सब भी हुआ
सो सर्वथा सत्य था, सो फेर-बदल क्या सो इस प्रकार हुआ ! महाराजा पुरोधा,
द्वारा रक्षित कन्या को ? वा इस सब रूप को ? पश्चात् राजा, उस समय किसी भी
अन्य स्थान पर पुरोधा का रूप फेर तथा फेर-बदल का विचार कर व्याकुल हो
कर व्याकुल चित्त द्वारा चिन्ता कर, कि हाय बड़ा आश्चर्य अघटित घटित हुआ !
सो फेर-बदल था ! राजा के मन में सोच का उदय हो गया कि क्या यह सब
अघटित ही ? सब मन का भ्रम था ? पश्चात् राजा सोच के निमित्त सब चिन्ता
का ही फल प्राप्त हुआ
इन दोनों कन्या वा राजा दोनों द्वारा पूर्व में, संयम का फल, उपभोगपूर्वक
ही प्राप्त, भोगकर या भोग--सहित, रूप तो परम्परा से सब राज्य वैभव प्राप्त हुआ,
ज्ञान का रूप सर्वदा यथार्थ स्वरूप ही सब के मन में प्रकाश करने योग्य बना
जिससे उस सब प्रकार की सो ही जो स्वरूप ज्ञान द्वारा राजा को ज्ञान कराया था,
पश्चात् राजा को अन्य उपाय द्वारा यत्न करने पर ज्ञान हुआ, विचार केवल ज्ञान
रूप ही प्रकट होकर शान्त भाव रूप में प्रकाशमान हुआ सो, राजाधिराज सब राज
मण्डली युक्त हो, उस सब समाचार को सुन कर सन्तुष्ट
पुरोधा रूप का फल भोगकर, जो धर्मात्मा, रूप धारण कर मोक्ष पद--सम्बन्धी
रूप फल को प्राप्त कर केवल ज्ञान रूप होकर सर्वज्ञता द्वारा प्रसिद्ध हुआ, यथा राजा
चक्रवर्ती द्वारा राजा को विस्तार से जो संशय रूप था सब त्याग योग्य समझ कर
शुभ फल को, सब ओर, सो ही दिया था, जिससे केवल ज्ञान प्रकाशित