सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)

माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)

Mati Kahai Kumhar Sun (Kabir Sakhi and Saint Stories)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त) · राजयोग मेडिटेशन अकादमी / ओशो · 1974 (उद्गम)

DevanagariHindipublished154 पृष्ठ

पृष्ठ 113, कुल 154 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 113

यथार्थ ही कहा, जरा सिर ऊँचा करके जो बात कही जा सकती थी, पश्चात्ताप
अथवा पाप का बोध पाकर ही मानो उसने सिर नीचा कर लिया न हो। सम्भवतः आज
तक न वह कभी इस रूप में पायी गयी, नित्य नया प्रसाधन करके ही उसने अपने
यौवन को सजाया! पर आज जो वेश्या स्वयं सब कुछ त्याग बैठी! जिसे अपने पर लेश
मात्र मोह!
पश्चात् वह उठी, पर आचार्य के चरणों पर नहीं, एक संन्यासी शिष्य बनकर चरणों
का छोर न छू सके, ससम्मान प्रणाम कर, सिर झुका हाथ बांधे खड़ी रहकर, आचार्य
की आज्ञा की प्रतीक्षा।
केवल आचार्य तक यह बात न थी। समस्त मठ में यह वार्ता ज्वाला-सी फैल
उठी। हर व्यक्ति के कान खड़े हो गये। ऐसा कभी स्वप्न में भी नहीं सोचा था, न ही
यह भी मन हुआ, जिसे पतित कह कर हम सब दूर से घृणा से देख सकते थे। जब उसने
स्वयं सब कुछ त्यागने का निश्चय कर लिया था तब उसे शरण में न लेना कैसा धर्म!
कोई कह भी कैसे सकता था इसके पूर्व, जब स्वयं श्रेष्ठ आचार्य तक मौन साधे जा चुके
थे। सभी के मुख पर केवल भय था। आचार्य के क्रोध का भय ही नहीं वरन् भविष्य का विचार भी था। पर
सभी मन ही मन, एक और प्रश्न
लिए भी व्याकुल हो उठे, जब यह सब कुछ है, तो तो फिर शरण पाने पर, यह भी
संन्यासिनी बनकर इस मठ में ही वास करेगी। तब, संन्यासियों अथवा इन देवियों का यहां, इन दोनों
आश्रमों में वास करना कैसा होगा?
बहुत से नये, कुछ मध्यस्थ के रूप, कुछ संन्यासी तथा संन्यासिनियां यह सभी नहीं
चाहते थे। जब तक इन दो का संगम न हो तब तक तो ठीक, पर यह रूप जो अब होने जा रहा था,
कभी किसी रूप में उचित नहीं कहा जा सकता था, कारण किसी समय भी इन सब के मन में विकार
भाव जाग्रत होकर संन्यासियों तथा उधर वास करनेवाली संन्यासिनियों का मन विचलित हो सकता
था, इसमें सन्देह
संकोच ही क्या, पर जो बात आचार्य के सम्मुख जाकर कहने योग्य किसी का मुख
तथा यह बल ही नहीं केवल मन में रहकर बातें रह गईं!
केवल आचार्य तथा एक ओर कुणाल ही दोनों ही इस स्थिति विचारपूर्वक शांत रहकर
सब कुछ कर रहे थे। उधर मठ के भीतर एक ओर केवल भय तथा सन्देह ही था कि अब क्या होगा?
सबमें फुसफुसाहट विस्मयकारी तथा लज्जित कर देनेवाली भी थी, किसी के मुख से ऐसा कुछ
शब्द नहीं निकला जो सर्वथा उचित कहा जाता!
यद्यपि इस बात पर आचार्य मौन थे अवश्य, पर वे यह सत्य, भली ही प्रकार जानते,
संन्यासिनियों संन्यासियों का नियम था। धर्म का सार सब एक समान ही था। पर, दोनों का इस
प्रकार एक ही स्थान विशेष पर वास करने से कहीं विकृति न आ जाय। सम्भवतः किसी विरक्त
आत्मा को, जिसके विचार दृढ़, तथा श्रद्धा निष्ठा दोनों में एकाग्र, कभी विचलित
साधारण जन का मन क्षण-क्षण विचलित होने लगता है।
पर आज वसंत सेना--का विषय साधारण जन के वश की बात न थी। वसंत सेना
नाम केवल एक ही उस नगर पर्यन्त नहीं, वरन् सारे भारतवर्ष तथा मगध भर में एक ही
विख्यात नारी रूप में प्रसिद्ध थी, जहां राजा-महाराजा तक झुकने के लिए विवश थे।
उस नारी, रूप में भी स्वयं झुकना था।
अतः वह स्थिति का विचार कर ही निर्णय पर पहुंच गये, पर उनका मन तो अब
संन्यासिनियों के--सम्मेलन, चिन्तन्--मनन करने विषयक वार्ता पर लगा हुआ था।
वसंत सेना को जहां आज विश्राम दिया गया था। उस स्थान पर जाकर जब वे मिले तो
कुणाल भी उपस्थित था। जो कुछ भी स्थिति इस समय थी उसका भी विवरण उस संन्यासिनी
के सम्मुख रख दिया गया। वसंत सेना सब कुछ सुन कर, केवल एक ही वाक्य कह सकी।
'परम भगवन्! मुझे
केवल दो दिन पश्चात ही तो निर्णय पर जाना, जिसे सारा बौद्धसंघ तथा स्वयं
संन्यासिनियां भी मिलकर निर्णय कर ही लेंगी। जब यह बात स्पष्ट कही, तो वसंत को
सन्देह का कोई कारण ही न रहा। वह आश्वस्त हो निश्चिन्त होकर बैठ गयी।
कुणाल अपना मन ही सम्भाले था अन्यथा, उधर वसंत सेनाचार्य तक पहुंचने से
वंचित रह सकती थी। क्योंकि, संन्यासी के मन में यह बात थी कि वसंत को प्रवेश
किसी रूप में नहीं दिया जा सकता। परन्तु वसंत अपनी धुन की पक्की थी। उसे ऐसा
आभास हो गया था कि जब तक वह स्वयं अपने विचार बौद्ध संघ के सम्मुख न रख
देगी तब तक सम्भव, उसके संन्यासिन बनने विषयक वार्ता पर कोई भी निर्णय न हो
सकेगा। अतः
113