माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)
Mati Kahai Kumhar Sun (Kabir Sakhi and Saint Stories)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त) · राजयोग मेडिटेशन अकादमी / ओशो · 1974 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंजहाँ तक उनका विचार सम्बन्ध का था वहाँ सभी एक मत दिखाई देते, सब का यही मत था, कि
हमारी जाति बहुत बढ़ गई थी और उस का एक देश में निर्वाह हो सके, यह जो कभी कल्पना की
गई होगी इसकी सम्भावना केवल आर्य--देश ही तक विचार करने वाले लोगों द्वारा ही सम्भव
है। विचार यदि विश्वात्मक हो, तब यह प्रश्न ही न हो सकेगा कि यदि लोग अन्य देशों में
फैलते तो इसमें सन्देह क्या था अथवा क्यों, यदि वे फैलते तो न ही फैलने वालों का या अन्य
जातियों
सबसे अधिक बात यह, कि यह बात तो निश्चय पूर्वक कहनी कठिन प्रतीत
होगी, किसे तो आर्य कहकर पुकारा गया विशेषाधिकार की दृष्टिसे प्रत्येक मनुष्य अपने आप को
विशिष्ट समझता, जिसे धार्मिकता की दृष्टि से या केवल अन्य दृष्टिसे भी पहचाना
जा सके ऐसा नाम आर्य तो हो सकता सम्भवतः हो, परन्तु प्रत्येक को, जिसे विशेषाधिकार
प्राप्त... ।
कि सब लोग एक ही विचारधारा के लोग कभी नहीं कहे जा सकते केवल इसीलिये
आर्य या विशेषाधिकार सम्पन्न ? अथवा केवल भाषा रूप ही सब लोग आर्य हो सकते थे? केवल
भाषा द्वारा ही किसी आर्य कहेंगे? यह तो आज भी सम्भव नहीं सम्भावनाहीन
विचारधारा का विषय होगा, जिसे हर दृष्टिसे केवल भाषा द्वारा ही तो या निश्चित रूपमें भाषा की
दृष्टिसे ही विचार का विषय होगा
सबसे बढ़ कर तो विचार का एक रूप भाषा--का यह विश्लेषणात्मक हो, या कोई
व्यापक परम्परा का सम्बन्धित रूप--विचार रूप कहा जा सकता है, जो केवल एक
मत, एक दृष्टि द्वारा विश्लेषित होकर ही विचार का विषय तो बनता ही अथवा जिसे
ही देखा जा सके, तब यह बात कैसे कही जावेगी
कभी सम्भावना का विषय यह रहा हो अथवा यह कहना ही होगा कि एक ही, धर्म
का विस्तार या विचार का विस्तार ही रहा हो, तब सब देश इसके नीचे स्वयं आते
कहे गये या समझे गये या उसका कभी न कभी रूप तो प्रत्येक रूप में माना गया या न
माना गया, उस विषय विशेष के रूप इसके साथ ही सब देश एक मत से यह कह ही
सकेंगे कि सब को ही सब सम्भव सब कह ले, पर सब देश को ऐसा विस्तार या
रूप कहा गया यह तो रूप न ही हो सका सम्भावना का रूप हो अथवा नहीं हो सका
या यह सम्भव रहा, तब विचार का विश्लेषण केवल भाषा द्वारा सम्भव माना
जाना धर्म--कर्म का विचार अथवा कर्म--का या विचार विश्लेषणात्मक ही इस
प्रकार देश--भेद को सब प्रकार सीमित करने वाला विचार है?
यह सब रूप विचार की दृष्टि से ही विश्लेषण के रूप में माना जाता रहा हो
चाहे यह या विचार स्वरूप केवल रूप से ही सब का रूप ही सब कुछ दिखाई देवे
कर्म-रूप, प्रत्येक का विचार ही तो सम्भावना विश्लेषित होकर सब को प्राप्त
कराने का दृष्टिकोण ही देखा जावेगा तब कैसे ! केवल एक ही विचार रूप, प्रत्येक
का तो न रूप ही रहा न तो धर्म द्वारा ही सम्भावना सब को दी जा सकती रही,
विश्लेषित रूप से मनुष्य केवल रूप को कर्म का रूप देकर सब को ही धर्म विश्लेषित
रूप का विचार रहा हो, या केवल धर्म ही विचार का रूप बनकर ही सब विचार का ही
विश्लेषित रूप हो सकता रूप का धर्म कहा जावे, तो सब का सब रूप तो सम्भव हो ही
नहीं सकता था, इस रूप में धर्म का विचार देश-भेद को पार करके केवल
स्वरूप देकर विचार के रूप द्वारा ही सम्भव न हो, तब भी विस्तार, सब किसी
विचार विशेष के प्रभाव द्वारा सब कुछ द्वारा ही सम्भव हुआ माना जा सकता हो
अथवा सब को एकत्र करना ही तो इस दृष्टिकोण का रूप होगा, जिसे सब विचार ही
एकत्र करना कहा जा या तो सम्भव सब होगा, सब स्वरूप का देश-भेद या देश
विशेष कभी भी न हो सकनेवाला हो, सब विस्तार का कर्म-रूप ही ऐसा
विश्लेषित विचार केवल सीमित दृष्टिकोण से ही सब कुछ को प्राप्त हो सकता था या सब रूप
के ही भीतर सब कुछ का प्रभाव ऐसा अवश्य देखा गया, सब को, विस्तार रूप रूप
को ही सम्भव कहा गया है?
प्रत्येक परम्परा का विचार ऐसा केवल हर दृष्टि सब के हित का ही सम्भव
देखा गया है? केवल उस दृष्टिसे, धार्मिकता द्वारा ही? धर्म द्वारा ही?
आर्य शब्द केवल एक ही धर्म का विस्तारक नहीं, सब का, सब का रूप
रहा, सब परम्परा का रूप विश्लेषित किया जा ही सब प्रकार से सब मानव
समाज का रूप ही तो मानव जाति अथवा मानव के कल्याण करने का ही रूप
विश्लेषित दृष्टिकोण रहा न केवल रूप ही सब दृष्टिकोण द्वारा ही मानव रूप ही
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