माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)
Mati Kahai Kumhar Sun (Kabir Sakhi and Saint Stories)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त) · राजयोग मेडिटेशन अकादमी / ओशो · 1974 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंविचार कर प्रत्येक निर्णय लेना चाहिए व प्रत्येक विषय पर विचार परस्पर होना चाहिए जिससे
कि व्यक्तिगत रूप से निर्णय अन्याय पूर्ण बन कर रह न जाये ताकि हर एक न्याय पाकर सन्तुष्ट
इसलिए प्रजाजन को भी शांत रहना चाहिए कि जो राज्य व्यवस्था बनाई जावेगी वह भी
प्रजाजन की भलाई का ही ध्यान रखकर आवश्यकतानुसार बनाई जा सकती इसलिए राजा का वचन
मानना होगा, और राजा को भी प्रजाजन निष्ठा का ध्यान रखना पड़ेगा।
संक्षेप वार्ता, समस्त प्रजा शांत होकर बैठ
पर राजा का न्याय कुछ और ही प्रकार का हुआ। राजा निष्पक्ष न्याय का वचन दे रहा
इसलिए सब जनता शांत हो कर न्यायाधिकरण की आज्ञा सुनने लगी कि सब
प्रजाजन यह जान ले कि प्रजाजन निष्पक्ष न्याय व आज्ञा पर निर्भर रहा करते हैं। जैसा
न्याय सब मनुष्य पर लागू हो सके, जो दोषी होगा उसको सजा मिलेगी ही मिलेगी पर कोई
निर्दोष राजा से अन्याय नहीं पा सकता है सो, राजा ने कहा
महाराज यह निर्णय होना चाहिए कि राज्य व्यवस्था को सुचारू रूप देने वाले
अधिकारी जन स्वयं हैं, जो कि न्याय दिला रहे अथवा जो प्रजाजन आज्ञाकारी बनकर रह रहे
सो इसका फल सब प्रजा जनो को मिलना ही चाहिये पर केवल न्याय व्यवस्था में भेद हो तो उस
विभेद का भी निर्णय हो जाना व होना
सो कहा सब राजा महाराजा तो हो ही जाते पर उन सब का भेद जानना
एक ही न्याय का फल हो सके ऐसा संभव होगा? राजा तो केवल यह, राजा से सब
भय खायें सब प्रजा न्याय मांगें और राजा दे देवे ऐसा न्याय तो प्रत्येक राजा
स्वयं करता रहा सो न्याय का फल न होने पर भय तो बना रहेगा न्याय व्यवस्था सब पर
लागू हो यह होना ही चाहिये पर ऐसा न हो! राज्य सत्ता के बल पर राजा अन्याय करता
जाय जिससे सब जन तंग आ जावें पर राजा का आज्ञा से डर कर सिर झुकाते रहें।
इसका फल किस प्रकार से प्रजा पावेगी सो विचार कर ही कोई निर्णय प्रत्येक जन
हित बने
न्यायाधिकरण सब पर तो लागू हो, पर राजा तो स्वतंत्र सब से अलग ही
रहेगा ऐसा सब का भाव रहेगा ही, सो राजा निष्पक्ष जन बनके स्वयं आगे आ कर
जो कुछ अपने विषय में सुन रहा हो सो ऐसा समझ के प्रजा केवल यह निर्णय करने
को तो नहीं बैठी कि राजा का पक्ष ले अथवा न्याय का साथ दे। सो न्याय तो निष्पक्ष
ही सब का अधिकार है? सब प्रजाजन मत से न्याय का पक्ष न देवे तो! राजा को
राज्य का त्याग, अथवा निष्पक्ष न्याय प्रणाली को मान कर सिर झुका कर ही ऐसा
वचन देना होगा जिस पर सब
न्यायाधिकरण की सब बात सुन राजा ने समझा कि बात ठीक, केवल यह
बात कही, प्रजाजन तो सदा विचार करके न्याय करते आये हैं। आज तक राजा
जन सदा उन पर ही तो सब आज्ञा प्रचार करके ही राज्य करते रहे सो व्यवस्था तो रही,
केवल प्रजा पर न्याय किस प्रकार? राजा पर क्या न्याय होगा?
राजा तो एक, सब जन तो अनेक हैं! राजा सब प्रजा जनो पर एक समान
दृष्टि से नहीं देखता अथवा पक्षपात का व्यवहार ही करता रहा सो तो ठीक नहीं
कहा जा सके इस दशा में राजा निष्पक्ष न हो तो न्याय की बात का कोई
अर्थ सिद्ध नहीं होता है, बात केवल इतनी, कि राजा सब प्रजाजन का समान
रूप से न्याय करे और निष्पक्ष रूप से सत्य को जाने तथा सत्य निर्णय दे सके सो
सब को यह तो मानना ही होगा कि सत्य, प्रजाजन अथवा राजा सभी
केवल प्रजा के पक्षपाती ही हैं जिससे सब का विश्वास टूट, निष्पक्ष रूप से
निर्णय सब प्रजा न्यायाधिकरण के समक्ष रखे, प्रजा के सम्मुख राजा का
भी न्याय हो तो प्रजा का विश्वास और बढ़ेगा! सब को भय होगा राजा भी अपराधी
हो! राजा स्वयं ही न्याय का पालन कर ले तो अन्य जनो का क्या वश जो वे कहें,
राजा तो स्वयं न्याय का पालन कर रहा सब को अपने ही समान न्याय समझ
राजा बन बैठा
राजा का रूप तो रूप-रंग सब जन सा ही है पर वह न्याय की मूर्ति
कहलाये, जिसे प्रजाजन ही रूप देते हैं सो उस पर विश्वास बहुत अधिक सब जन
का मन ही लगा रहेगा ऐसा समझ कर सब जन को भी न्यायाधिकरण से ही
सहायता मिले ऐसा ही प्रजा प्रत्येक को भी भय तो निष्पक्ष रूप का रहेगा
जिससे सब का न्याय पर विश्वास रहे, जिससे कि व्यक्तिगत रूप से न्याय सब
पाकर राजा को सब जन ही पूज्य मान कर राजा के वचन का पालन करेंगे
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