सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)

माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)

Mati Kahai Kumhar Sun (Kabir Sakhi and Saint Stories)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त) · राजयोग मेडिटेशन अकादमी / ओशो · 1974 (उद्गम)

DevanagariHindipublished154 पृष्ठ

पृष्ठ 89, कुल 154 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 89

ब्राह्मण को तो अपनी जीविका चलाना कठिन होगा, और उनका भी, जो कि निर्वाह
पूरा धन से कर रहे तथा बहुत दिन यहाँ काम किया पर अब काम छूट गया और उनको
घर पर सब कुछ बहुत महँगा लेना पड़ता है वह बहुत दुःख में पड़े होंगे तथा जो लोग
पर कोई बड़ा भारी संकट आ पड़ा है वे लाचार, और काम बंद होने लगा तो उनके
निर्वाह कैसा चल रहा होगा यह सोच लो।
पर कुछ लोग धनवान तो बहुत ही हो गये, पर उनके मन दया या धरम का तो
पर लेस भी नहीं पाया जाता है वे केवल अपने स्वार्थ को देख रहे होंगे, तो उनका
क्या ही कहना।
यहाँ पर सब कुछ विचार लो, जिससे सबका ही हो भला ऐसा उपाय क्या है?
परमेश्वर सबका भला करे, जिससे कि सब ही सुखी, और सब को शान्ति
प्राप्त होवे यही सब समय में हमारा तो विचार और यत्न होना आवश्यक कहा है,
इसलिए जो सुखी या धनी, उनका कर्तव्य तो यही होना बड़ा उचित कहा जा
रहा है इसके सिवा, आत्मनिर्भरता देश--हितैषिता की दृष्टि से--विचारपूर्वक सब
कामों का सुधारना ही सब समय कर्तव्य माना गया विचारशील को, जिससे कि,
आत्मनिर्भर सब ही प्रकार होना सब देश वासियों का हो सके और देश आगे बढ़
सके ऐसा ही यत्न सब को तन मन धन लगा कर करना चाहिए, जिससे सब काम आगे
बढ़े; यहाँ विचारने की बात यह भी है कि देश भरमें व्यापार का, उद्योग और विद्या
सब बातों में सुधार, की प्रार्थना सब लोग देश भरमें करते रहते तथा सब प्रकार से
सब ही से सहायता पूर्ण प्राप्त होना देखा जा रहा।
अब यह सब सुधारने का उपाय क्या हो सकता है, सब लोग यह विचार कर
उद्योग कर रहे हैं और हम भी अपने इस पत्र द्वारा सब ही के साथ अपने विचार रख
रहे हैं तथा, अन्य काम जो कर ही रहे हैं वे तो चले ही जावेंगे।
सरकार भी तो बहुत कुछ, विचार तो कर ही रही, सुधार के यत्नों
का काम, विचार को देखा, बहुत विचारपूर्वक सरकार स्वयं न कर सके! तो यह तो सब
लोग समझ ही तो गये होंगे ही, क्या विचार उनका इन सब पर होना ही नहीं है?
या सब विचार व्यर्थ है, यह तो प्रजा कभी विचार ही नहीं कर रही है?
बात यह, कि कानून तो प्रजा के, हित का विचार ही करके बनाया जाता
तथा यह केवल प्रजा के फायदे लिए ही, प्रजा प्रतिनिधियों का, यह यत्न रहता
कि कानून ऐसा ही बने कि जो प्रजा लिए ही भारी लाभ का, प्रजा इसलिए सब बात
पहले विचार कर सब बातों पर पूर्ण ध्यान देकर ही सब काम किया करती,
प्रजा कार्य को सब देख कर, प्रजा कार्य को सब लोग बड़ा ध्यान पूर्वक विचार कर सब
से काम लिया करते यह तो प्रजा भली प्रकार से सब ही को समझा रही समझा, पर जो
सब लोग कुछ भी बात अपने काम आगे नहीं देखते या कोई बात समझे ही, उनको
कोई प्रजा अथवा सरकार कुछ भी कह नहीं सकती तो फिर क्या ही, पर वे लोग बहुत ही
अधिक काम में आ रहे हैं ऐसा विचार नहीं है।
हमारा काम केवल यह देखना, और काम को सुधारने का उपाय करना ही
कहा, सो कर्तव्य के काम को सुधारने वाला काम सदा उचित समझा जाता ही है,
जिससे कि काम आगे बढ़ सके, केवल बात ही नहीं, जिससे सब सम्भव काम सिद्ध
हो सके। यह बात बहुत ही उत्तम है, विचार करने वाले समझ रहे तथा आगे
विचार भी सब कर रहे होंगे, सहायता सबको मिलना चाहिए पर इस बात को
सब ही सोचे, सरकार सहायता सब प्रकार सब को देवे ऐसा न बन सके
इसलिए सब को सब प्रकार से, काम स्वयं करने की चे--ष्टा करे, सब प्रकार की
विद्या को, धन, बल को सब प्रकार सब प्राप्त करे, यह सबको ही देखना और
जानना आवश्यक समझा जा सकता तथा इस कर्तव्य को पूरा करके ही आगे बढ़
सकते सब लोग ही यह बात तो सदा याद रखनी चाहिए जो कि सब प्रकार आगे बढ़ने
को न सब समय सदा सोचा करते जिससे सबका कार्य सिद्ध होवे, सरकार से
सब आशा सदा रखना उचित न होगा ही सरकार से, सहयोगपूर्वक सब को
सहायता लेन ही यह बात
इस विषय पर अधिक क्या कहा जायगा सब बातों का सार तो यही कहा जा
रहा तथा रहेगा ही, पर यह विचार तो देखा जाता ही सदा रहा है ही रहेगा. जो
केवल दूसरों के, पर ही निर्भर ही रहता वह कभी आगे नहीं बढ़ पाता केवल
सरकार ही, पर निर्भर हो रहने वाला तो सदा निर्बल बना ही रह जाता
इसलिए सब लोगों को तो सब प्रकार अपने काम को सदा अपने भरोसे ही पर निर्भर ही
89