माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)
Mati Kahai Kumhar Sun (Kabir Sakhi and Saint Stories)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त) · राजयोग मेडिटेशन अकादमी / ओशो · 1974 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंइस पर शिष्य ने पूछा कि जब हम परमात्माका भजन, पूजन करतेहैं तो हमारे कष्टनिवृत्त,
विद्या और धन आदिकीसिद्धि सहज क्यों नहीं होती? इसका समाधान यों समझना चाहिये
कि जो पुरुष जैसा कर्मकरताहै, वैसा हीउसका, वैसा हीअन्यका, वैसा हीसृष्टिका,
फल परमात्मा व्यवस्था करदेताहै अर्थात् जिस कामके करनेकीजिसको जो सामर्थ्यहै
उसी कामके अनुकूल फल परमेश्वर उसको देताहै पर किसीके कर्मको दूसरानहीं हरसक्ता
जो कोई जैसा काम करे उसका फल परमात्मा उसको वैसा हीदेता है, पर किसी का फल
किसी को नहीं दे, अन्याय कभीनहोवे; इसीसे संसार अपने अपने कर्मोंका, सुख वा दुःख
भोगे, न्याय कर्त्ता का ऐसा न्याय होना चाहिये कि अपराधीको दण्ड और जिसने भला काम
करा हो उसको उसका बदला मिले इसी से जगत्कर्त्ता की महिमा वा न्याय विख्यातहै, इसके
पर कुछ संशय, अविद्या वा कुतर्क करना वा परमात्मा की महिमाके जानने वाले को कभी
नहीं
होता तब शिष्य को ज्ञान हुआ, योग्य कहा, इसमें सन्देहकिसीबातका नहींहै परन्तु
यह अवश्यहोना सिद्ध हुआ कि ईश्वर का ज्ञान सबसे अधिकहै इस कारण कभी किसीका
अज्ञान कभी नहीं होगा इसी से ईश्वरका यह काम है कि सर्व जगत्का सब से उत्तम और
उपकार करने के निमित्त सर्वदा सत्य ज्ञान सब जीवों के लिये प्रकाशित करे सो किया, सो
किया जिस ग्रन्थ का--नाम वा व्याख्या जिस प्रकार से है सो कृपाकर के समझाइये
सो, हे शिष्य-सुनपरमेश्वर वेद का ज्ञान सब विद्याओं सहित जगत् की आदिकाल में सर्व जीवों
के उपकार केलिये कर, जो विचार के परमेश्वर का किया जानकर उस ग्रन्थका ज्ञान
विचार के सत्य धर्मका आचरण करे तो सब जगत् सुखी हो जावे, इसका नाम
वेद ज्ञान कहते हैं इसका कारण यह है कि जैसा ज्ञान ईश्वर का वैसाही सत्य प्रकाश है, जो उस
सत्य ज्ञान को ईश्वर न प्रकाशित करता तो, मनुष्यों को कुछ सत्य ज्ञान नहीं होता और
सब लोग अज्ञानमें रहते, इसलिये ईश्वरने सत्य ज्ञान सब जीवों के हित के लिये अपने
सर्वसामर्थ्य करके, जगत्की आदिकाल में सब जीवों के लिये चार वेदों का ज्ञान चार
ऋषियों के अन्तःकरण मेंदिया
सो चारों वेद चार ऋषियों के अन्तःकरण में उत्पन्न कर मनुष्यमात्र का सर्व सुख के
लिये सब जगत् मेंफैला, सो चारोंवेद ईश्वर कृतविद्या के प्रकाश से प्रकाशित विद्या जो
सब संसार मेंहै, सो सब वेदों की विद्या का ही प्रकाश जानना यह जान शिष्यने हाथ
जोड़कर विनय कर के कहा
हे सत्य स्वरूप के जानने वाले महाराज आप कृपा कर यह बतलाइये कि, किस
प्रकार से ईश्वरने चारों वेदों को रचा है! किस का क्या नाम? कितने २ भेद हैं? चार
वेदोंका क्या २ अर्थ? वेदोंका प्रमाण क्याहै सो कृपा कर के मुझे समझाइये जिससे मेरा
सब? भ्रम, संशय, छूटजावे, इसपर गुरु बोले, हेप्रिय! सुन तुझे जो २ सन्देह वेदोंके
विषयमें हो सब निवारण करता हूँ तूचित्त देकर सुन? इसमेंप्रथम, ऋग्वेद का स्वरूप, जो
कि ज्ञान, जिससे सब सत्य विद्या जानी जावे! दूसरे का नाम, यजुर्वेद जिससे कर्म? तीसरे
का सामवेद जिससे ज्ञान वा उपासना? चौथे का नाम अथर्ववेद, जिस करके सब कर्म
और सब संशय दूरहो जावें, सो ईश्वर ने, इन वेदों को चार ऋषियों के अन्तःकरण
मेंरचा सो विस्तार-पूर्वक सुना ता हूँ, सो ध्यान देकर सुनकि जिस का जो नाम
ईश्वरने जिसप्रकार रचा सो कहता हूँ किजब इस जगत् की आदि मेंईश्वरने सब सृष्टि
को रचा, उस समय, सब, जीवों के कर्मोंका फल देने के लिये शरीरों का योग किया
उस सब के सब लोग जो उत्पन्न हुये, केवल बालक के समान अज्ञानवाले थे उनको
कोई ज्ञान वा गुरु कोई नथा इस से उनका और उनके पीछे होने वाले लोगोंका
सब सुख नष्ट होजाता इस हेतु से दयालु परमेश्वर, बालकों पर पिताके समान सुख देनेके
लिये, सत्य ज्ञान सब के सुख केलिये प्रकाशित
किया सो वेद, अब तू इन चारों वेदों का विषय सुनता जा?
प्रथम यह, ज्ञान का वा विद्या का प्रकाश करने वाला
ऋग्वेद सो प्रथम अग्नि ऋषि के अन्तःकरण मेंरचा?
सो किस के लिये, सो तू जान कि जितने जगत्के पदार्थ, सब का ज्ञान सर्व लो
गको कराने केलिए रचा
दूसरा यजुर्वेद सो सब विद्या के कर्म कांड का प्रकाश करने वालाहै,
जिस करके यह जान पड़ता है कि जो जो उत्तम काम करने के निमित्त जो आज्ञा है
ईश्वर की सो सब मनुष्य २ कर सब जगत्का भला करकेअपनेलिये परम सुख प्राप्त हो, सो
यजुर्वेद का ज्ञान सब के सुख केलिये वायुऋषि के अन्तःकरण में ईश्वर ने प्रकाश किया
अब तू तीसरे साम वेद का सुनो कि
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