एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)
Ek Omkar Satnam (Japji Sahib and Saint Stories)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)
इस न्यायानुसार न तो, जो जल को पीता न हो, वह प्यास से तड़फता हुआ मर
सकता अथवा मरेहुए को जीवन दान या शीतलता कभी-कभी प्राप्त कर सके, ना
आत्माराम भगवान् आत्मा रूप जो चैतन्य गंगा का जल, शान्त, या उस रस युक्त ज्ञान रस
भरा हुआ समस्त भरा
इस का नाम ज्ञान भाव ? ज्ञानानन्द रूप रस को ना पीवे अथवा आत्मानुभव
रूप आनन्द ना पावे उस को तो जन्म, मरण या जन्म मरण क्लेश, यह दुख
रूप संतापमय उस जीव को तृषा लगी
इस संतापावस्था तृष्णा तृषा को जो इस रस को आस्वादन करके मिटावे सो नर-भव
पाकर धन्य हुआ ऐसा जानना जी, तब अध्यात्मिक रस उस आत्मारामके पास
जब इस प्रकार देखा तो ऐसा स्वरूप ज्ञानानन्द रूप से जो सर्वथा उत्कृष्ट
सो ऐसा सब ओर आनन्द स्वरूप भरा रस रूप आत्माराम का रस आस्वादन
अध्यात्मिक आस्वादन किया सो ही ऐसा उत्तम कार्य किया जिस का आस्वादन
महाभाग्य जीव ही पावे अन्य अज्ञानी मूढ़
सो अध्यात्मिक रस ऐसा उत्तम ही अध्यात्मिक ज्ञान केवल अतीन्द्रिय ज्ञान
रूप देखा सो अध्यात्मिक रस जो सो प्रत्यक्ष रूप केवल ज्ञानानन्द रस भरा
उस रस का आस्वाद सो ही सो अध्यात्म ज्ञान रस निर्मल उस ज्ञान ही में
ऐसा देखा इस लिये उस रस के रस रूप केवल आनन्द रस का ही अनुभव
ऐसा ज्ञान-ध्यान से प्राप्त हुआ जो रस सो ज्ञान ही का रस ऐसा जो सो उस
स्वरूप ही में मन को लय कर स्वाध्याय से प्राप्त हुआ जिस से स्वाध्याय
फल पाया
ऐसा ज्ञान का तो अभ्यास किया पर जो इस अभ्यास करके भी ज्ञान रस का
आस्वाद आनन्द न अध्यात्म अनुभव से प्राप्त हुआ तो उस अभ्यास का फल
क्या हुआ सो उस अभ्यास कर रस पाया, सो क्या फल न हुआ सो यह हुआ?
उस अभ्यास का फल तो ज्ञान रस प्राप्त होना है?
ऐसा जान कर उस रस को लय कर पाया सो ज्ञान का फल ज्ञान
स्वरूप ही हुआ सो रस सो, ना उस ध्यान स्वरूप ज्ञान को लय कर उस ज्ञान
को लय किया, ज्ञान ही को लय कर जिस रूप उस को रस का रस पाया
सो, रस ज्ञान रूप, ज्ञान ही का रस रूप, सो ज्ञान रूप, न तो उस
प्रकार से न अनुभव रूप किया, किन्तु अध्यात्मिक रस रूप रस, जो
ज्ञान रूप सो, ना ही उस ज्ञान स्वरूप अनुभव फल का फल है? इसी
लिये यह ज्ञान केवल ज्ञान ही रूप का फल, ज्ञान ही का फल हुआ
जब अध्यात्म ज्ञान रस के जानने का अभ्यास किया तो उस रस
के प्राप्त कर लेने से उस रस का रस ऐसा ज्ञान स्वरूप में आया, ना ज्ञान को
छोड़कर आनन्द रस-भाव का ध्यान ना सो रस आनन्द का लय या ज्ञान का लय
ज्ञान ही हुआ आनन्द स्वरूप रस ज्ञान का ध्यान रस-भाव केवल
ज्ञान स्वरूप में ही रस मिला, ज्ञान ही को ज्ञान रूप से लय किया सो ज्ञान
स्वरूप रूप में आनन्द रस का ज्ञान केवल ज्ञान रूप से ही आया ना कि
अन्य, रस ज्ञान रूपी ज्ञान केवल न रहा जी!
जिस को न जान कर, ना जानने रूप उस अध्यात्म के ज्ञान रूप को
अज्ञान कह रहे हो? सो अज्ञान रूप केवल अज्ञान होगा; ज्ञानानन्द रूप
ज्ञान ऐसा उत्तम स्वरूप को ना कर ज्ञान आ-के सो, आ-के रस ज्ञान रूप
ज्ञान ऐसा उत्तम आनन्द रस उस रस का अज्ञान स्वरूप ज्ञान कह कर
अज्ञान से रस कह ज्ञान, सो अज्ञान का ज्ञान स्वरूप ना तो ज्ञान कह
ना ही उस अध्यात्म ज्ञान-स्वरूप को ज्ञान ना कह कर अज्ञान स्वरूप कह
सो अज्ञान स्वरूप ज्ञान ही को ज्ञान कह रहे हो? तो ज्ञान कहो! ना ज्ञान
कहो! कह तो ज्ञान, रस केवल ज्ञान कहा
उस रस को, ज्ञान कहा तब अध्यात्म ज्ञान स्वरूप उस ज्ञान स्वरूप
केवल आनन्द ज्ञान स्वरूप ज्ञान का रस कहा जी, सो ज्ञान ही ज्ञेय से ज्ञान
रहा जी! ज्ञान का स्वरूप केवल ज्ञान स्वरूप ही, ज्ञान स्वरूप ना ज्ञान से ही
ज्ञान का ज्ञान उस रूप को ज्ञान रूप कहा जी, सो सो अध्यात्म ज्ञान-ध्यान
स्वरूप से ही ही ही ही ज्ञान का ध्यान रूप से ज्ञान का ध्यान सो रस, ना आनन्द
का ध्यान ना उस ज्ञान स्वरूप जी! अध्यात्म केवल जो रस कहा, केवल
ज्ञान रूप ज्ञान से अध्यात्म का रस ऐसा ज्ञान कहा सो क्या? ज्ञान क्या? सो
289
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291
इस प्रकार जो जीव इस कर्मोदयके उदय कालके परिणाम करता है उन परिणामोके निमित्तसे आगामीकालमे कर्मबंध होता है
इसलिये आत्मा कर्मके निमित्तसे इस संसारमे परिभ्रमण करता हुआ दुःखरूपी ज्वालासे जलता रहता है।
अब कर्मका उदय कैसा होता है? इस बातको स्पष्ट रीतिसे समझाते हैं। प्रथम ज्ञानावरण, दर्शनावरण,
मोहनीय, अंतराय, इन चारों घातिया कर्मोंमेसे सर्वघाती-प्रकृतियोंका उत्कृष्ट अनुभाग बंधके पीछे जितने काल पर्यन्त
बंधके योग्य स्थिति रहती है उसका प्रथम समयमे ही जो आबाधा कालका नियम है उस समयमे उस कर्मप्रकृतिके
परमाणुओकी रचना करता हुआ स्थिति आबाधा कालके समाप्त होते ही प्रथम समयमे उदयमे आनेके योग्य स्थिति रचनाको
करता हुआ बंध समयमे सर्व अनुभागको घटाता हुआ उस आबाधा कालमे सर्व अनुभागको न्यून करता है। इसतरह सर्वघातिया
कर्मोंकी स्पर्धक रचना होती है। जो कर्म बंधके समय जैसा अनुभाग बंधा था वह उदयके समय उतनाही फल देता है।
केवल ज्ञानावरण, केवल दर्शनावरण, निद्राद्विक, पंचम अंतराय, इन नौ प्रकृतियोंके बंधके समयका सर्व अनुभाग
उदीरणाके समय सर्व अनुभागको उदयमे आनेके योग्य करता हुआ उदयमे आता है। बंधके समय जिस कर्मका जघन्य अनुभाग
बंधा था वह उदयके समय जघन्य फल ही देता है। उत्कृष्ट अनुभाग बंधा था वह उत्कृष्ट फल ही देता है।
इस प्रकार ज्ञानावरण आदिक कर्मोंकी रचनाका क्रम समझना चाहिये।
भावार्थ-इस तरह जीवके मिथ्यात्व आदिके निमित्तसे बंधे हुये कर्मोंकी आबाधा समाप्त होकर उदय होता है।
यदि यह जीव अपने परिणामोंको शुद्ध रखे तो नूतन कर्मोंका बंध न हो। कर्मोंका उदय आयेगा और अपनी स्थिति पूर्ण
कर खिर जायगा। इसलिये हे चेतन ! अपने परिणामोंको शुद्ध कर ! आगामी आनेवाले कर्मोंसे आत्माका कोई संबंध न रहे।
उदयमे आये हुये कर्म तुझे कुछ भी कष्ट नहीं दे सकते।
अब आचार्य कहते हैं कि, जिसप्रकार ज्ञान चेतनाके द्वारा कर्मोंका नाश होकर मोक्षकी प्राप्ति होती है, उसीप्रकार
अज्ञान चेतनाके द्वारा यह जीव कर्मबंधको करता हुआ संसारमे परिभ्रमण करता है। अज्ञान चेतनाके दो भेद हैं-एक
कर्मचेतना और दूसरी कर्मफल चेतना। इनमेंसे कर्मचेतना तीन प्रकारकी होती है। एक तो अज्ञानी जीव मन, वचन, कायकी
क्रियाको करता हुआ यह परिणाम करता है कि मैं इस कार्यको करता हूँ, दूसरा अज्ञानी यह परिणाम करता है कि मैं
इस कार्यको कराता हूँ, तीसरा अज्ञानी यह परिणाम करता है कि जो दूसरा इस कार्यको कर रहा है वह बहुत अच्छा कर
रहा है। इसप्रकार जीव मन, वचन, कायकी क्रियामे रत हुआ अपनेको कर्ता मानता है। यद्यपि जीव कर्मका कर्ता
नहीं है तथापि अज्ञानके कारण अपनेको कर्ता मानकर कर्मबंधको करता है। कर्मफल चेतनाके भी तीन भेद हैं-एक
अज्ञानी जीव सातावेदनीय कर्मके उदयसे प्राप्त हुये इष्ट संयोगोंमे सुखी होता है, दूसरा असातावेदनीय कर्मके उदयसे प्राप्त
हुये अनिष्ट संयोगोंमे दुःखी होता है, तीसरा समभाव धारण करता है। इसप्रकार सुख, दुःख और समता परिणामके निमित्तसे
अज्ञानी जीव कर्मोंका बंध करता है।
तात्पर्य-अज्ञानी जीव मन, वचन, कायकी क्रियाओंको अपनी क्रिया मानता है, जिससे कर्मोंका बंध होता है।
वास्तवमे अज्ञान चेतनाके कारण यह जीव कर्मोंके निमित्तसे होनेवाले सुख दुःखादिको अपनी आत्माका स्वरूप
मान लेता है, इसलिये इस अज्ञान चेतनाको कर्मफल चेतना कहते हैं। जो जीव कर्मोंके निमित्तसे उत्पन्न हुये सुख-दुःखको
भोगता हुआ अपने स्वरूपको भूल जाता है वह अज्ञान चेतनाका धारक है। इसप्रकार अज्ञान चेतना तीन प्रकारकी है-कर्म
चेतना, कर्मफल चेतना और अज्ञान चेतना। इन तीनों प्रकारकी अज्ञान चेतनाओंका त्याग करके प्रत्येक भव्यजीवको ज्ञान
चेतनाको ग्रहण करना चाहिये।
जैसे कोई कामी पुरुष काम चेष्टाओंसे उत्पन्न हुई तृप्तिको ही सुख मानता है, वैसेही यह अज्ञानी जीव
कर्मफल चेतनाके कारण अपने आत्माके स्वरूपको भूलकर अन्य बाह्य पदार्थोंमे सुख मानता है। कर्मफल चेतनाके कारण
कर्मका उदय आनेपर जीव सुखी दुःखी होता है, कर्म चेतनाके कारण शुभ वा अशुभ कर्मोंको करता हुआ अपनेको
कर्ता मानता है, अज्ञान चेतनाके कारण अपनेको देह स्वरूप मानता है, इसलिये ज्ञानी पुरुषोंको उचित है कि
वे कर्म चेतनाको भी त्यागें, कर्मफल चेतनाको भी त्यागें और अज्ञान चेतनाको भी त्यागें तथा ज्ञान चेतनाको
अंगीकार करें। ज्ञान चेतनाके द्वारा ही संसारके कारणभूत कर्मोंका क्षय होता है। ज्ञानी जीव अपनेको शरीर
स्वरूप नहीं मानता, कर्मोंका कर्ता नहीं मानता और कर्मफलका भोक्ता नहीं मानता। वह तो केवल ज्ञाता दृष्टा
मात्र रहता है। इसलिये वह नवीन कर्मोंका बंध नहीं करता तथा पूर्वबद्ध कर्मोंकी निर्जरा करता है। यद्यपि
ज्ञानीके भी राग-द्वेष होते हैं तथापि वह उन राग-द्वेषके परिणामोंको अपना स्वरूप नहीं मानता। वह जानता
है कि ये सब पुद्गल कर्मके विपाक हैं।
भावार्थ-जो जीव अज्ञान चेतनाको छोड़ देता है वह ज्ञानी है। ज्ञान चेतनाके प्रकट होनेपर आत्माको
यथार्थ स्वरूपकी प्राप्ति होती है। उस समय जीव अपनेको देहादिकसे भिन्न, परभावोंसे भिन्न, ज्ञाता दृष्टा
मात्र अनुभव करता है। यही ज्ञान चेतना सम्यग्दर्शन आदिकी साधक है।
यद्यपि ज्ञानीके भी अज्ञान चेतनाका सद्भाव पाया जाता है तथापि वह ज्ञानीके परिणाम नहीं हैं,
इसलिये ज्ञानी, कर्मफलको भोगता हुआ भी अलिप्त रहता है। अज्ञानी अज्ञान चेतनाके कारण बंधको प्राप्त होता है।
इस अध्यायमे प्रथम अधिकारका वर्णन किया गया।
292
विचार करके ऐसा उपाय, साधन, पुरूषार्थ करो कि सर्व जगत मात्र सब कुछ छूट भी जावेगा
केवल अपने साथ सत्-स्वरूप आत्मा ही अमर सत्य रहेगा ऐसा मान, जानकर सब कुछ को
ही असार समझ कर इस सब का मोह त्याग करके ही रहो कि सब तो, कभी ना कभी सब कुछ
छूट ही जाना सब कुछ छूट ही रहा है। इसी बात का दृढ़ निश्चय करो, केवल एक ही अमर
सत्य, अखंड एक रसम् नित्य सुख स्वरूप सब काल तीनों कालों में, अपने रूप ही को, अपने
रूप स्वरूप--सच्चिदानन्द को विचारो।
केवल अपने सत्य-आत्म स्वरूप ही को! कि यह तीनों कालों काल में भी ना कभी
भी ना-होने वाला ही सदा रहेगा
सत्-स्वरूप ही विचार ही सब कुछ सब का आधार रूप, कल्याणकारी रूप सच्चा
स्वरूप? रूप सब का आधार रूप निज स्वरूप आत्म स्वरूप ही सदा सत्य असीम अविनाशी
ही अविनाशी का सब स्वरूप ही आधार रूप कल्याण का दाता स्वरूप कल्याण अविनाशी
स्वरूप ही को अपना स्वरूप सब का आधार रूप कल्याण का दाता ही है। ना कि अन्य
कि संसार मिथ्या पदार्थों स्वरूप सब का आधार रूप कल्याण का दाता हो यह सब मिथ्या
जगत को, संसार को, प्रपञ्चमय को, सब ही प्रपञ्चमय को अपना स्वरूप जानकर ना सत्य
समझ कर ना सत्य रूप मानो, सब नाश स्वरूप है।।
सत्-स्वरूप रूप केवल एक सच्चिदानन्द को अपना स्वरूप ही ना जानकर सब
प्रपञ्च स्वरूप ही को कल्याण रूप दाता सब ही का सब समझ कर प्रपञ्च स्वरूप ही
जगत् भ्रममय जगत को ही कल्याण सत्-स्वरूप स्वरूप ही सदा सत्य रूप समझकर
अपने ही स्वरूप को सत्य रूप सच्चिदानन्द को सब सत्य समझा? तो सब ही सत्य है,
कल्याण अविनाशी सब का सत्य सच्चिदानन्द ही स्वरूप सब का ही ना मान करके
सदा सब कुछ को मिथ्या नाश रूप अविनाशी सब अविनाशी सब को ही सत्य
जाना ना, केवल अपने ही को अपना रूप ही सब संसार का सब कुछ ना ही जानकर
ना माना, प्रपञ्च ही माना।
अविनाशी स्वरूप ही को, अपना सत्य रूप ज्ञान ही अपना सत्य स्वरूप को,
सच्चिदानन्द--निज स्वरूप सब ही स्वरूप सब सब का सब ही अपना सब रूप सब
कल्याण ही सब कल्याण स्वरूप सब अविनाशी सब ही सब अपना ही कल्याण
सब कुछ निज स्वरूप ज्ञान स्वरूप ही सब सब स्वरूप का आधार ही सत्य
सब अपना स्वरूप ज्ञान, ना अपना सच्चिदानन्द स्वरूप सब सब कल्याण का रूप ।
सब ही को अपना सच्चिदानन्द ही, ना माना सब कुछ ना ही सत्य है।।
ना सब ही अपना ना ही सब स्वरूप सब ही कल्याण स्वरूप निज स्वरूप
सब ही अपना रूप ही, ना स्वरूप ही कल्याण रूप स्वरूप, ना अपना ही,
अपना सब ही स्वरूप ही सब सच्चिदानन्द ज्ञान सब सब । ना अपना सत्-स्वरूप
कल्याण रूप ज्ञान । सब सब सब ही का सच्चिदानन्द स्वरूप ही सब अपना
कल्याण स्वरूप ही सब स्वरूप ही सब ही अपना सच्चिदानन्द ज्ञान ही सब का।
अपना रूप ही को, सब ही स्वरूप ही सब कल्याण रूप अपना स्वरूप
अपना ज्ञान ही सब का ही कल्याण सच्चिदानन्द ही ही ज्ञान ही ज्ञान सदा अखंड
स्वरूप ज्ञान सब का ही स्वरूप ही ही ज्ञान ही ज्ञान का ज्ञान रूप ज्ञान ही
ही ज्ञान ही ज्ञान स्वरूप ज्ञान स्वरूप ही ज्ञान ही ज्ञान ही, कल्याण ज्ञान ही ज्ञान
कल्याण स्वरूप ज्ञान ज्ञान ही ज्ञान ही ज्ञान ही ज्ञान ही, ज्ञान ही, ज्ञान ही,
ज्ञान ही, ज्ञान ही, ना ज्ञान ही ज्ञान सदा ज्ञान ही, स्वरूप ही सब ज्ञान रूप।
केवल ही ज्ञान सच्चिदानन्द ही ज्ञान ही ही ज्ञान स्वरूप।
अपना रूप, सब ही का स्वरूप ही सब सच्चिदानन्द ही स्वरूप ज्ञान
कल्याण स्वरूप, स्वरूप--ज्ञान ही स्वरूप ही स्वरूप सब ज्ञान सच्चिदानन्द स्वरूप
ज्ञान स्वरूप सब कल्याण ही कल्याण ही सच्चिदानन्द स्वरूप सब सच्चिदानन्द ज्ञान
ज्ञान स्वरूप ही ज्ञान स्वरूप ही ज्ञान ज्ञान ही; सच्चिदानन्द ज्ञान स्वरूप ज्ञान
ज्ञान स्वरूप ही ज्ञान ज्ञान ही ज्ञान ही ही सच्चिदानन्द ही ज्ञान ज्ञान रूप,
सब ज्ञान स्वरूप ज्ञान? सच्चिदानन्द ही ज्ञान ज्ञान ही ही ही ज्ञान रूप ज्ञान
स्वरूप, ज्ञान स्वरूप ही ज्ञान ज्ञान सब सब ज्ञान ही ज्ञान ज्ञान सच्चिदानन्द
ज्ञान सब सब सब ही सच्चिदानन्द ही स्वरूप सब ही स्वरूप ही, सब कल्याण ही
स्वरूप ही ज्ञान ज्ञान
ज्ञान ही सब ही ही सब ही ज्ञान ही स्वरूप ज्ञान सब ही ज्ञान ज्ञान सब
ज्ञान सब सब ही ज्ञान स्वरूप ज्ञान, ज्ञान ज्ञान ही ज्ञान ही ही ज्ञान ज्ञान ही
सब ज्ञान--ज्ञान ज्ञान ही स्वरूप ज्ञान
"सत्य-रूप ही ज्ञान स्वरूप सब ज्ञान स्वरूप स्वरूप है।"
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294
इस प्रकार जब विश्वामित्र का प्रभाव बहुत बढ़ गया अथवा उनके प्रभावकी सीमा
का पार न रहा तब यह बात सब ओर फैल गई। सब-जगह लोग विश्वामित्र के इस काम की
भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे। वशिष्ठजी का यह द्वेष देखकर देवराज इन्द्र को बड़ा आश्चर्य
हुआ। वे सोचते थे कि वशिष्ठजी को काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर कोई विकार
छू--तक नहीं सकता था, पर वे इस बात पर ध्यान न देकर विश्वामित्र को सता रहे हैं। क्या वशिष्ठजी
मुनि नहीं हैं? क्या वे मुनि नहीं हैं? क्या वे मुनि नहीं हैं? क्या वे मुनि नहीं हैं?
विश्वामित्र महात्मा वशिष्ठ की बात सुनकर अपने घर चले गये। वशिष्ठजी ने विश्वामित्र को फिर कामधेनु के
लिये बहुत तंग किया। वशिष्ठजी ने उनसे कामधेनु को छीना। विश्वामित्र ने सोचा, यह वशिष्ठजी बड़ा भारी
अनर्थ कर रहे हैं।
अब राजा विश्वामित्र ने इस बात का निश्चय किया कि मैं अपने बल से कामधेनु को वापस लाऊँगा।
विश्वामित्र बहुत-से बाणों द्वारा वशिष्ठजी को मार-मारकर मार डालने लगे। वशिष्ठजी को विश्वामित्र ने बाणों
से आच्छादित कर दिया। वशिष्ठजी ने मुसकराते हुए कहा, “हे राजन्! तू मुझे अपने बाणों से मारना
चाहता है। तू क्षत्रिय-तेज से वशिष्ठ को पराजित करना चाहता है। यह असम्भव है। क्षत्रिय-तेज से ब्रह्म-तेज
बहुत बड़ा है। यह कहकर वशिष्ठजी ने विश्वामित्र के बाणों को शान्त कर दिया।
इस बात को सुनकर विश्वामित्र ने विचार किया, मैं ऐसा काम क्यों करूँ? उन्होंने सोचा
कि मैं तप द्वारा वशिष्ठजी से ब्रह्मतेज प्राप्त करने का विचार करता हूँ, क्योंकि क्षत्रिय-तेज
ब्रह्म-तेज के सामने कोई चीज नहीं है। इसलिए मैं तपस्या करूँगा। विश्वामित्र ने तपस्या
आरम्भ कर दी। वे कठोर तपस्या करते-करते सब-कुछ छोड़कर वन में चले गये। विश्वामित्र ने
ऐसा तप किया, जिस तप के प्रभाव से विश्वामित्र ब्रह्मर्षि हो गये।
जब इस बात का विश्वामित्र को पता लगा कि वशिष्ठजी मेरे से बहुत प्रसन्न हैं, इसलिए विश्वामित्र
वशिष्ठजी के आश्रम में जाने का विचार करने लगे। वशिष्ठजी के आश्रम में जाने से पहले विश्वामित्र ने
एक कुल्हाड़ी अपने पास रख ली।
रात्रि का समय था। उस समय वशिष्ठजी ने अपनी पत्नी अरुन्धती से कहा, हे अरुन्धती!
आज की रात बड़ी सुहावनी है। आज चन्द्रमा का प्रकाश बहुत ही अच्छा लग रहा है। अरुन्धती
ने अपने पति वशिष्ठजी के चरणों में प्रणाम करते हुए कहा, महाराज! क्या बात है कि आज की
रात सुहावनी दिखाई दे रही है? विश्वामित्र ने इस बात को सुना। उन्होंने अरुन्धती के वचनों को
सुनकर सोचा कि वशिष्ठजी विश्वामित्र की प्रशंसा कर रहे हैं। वशिष्ठजी ने अपनी पत्नी अरुन्धती से
कहा कि हे अरुन्धती! विश्वामित्र का तप विश्वामित्र के समान आज की चांदनी के समान चमक रहा
है। यह बात विश्वामित्र ने सुन ली। विश्वामित्र ने वशिष्ठजी के चरणों पर कुल्हाड़ी रख दी।
विश्वामित्र ने हाथ जोड़कर वशिष्ठजी से कहा, हे मुनिवर! विश्वामित्र को क्षमा कर दो। वशिष्ठजी
बोले कि हे विश्वामित्र! यदि तुम पहले से ही ऐसा कर लेते तो आज तुम ब्रह्मर्षि बन जाते।
जब तुमने वशिष्ठ को देखा तब तुम्हारे मन में एक बात थी और जब तुमने दूसरे को देखा तब
तुम्हारे मन में दूसरी बात थी। जब तुम्हारे मन में दोनों बातें एक जैसी हो गईं तब विश्वामित्र
ब्रह्मर्षि बन गये।
विश्वामित्र ने वशिष्ठजी के चरण स्पर्श किये। विश्वामित्र ने सोचा कि वशिष्ठजी के चरणों
में बड़ा भारी सुख है। विश्वामित्र के मन में कोई बात नहीं रही। वशिष्ठजी ने विश्वामित्र को
गले से लगा लिया।
विश्वामित्र ने अपने मन में विचार किया कि जब तक संसार में मनुष्य अपने कर्त्तव्य
का पालन नहीं करता तब तक वह कभी भी तरक्की नहीं कर सकता।
जब मनुष्य किसी काम को अपना कर्त्तव्य समझकर करता है, तब उसका वह काम अवश्य पूरा
होता है। जो मनुष्य अपने कर्त्तव्य को ठीक तरह से पूरा करता है, तब उसका यश संसार में चारों
ओर फैल जाता है। ऐसे मनुष्य का नाम संसार में अमर हो जाता है। विश्वामित्र अपने कर्त्तव्य में लगे
रहे। विश्वामित्र ने तपस्या की। विश्वामित्र ने अपने जीवन में तपस्या को मुख्य स्थान दिया। विश्वामित्र
का यश चारों ओर फैल गया। विश्वामित्र ने सोचा कि मनुष्य का धर्म है कि वह अपने कर्त्तव्य का
पालन करे।
कर्त्तव्य का अर्थ है कार्य। जब मनुष्य अपने कार्य को भली प्रकार से पूरा करता है, तब
वह संसार में यश प्राप्त करता है। विश्वामित्र ने अपने कर्त्तव्य का पालन किया। वशिष्ठजी ने
विश्वामित्र के कर्त्तव्य का पालन करने के कारण विश्वामित्र को अपने हृदय से लगा लिया था। विश्वामित्र
एक तपस्वी थे। विश्वामित्र ने तपस्या के बल से ब्रह्मर्षि-पद को प्राप्त किया था। विश्वामित्र ने अपने
जीवन में तपस्या को मुख्य स्थान दिया था। विश्वामित्र ने तपस्या के बल से संसार को दिखा
दिया कि मनुष्य अपने कर्त्तव्य के बल से सब-कुछ प्राप्त कर सकता है।
इस प्रकार विश्वामित्र ने अपने कर्त्तव्य का पालन किया। संसार में कर्त्तव्य का पालन करने से मनुष्य
का यश चारों ओर फैल जाता है। मनुष्य को अपने जीवन में कर्त्तव्य का पालन करना चाहिए। कर्त्तव्य
का पालन करने से मनुष्य का यश बढ़ता है। कर्त्तव्य का पालन मनुष्य का सबसे बड़ा धर्म है।
295
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296
विषयाभिलाष तीव्र कषायरूप भाव न करना, इन तीव्र कषायरूप भावों सहित यदि कदाचित् मन्द
न होवे तब, कदाचित् मन्द कषायरूप भी किया तो उसका फल मिलेगा
निदान तो धर्म नहीं यह निश्चय पर भरोसा रखकर किया है, निदान भी किया तो फल
मिलेगा परन्तु वह फल उसका जीव को--संसार सुख भोग रूप प्राप्त फल भोगने पर भी तृप्त नहीं
होगा और ऐसा उपाय भी--संसार के विनाश रूप तो नहीं पर मोक्ष के उपाय रूप धर्म नहीं यह
जीव ऐसा विचार करके कि यह सब अनादिकाल का ही मोह उदय, निदान का फल भोग, सो तो
अनादिकाल पर्यन्त भोग रहा ही आया पर उसका फल अहित, ऐसा जो जानकर भी निदान रूप भाव
महापापरूप परिणाम को जो जीव उत्तम परिणाम रूप मानता, सो वह मिथ्यादृष्टि ही होकर
अहित फल भोग कर इस संसार परिभ्रमण-दुःख पावेगा! इस विचार से सब जीव अपने मन में इस
प्रकार का सन्देह न राखिये, अर्थात्, निदान, संक्लेश परिणाम रूपभाव महाकष्ट दायक जान कर
इन भावों भाव को दूर कर ही अपने शुद्ध भावों का साधन करो
निदान का त्याग कर ऐसा विचारना कि यह तो सब पर का सुख सो पुण्य का उदय संबन्धी
सब विकार रूप ही है इस भोगरूप सुखनिधान परिणामन मन्द, तो फिर क्या फल? इस विचार
से पुण्य का फल भी मत चाहो, अर्थात् विषय कषाय भोगों को! विचार कर त्याग ही करना चाहिये,
इससे केवल पाप उदय ही, संसार का मार्ग नष्ट हो कर मोक्ष पावेगा! विचार करो कि भोग
सुख का त्याग सब शुद्ध मोक्ष परिणाम ही, केवल मोक्ष पद का सुख ही जीव उत्तम सुखकारी
ऐसा निश्चय मानकर संसारिक सुखनिधान भाव को त्यागो और जो उत्तम निश्चय करो?
अब इस उपशम के स्वभाव का जो भाव सो संशय-विहीन मोक्ष सुख के करने वाले निश्चय-
सम्यक् विशुद्धरूप विशुद्ध केवल विशुद्ध है, संशय-विहीन परिणाम ही सम्यक् विशुद्ध भाव
जिस रूप विशुद्ध भाव करके ही मोक्ष रूप विशुद्ध फल जीव को प्राप्त हो, ऐसा जानना
योग्य
जिसके हृदय सम्यक्त्व का उदय स्वरूप विशुद्ध हो सो सम्यक् ज्ञानी जीव इस संसारिक
सर्व सुख संबन्धी भाव विषय कषाय आदि महापापरूप को त्याग करके निश्चय मोक्ष मार्ग
ज्ञान भाव, केवल ज्ञान स्वरूप संचेत, केवल पद विशुद्ध-स्वभावानन्द में ही मन को लीन करता
हुआ स्वरूप, निज पर भावों सहित नहीं है, स्वरूप पद का संशय रहित ज्ञान द्वारा निश्चय
मोक्ष मार्ग सुखों को ही केवल मोक्ष सुखस्वरूप जान कर इस संबन्धी निश्चय करे?
सम्यक्त्वि जीव को, संशय-हीन भाव धारके, जो जो ज्ञान धार कर मन में राग भाव आया,
उसका भी पर त्याग करके सो सब त्याग किया उस परिणाम से मोक्ष स्वरूप भाव को ही पर
ही का त्याग करके शुद्ध स्वरूप ही, जो यह संबन्धी पर उपशमस्वरूप को जान कर विशुद्ध
ज्ञान सम्यक्त्व को विशुद्ध जानके पर भाव को त्याग, इस ही स्वरूप भाव सहित विशुद्ध
सम्यक्त्व का भाव जान, जो ज्ञान उस भाव का फल मोक्ष भाव ही प्राप्त किया जिससे कि
मोक्ष फल प्राप्त न हो सके, सो सब त्याग करके विशुद्ध पद पावे
जो शुद्ध स्वरूप सम्यक्त्व पर्याय को मन से जो ध्यावे दिन--अरु रात दिन--अरु रात!
सब सब जो भाव संशय त्याग करके सो जीव सो सब अज्ञान विकार सहित विषय को त्याग करके
शुद्ध स्वरूप सम्यक् भाव को ही केवल निज भाव जानता है, अर्थात् विषय कषाय को त्याग
शुद्ध स्वरूप ही का भोग जानके सो सम्यक्त्व भाव को ही मोक्ष स्वरूप निश्चय मोक्ष
विशुद्ध को निज संशय-विहीन पद को केवल सम्यक् विशुद्ध परिणाम से ही सं-विहीन पद
केवल शुद्ध पद स्वरूप सम्यक्त्व पद को निज सुखदायक भाव को केवल विशुद्ध सम्यक्त्वस्वरूप ही
जीव मान कर केवल सम्यक् स्वरूप रहा, यह इसका अर्थ
सम्यक्त्व को केवल सम्यक् विचार कर केवल परिणाम ज्ञान रस को पान ही करे,
जो पर्याय सो विशुद्ध पद केवल पद केवल विशुद्ध ज्ञान स्वरूप सम्यक्त्व विशुद्ध पद संशय-
हीन केवल पर्याय को विशुद्ध पद सम्यक्त्व स्वरूप जाने? सो ही सम्यक्, केवल ज्ञान पद,
सब ही ज्ञेय को जानने से सब संशय पद को नाश करके केवल ज्ञान स्वरूप प्रगटावे, केवल
ज्ञान सब ज्ञेय केवल जाने, केवल ज्ञान सब संशय पद को नाश कर केवल स्वरूप
प्रकाश सब ज्ञेय केवल रूप से मोक्ष स्वरूप ही सम्यक्त्व स्वरूप को जान सके? ऐसा
जो सम्यक् स्वरूप सो केवल विशुद्ध
सो सम्यक्त्व स्वरूप भावार्थ इस रूप सो जो केवल ज्ञान इस केवल पद को केवल ज्ञान
रूप न जान कर जो केवल ज्ञान संशय ज्ञान रूप सम्यक्त्व को निज ज्ञान स्वरूप ज्ञान
मन्द भाव सम्यक्त्व का ही भाव जाने, जो सम्यक्त्व को सम्यक्त्वस्वरूप ही, संशय रहित
जाने! केवल ज्ञान सम्यक्त्व, सो केवल पद, केवल सम्यक् केवल जाने! सो केवल
भाव सो, केवल ज्ञान केवल संचेत रूप, केवल ज्ञान सब ज्ञेय सब को नाश स्वरूप
ज्ञान का ही भाव, सो केवल ज्ञान केवल स्वरूप केवल ज्ञान
संशय रहित ज्ञान सम्यक् भाव, संशय ज्ञान सम्यक् सम्यक्त्व केवल परिणाम
ज्ञान का फल जो मोक्ष फल सो सम्यक्त्व संशय-विहीन सो केवल परिणाम विशुद्ध केवल सं--
297
तथा ज्ञान, तथा ध्यान, तथा विद्या इत्यादि साधनों का तो क्या काम जहाँ आनन्दमय स्वरूप
का वास, जहाँ वासना रूप विषय-भोग का सम्बन्ध ही, वहाँ काम क्रोधादिक माया का चक्र-व्यूह रहता
होगा ऐसा जान कर उन सब मुनियों ने एक मत हो कर श्री सच्चिदानन्द-घन प्रभु श्रीकृष्ण
भगवान् के चरणारविन्दों का आश्रय ग्रहण किया जिससे वे सब के सब अनायास ही इस
भव-सिन्धु पार उतर गये, तब शुकदेव जी, जो जन्म-काल सेही ज्ञानी तथा निष्काम रूप
भगवान् के स्वरूप का ध्यान धरके उस समय ध्यान-मग्न हो गये।
हे महाराज ! तब यह सब कौतुक देख, राजा परीक्षित ने भी विचार किया कि
अरे रे! यह क्या हुआ, भूल तो हुई, पर बड़े भारी पुण्य-कर्मों के उदय से हुई। जो भगवान्
ने मुझे मुनि के पास भेजा और मुनि ने मुझको शाप दिया।
हे महाराज ! राजा ने ऐसा विचार कर अपने पुत्र को राज्य-भार देकर आप
संसार से विरक्त हो, श्री गंगा जी के तीर पर जा बैठे और आमरण अनशन
का व्रत धारण किया।
उसी समय व्यास, पराशर, शुकदेव, नारद, दुर्वासा, विश्वामित्र,
कश्यप, भृगु, गौतम, जमदग्नि, वशिष्ठ, अत्रि, भारद्वाज, अगस्त्य, कण्डु, च्यवन,
कण्व, मैत्रेय, दालभ्य, और्व, आपस्तम्ब, मार्कण्डेय, शतानन्द, भारद्वाज,
कपिल आदि बड़े-बड़े महर्षि अपने-अपने शिष्यों सहित वहाँ आये।
राजा परीक्षित ने सब मुनियों का चरण-स्पर्श कर यथायोग्य पूजन किया
और हाथ जोड़कर प्रार्थना की कि, “हे मुनीश्वरो! कृपा करके मुझे वह साधन
बताइये जिससे मेरा कल्याण हो और श्री भगवान् के चरणों में मेरा मन लगे।”
राजा के ऐसे वचन सुन कर सब मुनियों ने आपस में विचार किया। कोई
कर्म काण्ड को श्रेष्ठ कहने लगा, कोई ज्ञान को, कोई योग को और कोई
तप को उत्तम बतलाने लगा। जब मुनियों में मत-भेद हुआ, तब राजा ने
कहा कि “हे मुनीश्वरो! मुझे ऐसा उपदेश दीजिये जिससे सात दिन में मेरा
उद्धार हो जाय।”
जब सब मुनि आपस में विचार कर ही रहे थे कि इतने में श्री शुकदेव जी
वहाँ पधारे। शुकदेव जी को देखते ही सब मुनि उठ खड़े हुए और उनका
बड़ा आदर-सत्कार किया। राजा परीक्षित ने भी शुकदेव जी के चरणों में
प्रणाम किया और प्रार्थना की कि, “हे भगवन्! कृपा करके मुझे वह कथा
सुनाइये जिससे मेरा उद्धार हो जाय।”
शुकदेव जी ने कहा, “हे राजन्! सुनो, मैं तुम्हें वह कथा सुनाता हूँ
जिसके सुनने से मनुष्य सब पापों से छूटकर भगवान् के परम पद को प्राप्त होता है।”
298
इस प्रकार महाराज पृथु--द्वारा अभिनन्दित भगवान् ने भी प्रसन्न हो राजा को, जिनका
हृदय शुद्ध था।
अहो, राजा का भगवान् मधुसूदन और उनके भक्तों के प्रति कितना दृढ़ और अनन्य
प्रेम था! वे भगवान् सबके हृदय की बात जानने वाले हैं। अतः उन्होंने राजा के निष्कपट
प्रेम भाव को देख लिया और वे प्रसन्न हो गये। वे, जो सबके नियन्ता
"भगवान् ने कहा कि हे वीर, हे राजा ! मैं तुम्हारे इस यज्ञ से बहुत ही प्रसन्न हूँ--जिसमें
कि यज्ञ--कर्ता ने भी, अर्थात् तुमने भी अपने हृदय में मेरे प्रति अनन्य भक्ति भाव को ही
सब कुछ मान कर यज्ञ किया था।"
जो पुरुष इस प्रकार निष्काम भाव से यज्ञ करता है,
वह सब प्रकार के बन्धनों से मुक्त हो जाता है।
इस प्रकार के पुरुष को सब प्रकार के सुख प्राप्त होते हैं।
इस प्रकार के पुरुष को सब प्रकार के सुख प्राप्त होते हैं।
जो लोग इस संसार में, अर्थात् इस लोक--परलोक में, अर्थात् इस
लोक--परलोक में, अर्थात् इस लोक--परलोक में, अर्थात् इस लोक--परलोक में, अर्थात् इस
लोक--परलोक में, अर्थात् इस लोक--परलोक में, अर्थात् इस लोक--
अध्यात्मशास्त्र कहता नहीं विभावभावों जानो, किन्तु यह जीवविभावभावों को क्यों जानेगा
जानेगा? विभावभाव तो अपने रूपको नहीं जानते किन्तु जीव, स्वरूप को और विभाव भावको
सब प्रकारोंसे जान रहा है, इससे सिद्ध होता है कि सब प्रकार ज्ञाना ही काम रहा
है। पर्याय स्वभाव रूप परिणत ज्ञान हुआ विभाव भाव नहीं था किन्तु ज्ञानका ही रूप था।
ज्ञान जब इस बातको जान लेताहै कि यह सब विभाव भाव तो केवल ज्ञेय ही हैं ज्ञेयका
स्वभाव ज्ञायक भावका नहीं हो सकता है, ज्ञान का स्वभाव तो, ज्ञायक ही
रूप है तब ज्ञानी का ज्ञान विभावोंसे भिन्न अपने ज्ञायक भाव में लीन हो जाता है,
इसमें विभावका विभावपनाभी नष्ट हो जाता और केवल ज्ञानका रूप बना रहता है।
ज्ञान जब विभाव में ज्ञानकी ही कल्पना कर लेता है तब वह विभाव रूप
हुआ! जो ज्ञान यह या उस ज्ञान रूप हुआ उस ज्ञानका कभी नाश नहीं हो
सकता। जो इस ज्ञान को विभाव से भिन्न है, जान लेता, सो वह ज्ञान,
वह ज्ञेय, वह दृष्टा, विभावको त्याग देता है सो ऐसा विभावका त्याग
केवल ज्ञानका ही काम होताहै न कि विभावका । जिस प्रकार
ज्ञान पर्याय का इस बात का ज्ञान हो जाता है कि विभाव केवल ज्ञेय रूप
ही है तब ज्ञानी अपने ज्ञान स्वभाव को विभाव से सर्वथा भिन्न ही
मान लेता है ज्ञान में विभाव का प्रवेश नहीं होने देता है। जब ज्ञानको यह
मालूम हो जाताहै कि इस विभावका मेरे साथ सम्बन्ध ही नहीं केवल ज्ञेयका ज्ञायक
रूप सम्बन्ध है तब विभाव अपने आप नष्ट हो जाताहै तब ज्ञानका ही परिणमन
सब प्रकार विभावों रूप से न होकर केवल ज्ञाना रूप ही होता रहताहै
जो सर्व तरह से, ज्ञान मात्र ही, उस ज्ञान में विभावका
लेश मात्र भी सम्बन्ध नहीं रहता है, ज्ञानी पुरुषोंका उपदेश
ही इस बात का रहता है कि अपने ज्ञायक भाव को सर्वथा विभाव से भिन्न
ही जानो क्योंकि विभाव मात्र पराधीन परिणाम हैं जिनसे कि कभी भी
ज्ञान का लाभ नहीं हो सकता केवल ज्ञानका विभाव-भाव केवल
ज्ञेय रूप होकर केवल ज्ञाता रूप ही रहता है उस रूप कभी नहीं हो सकता
केवल यह अज्ञान भाव है।
सब ही प्रकार से यह ज्ञान ही सिद्ध होता है कि संसार में
विभाव, जो भी काम इस के द्वारा होता वह केवल ज्ञान का ही
चमत्कार है न कि अज्ञानका, अज्ञानका तो कोई रूप नहीं,
जो कुछ रूप है सो ज्ञान ही का है? विभावका नाश होने पर ज्ञान ही तो
रहा, सो अज्ञानका नाश हो ही गया, फिर क्या, केवल ज्ञान; केवल
ज्ञान का ही काम विभाव रूप से ज्ञान को भिन्न करना है, सो ज्ञान ही
तो ज्ञायक है, सो ज्ञान ही ज्ञायक भाव से भिन्न कभी नहीं
सब प्रकार अज्ञानका ही त्याग हो जाना संभव है जो कि ज्ञान
द्वारा ही ज्ञानका स्वभाव अपने ही रूपमें परिणत हो जाता है।
ज्ञानी सब विभावों को अपने रूप से भिन्न ही समझ कर कभी विभाव
रूप नहीं परिणमता किन्तु अपने ही ज्ञान स्वभाव में ही लीन
रहता है तब ज्ञान को विभाव रूप कौन कहेगा? जब ज्ञान विभावका नाश
कर केवल अपने स्वरूप मात्रमें परिणत हो जाता है तब कौन विभाव कह
सकता है तब विभाव कहाँ रहा ? ज्ञानी ज्ञान मात्र ही रहा फिर
ज्ञानका विभाव का सम्बन्ध कहाँ से हो सकता है?
जब ज्ञान ही ज्ञान रूप में लीन हो जाता तब ज्ञान
का ही काम होता है तब ज्ञान विभाव रूप से ज्ञान को ही भिन्न
ज्ञान रूप करता है तब यह ज्ञान ही तो ज्ञानका सब कुछ काम
ही तो करता है, इस बात, को जान कर ज्ञानी सब रूप से अपने
ज्ञायक... से ही परिणत होता है सो ज्ञान ही ज्ञेय, ज्ञान ही ज्ञाता
होता है।
अब दो गाथा द्वारा इस विषय-को
ही और स्पष्ट करते हैं कि।
सब ज्ञानी जो कि हैं, वे पुद्गल-कर्म फल को जानते हुए
ही रहते, उनका वे कभी परिणमन नहीं करते न ही बँधते हैं,
जिससे कि केवल ज्ञानका रूप ही बना रहता है जो कि ज्ञान केवल ही ज्ञानी
रूप होता है न अज्ञान रूप, सो सब प्रकार से, जो कुछ भी ज्ञान
का काम रहा सो, सो ज्ञानीका ज्ञान ही।
300
उन्होंने उत्तर दिया, "इसका निश्चय तुम ही कर सकते हो कि न्यायालय किस बात को उचित
समझता अथवा धर्म संगत कि हम ईश्वरकी आज्ञा मानें अथवा"
सात्विकों हो ! परमात्मा किस बात को उचित समझता अथवा धर्म संगत मानेगा
पश्चात्तापियों को तो इस विषय में कोई भ्रम हो ही नहीं सकता कि वे अपने प्यारे प्रभुकी
आज्ञा मानेंगे या उनके जो निर्दोषों को तो सताते किंतु अपने को उस प्रभु का भक्त या
सेवक बताने का दम्भ भरते हैं।
यह बात भी; कि क्या सात्विक कहलाने वाले लोग अथवा वे लोग जो सत्य का दम
भरते, वाद-विवाद से जन मन को भ्रमित अथवा उद्विग्न करना चाहते हैं? अथवा वे शांत हो
जाते हैं? ईश्वर उनकी रक्षा करता? उनका यह मत था कि जब सब लोग वाद-विवाद को
ही न केवल त्याज्य किन्तु अशांति का रूप मानते हों तो, वे शांति भंग करने वालों की
सभा में न तो भाग लेते थे और अपनी सभा में उनको स्थान न देते थे। इसके साथ ही
वे ? यह निश्चय कर ही चुके थे कि यह वाद--विवाद विवादकर्ताओं अथवा उनका अनु--
सरण करने वाले निष्कलंक जन के लिए नहीं, अपितु उन लोगों के लिए ही था जिनका
लक्ष्य प्रभु सेवा अथवा प्रभु के आज्ञा अनुसार आचरण न होकर
केवल विवाद ही था। इसके साथ ही यह निष्कर्ष भी, कि विवाद के विषय में तर्क
वितर्क का कोई अन्त नहीं, जिससे जन मानस में भ्रम के अतिरिक्त, लाभ तो हो नहीं सकता
कि केवल वाद विवाद अथवा द्वन्द्व उत्पन्न होता रहता था। फिर भी, यह विचारणीय रहा
कि यह निर्णय या नियम-विधान उस जन संघ द्वारा निष्पादित सम्मत्ति सम्मत माना
गया जिसे केवल प्रभु शरण और प्रभु के आज्ञा-पालन की अपेक्षा थी अथवा उन पर थोप
दिया गया जो प्रभु की ओर से जन व जन के कल्याण के लिए केवल शान्ति चाहते थे।
फिर भी, ईश्वर उनकी आत्मा-व्यवस्था को भली प्रकार से जानता था, जिन्होंने प्रभु
आज्ञा को सर्वोपरि मानकर प्रभु के आदेशों द्वारा जन, जो सम्भवतः इस कारण वंचित
किया गया समझा जाने लगा कि वे सात्विक विचारों तथा निष्ठा अथवा ईश्वर
उपासक होने के अधिकारी हैं, जन हितैषी बनते हुए ही ईश्वर कृपा के योग्य
स्वीकार किए।
इस प्रकार यह भी स्पष्ट दिखाई दे रहा था कि सात्विक जन प्रभु की सेवा
और जन समाज के प्रति कर्त्तव्यनिष्ठ रहकर, निष्ठा पूर्वक प्रभु की इच्छा जानकर
ही पद आगे बढ़ा सकते अथवा अपना कर्त्तव्य पालन सम्पन्न कर ही रहे थे। इससे
सात्विक मत वाले व्यक्ति अपने ही प्रभाव को खोते जा रहे थे जिसकी वे कभी
उप
युक्त व्यवस्था या पद मान कर लाभ उठा रहे थे। इधर, जो जन सात्विकों
व्यवस्था द्वारा या प्रभु की शरण आकर अपना कल्याण चाहते थे वे प्रभु की कृपा से,
न केवल लाभ प्राप्त कर रहे थे वरन् प्रभु की असीम कृपा से धन्य भी हो रहे थे।
वे लोग उन धर्म-ग्रन्थों द्वारा प्रभु की कृपा को जान पाए थे, जिसे वे सदा प्रभु कृपा
का साधन ही समझते रहे थे अथवा मानते आ--रहे थे।
इतिहास के आधार पर हम यह जान ही रहे हैं कि धर्मशास्त्रियों या अन्य
जन, जो धर्मशास्त्रों को पड़े; स्वयं सात्विक जन तो प्रभु जन को ही प्रभु
भक्तिकारी मान रहे थे, इस पर जोर दे रहे; फिर भी प्रभु का प्रभाव बढ़ रहा
इतिहास के साक्षी धर्म शास्त्र हैं। प्रभु जन उनकी आज्ञा मानकर जन का
कल्याण कर रहे थे और सात्विक लोग धर्मशास्त्रों द्वारा प्रभु की कृपा से
वंचित हो जाने का भय भी जन समाज में फैलाकर समाज सुधार नहीं कर पा
रहे थे, पर ईश्वर सत्य बात प्रभु जन द्वारा ही जनसाधारण तक, सात्विक
धर्मशास्त्रियों द्वारा ही नहीं, वरन् सब साधारण जन द्वारा भी पहुंचा
रहे थे जो प्रभु सेवा से सम्बद्ध थे या जो जनसाधारण द्वारा प्रभु के रूप
तक पहुंच रहे थे। प्रभु के भक्त जन
कृपा प्राप्त कर, ईश्वर आज्ञा का उल्लंघन
न कर धर्मशास्त्रों को महत्व देते हुए धर्मशास्त्र अनुसार ही अपने
पथ पर अग्रसर होकर प्रभु को ही प्रभु मानते हुए ही प्रभुकार्य सम्पन्न कर रहे
थे। प्रभु जन को जब कभी सात्विक लोग सभा विचार-विमर्श में बुलाते
थे तब वे उस जन सभा में उपस्थित होकर केवल प्रभु महिमा ही गाते थे, जन
का हित कैसे किया जावे उस पर ही वे बल देते थे। जन सात्विक जन, प्रभुभक्त
जन, सब प्रभु के प्रभुत्व स्वीकारकर, सत्यता पूर्वक प्रभु की सेवा
करते हुए प्रभु के लिए अपने प्राणों को भी न्योछावर कर देने को तैयार रहते
अथवा प्रभु का आज्ञाकारी आचरण ही श्रेष्ठ
301
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302
की दया, उनका प्रेम, उनका त्याग, इन सबके कारण जो स्थान इन लोगों का इन लोगों
अथवा समकालीन जगत् के अन्य लोगों अथवा उनके परवर्ती लोगों के हृदय सिंहासन
अथवा मानस में, प्रभाव रूप में था, कालान्तर में वह उनका स्वरूप न रहने पर भी,
न केवल सुरक्षित रहेगा, प्रत्युत आगे चलकर जब लोग इस बात पर ध्यान देंगे, तब
उनके प्रभाव का क्षेत्र और भी विस्तृत रूप में दृष्टि गोचर हो उठेगा, इस बात इसमें
दो मत नहीं हो सकते और जो कुछ भी कहा गया, वह सब उनके समकालीन भी सत्य
था।
महापुरुषों के प्रभाव का क्षेत्र सीमित रूप से समकालीन कालजयी अथवा समस्त
ही युग का होता है। उदाहरण रूप में जब स्वामी दयानन्द जी को ही लें, तो समकालीन तो
जन समाज उनका था, पर उनका रूप क्या था और उनके प्रभाव स्वरूप ही उनका व्यक्तित्व
था, उसका स्पष्ट रूप--उस रूप विशेष का प्रभाव व गुण--तो बाद वाले लोग भली
प्रकार समझकर अपनाते चले आ रहे
यथा मन पर जो छाप थी, कार्य कारण रूप दिखाई
दे रहा स्वरूप स्पष्ट हो सकेगा। अतः जो कुछ स्वामी जी समकालीनता के
संदर्भ में कहा! सब सत्य ही था, अतः जन मानस व पर प्रभाव समय बीतने
कालान्तर में बना ही बना क्या रहेगा और अधिक उजागर होकर प्रकाश देगा, जो
प्रेरणास्पद सिद्ध हो रहा है, यह निश्चित रूप जाना जा रहा इसलिए
स्वामी जी, तत्कालीन सम्पूर्ण भारत देश के कोने-कोने में भ्रमण कर अपने
ही नहीं, सामाजिक जीवन धार्मिक विचार धारा को ही एक नया स्वरूप दिया ही नहीं वरन्
राजनीतिज्ञों को जागृत कर, जन आन्दोलनकारी बना ही तो रहे स्वामी जी देश को
अमर कर जीवन दान दे कर चले; देश का जीवन बदले; उनके इस विस्तृत
व्यक्तित्व को जहां तक, हो उजागर कर
अपना लक्ष्य सिद्ध करें, यही सच्चा हमारा कर्तव्य
"यथा शक्ति सब रूप से यथा ज्ञान यत्न से सब दिशा सफल करना"
का नाम है।
303
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305
लेकिन जब वो वापस अपने कमरे की ओर लौट रहे थे तब वे एक कोने में सिसकियों की आवाज
सुनकर अपने कदम वापस मोड़ते हुए दो-दो सीढ़ियां फांद कर ऊपर वाली बालकनी पर पहुंचे तो वहां पर
उनके बड़े भाई विनोद कुमार रो रहे थे।... रोते-रोते वे कह रहे थे कि बाबू जी, काश!... आपके
पास अगर पैसा होता तो... वे सिसकते हुए कह रहे थे कि उनका सपना था कि वे
एक सी ए बनें लेकिन सिर्फ अपनी गरीबी की वजह से वे ऐसा नहीं कर पा रहे हैं, वो अपनी पढ़ाई
जारी नहीं रख पा रहे थे। विनोद भैया बी.कॉम. पास थे लेकिन परिवार की माली हालत ऐसी
नहीं थी कि वे सी.ए. की पढ़ाई कर सकें। वे अपने सपनों को यूं टूटते हुए नहीं देख पा रहे थे।
विनोद भैया को रोते देखकर वे खुद नहीं रोये, पर उनके दिल को बहुत ठेस पहुंची, और उस
दिन के बाद से विनोद भैया की रुलाई कैलाश के दिल पर पत्थर की तरह हमेशा-हमेशा के
लिए जम गई। वो रात उनके लिए टर्निंग-प्वाइंट बन गई जिसने उन्हें आगे बढ़ने के लिए न
केवल प्रेरित किया, पर यह अहसास भी कराया कि वे आगे बढ़ेंगे, पर तब ही जब वे बाबू जी, अपने
परिवार को खुश रख सकेंगे, अपने परिवार के लिए कुछ ऐसा कर सकेंगे जिससे कि वे उन सभी
जरूरतों को पूरा कर सके जिसकी आज कमी थी।
कैलाश जी ने तय किया कि पढ़ाई तो आगे जारी रखनी ही है, लेकिन साथ-साथ परिवार
की आर्थिक मदद भी करनी होगी। अब सवाल यह था कि पढ़ाई और काम में तालमेल कैसे
बिठाया जाए और ऐसा क्या किया जाए जिससे कुछ आमदनी भी हो सके? उस समय, जब कैलाश जी
दसवीं कक्षा में थे तब वे मात्र 15 साल के थे। उनके पास न तो कोई बड़ी पूंजी थी और न ही
ऐसा कोई हुनर जिसके बल पर कोई बड़ा काम शुरू कर सकते। उनके पास था तो सिर्फ
विश्वास जिसने हमेशा उनका साथ दिया। उन्हें पता था कि काम में शर्म कैसी और काम छोटा
या बड़ा क्या होता है? और जब, इरादे नेक हों और दिल में कुछ कर गुजरने की तमन्ना हो,
रास्ता खुद ब खुद बन जाता है। उन्हें उन दिनों पता चला कि दिल्ली की एक जानी-मानी
कंपनी में टाइपराइटर की मरम्मत का काम होता है और अगर वे यह काम सीख लें, तो इसे वे
पार्ट टाइम कर सकते हैं जिससे उनकी पढ़ाई का हर्ज भी नहीं होगा और घर भी चल पाएगा।
उन्होंने हिम्मत बांधी, उस कंपनी में पहुंचे और काम सीखने की गुजारिश की। कंपनी वालों को
उनके इरादों और उनकी लगन पर भरोसा हो गया और उन्होंने कैलाश जी को काम सिखाना
शुरू कर दिया। कैलाश जी ने लगन से काम सीखा और दो महीने में ही टाइपराइटर रिपेयरिंग
का काम सीख लिया। काम तो सीख लिया, पर टाइपराइटर कहां से लाएं और कैसे बेचें? इन दोनों
प्रश्नों के उत्तर खोजने में उन्हें ज्यादा देर नहीं लगी। उन्होंने पुरानी दिल्ली के कबाड़ियों
से टाइपराइटर खरीदने का मन बनाया।
जेब में पैसे बहुत कम थे इसलिए कबाड़ियों से टाइपराइटर तो खरीदे जा सकते थे, पर
कैलाश जी जब कबाड़ी की दुकान पर गए तो देखा कि वहां पर काफी संख्या में पुराने, खराब
टाइपराइटर ऐसे ही पड़े हुए थे। कबाड़ी से बात करने पर पता चला कि बहुत-सी कंपनियों में
टाइपराइटर खराब होने पर या उन्हें बदलने के लिए लोग इन्हें कौड़ियों के भाव बेच देते हैं। कैलाश जी
के लिए यह फायदे का सौदा था। उन्होंने कबाड़ियों से खराब टाइपराइटर खरीदे और अपनी
लगन और मेहनत से उन खराब टाइपराइटरों को ठीक किया और अपनी पहली कमाई का जरिया
बनाया। उन्होंने तय किया था कि वे सिर्फ टाइपराइटर ठीक ही नहीं करेंगे, बल्कि अपनी
कमाई से बाबू जी के ऊपर परिवार चलाने की जिम्मेदारी के बोझ को भी हल्का करेंगे।
कैलाश जी जब टाइपराइटर ठीक करते थे तो इस बात का ध्यान रखते थे कि टाइपराइटर
पूरी तरह से सुधरे, ताकि ग्राहक को कोई शिकायत न रहे। इसके साथ ही, वे इस बात का
भी ध्यान रखते थे कि उनके किसी भी काम से उनकी पढ़ाई का नुकसान न हो इसलिए वे
टाइपराइटर रिपेयरिंग का काम केवल खाली समय में ही करते थे। अपने इस पार्ट-टाइम
काम से जो आमदनी होती थी, उससे वे अपनी पढ़ाई का खर्च तो निकालते ही थे, साथ ही घर के
खर्चों में भी बाबू जी का हाथ बंटाते थे। कैलाश जी का जीवन काफी व्यस्त हो चला था। वे सुबह
कॉलेज जाते, दोपहर में टाइपराइटर रिपेयरिंग का काम करते, शाम को घर लौटते और रात को
पढ़ाई करते थे।
अपनी कड़ी मेहनत और लगन से उन्होंने टाइपराइटर रिपेयरिंग के काम को धीरे-
धीरे इतना बढ़ा लिया कि अब वे न केवल टाइपराइटर रिपेयर करते थे, बल्कि उन्हें ठीक
करके बेचते भी थे। टाइपराइटर बेचने के लिए वे कंपनियों के दफ्तरों में जाते और उन
कंपनियों को अपने टाइपराइटर दिखाते। अपनी इस छोटी-सी उम्र में कैलाश जी ने टाइपराइटर
बेचने के बिजनेस को काफी अच्छी तरह से समझ लिया था।
टाइपराइटर के साथ-साथ कैलाश जी ने देखा कि कंपनियों को कई और चीजों की
भी जरूरत होती है जैसे टाइपराइटर के रिबन, कार्बन पेपर, स्टेशनरी आदि। कैलाश जी ने सोचा,
क्यों न टाइपराइटर रिपेयरिंग के साथ-साथ इन चीजों की भी सप्लाई शुरू की जाए। बस,
यह सोचते ही उन्होंने इन चीजों को भी अपनी सप्लाई में शामिल कर लिया और इस तरह धीरे-धीरे उनका
306
विचार करने लगा कि, यदि मुझे एक ऐसी कन्या मिले, जो सब काम काज गृहस्थी का भली भांति
जानती हो।
निदान उसने, अपने पिता द्वारा बात, कही कि मेरा विवाह करा दिया जाय।
तब उसके पिता अपने पुत्रके लिये ऐसी कन्या खोजने लगे कि, उसकी शिक्षा ऐसी मिली
होती कि वह उस बालकके घर गृहस्थीका काम काज--सीखना, पकाना इत्यादिक सब काम
भली भां तिसे करती अपने पतिको हरप्रकार से सुख देती, ना ऐसा कि, लाड़िली
की भां तिसे घर के कामकाज करने में आलस्य करतीहुई केवल बातें बनाती, अथवा
हर समय दर्पण ही में अपना मु ख देखा करती या हर प्रकार से गृहस्थीका सब काम बिगाड़
दिया करती होती।
सौभाग्य से ऐसा ही हुआ कि एक कु लीन जन की सुशीला और बुद्धिमती कन्या मिली
जिसे उसने सब बातों में चतुर और अपनी कन्या को भली भांतिसे गृहस्थ सम्बन्धी काम
का, न बहुत कुछ पढ़ा लिखाकर जैसाकि इस समय में देखा जाता है बल्कि
अपना काम काज, सब निज हाथ से करना सिखाया था जिसमें सब प्रकार वह उस कुल
रीति पर सब कुछ काम करे, जो उस बालिका कुल सम्बन्धी
सो इस कन्या का भी जब उक्त बालकके साथ सम्बन्ध हो गया तो यह भी समझी
कि मेरा ससुराल में बहुत धन और सुख ऐश्वर्य होगा, क्योंकि वह पढ़ी तो थी नहीं
कि जिस से कुछ संसार का गुण दोष जान सकती--जिस कारण स्वाभाविक सब के मन
ऐसा विचार उठा ही करता है। अब जब समय आया, तब दो चार दिन पाछे उसने
अपने पिता के घर सब काम काज अपने मन भाता सीखा था, सो सब काम अपने
पति के लिये सब सुख देने योग्य समझ कर किया करती पर इस ओर इसके
सुसरालके सबही मनुष्य इस पर बहुत ही अप्रसन्न
रहते कि देखो हमारा लड़का दिन रात जो जो कमाकर लाता है, सो सब
व्यर्थही बिगड़ता जा रहाहै। क्या यह सब हम को खाने को मिलता कि जोप्रतिदिन
अनेक प्रकारके भोज, नाना प्रकारकी मिठाई और कई तरह की तरकारी आदि,
सब नित्य पकाई जाती हैं। भला हम को तो केवल रूखा सूखा, मोटा झोटा? हमारे सब
कपड़े, फटेही चले जा रहे हैं। भला हम को तो कुछ नहीं मिलता? हमारा ऐसा कमाऊ
लड़का सब कुछ अपने घर ले जाकरपकाता खिलाता रहे तो, हमारा क्याभला? हमारा
लड़का अपनीगृहस्थी लिये बैठा रहे तो हम को क्या सुख हो सकताहै हमारी ऐसी
कमाईसे ? हमारी कमाईतो इस समय तबही है, जबकि हमको सब कुछसुख मिलै?
हमारे लड़केने अपना अलग घर बसाया? अब हमको क्या सुखहोगा। हमारे लड़के की ऐसी
गृहस्थी से? हमारी सब आशा मिट्टीमें मिल गई, ना ऐसा हुआ, बहुलड़केके पास
सुखपूर्वक आनन्द में रहे, ना हमको कुछ उनसे सुख मिले? सो ऐसा ही
विचार कर सबही जन बहुत ही अप्रसन्न
रहने लगे और, "नाक भोंहें चढ़ाते"
अथवा इस बात विचार से दोनों पतिपत्नी बहुत चिन्तातुर रहने लगे कि इस दशा
में, अब हम को तो गृहस्थी आश्रम में बड़ा ही क्लेश हो रहा है। हम दोनों में एक
दूसरे को सब प्रकार से सुख देने की इच्छा रख कर भी अपने ही सुख को नहीं कर सके
जिस बात का कारण केवल अविद्या ही, अतः; विद्या ही से पिता, विद्या ही से सच्चा
गृहस्थी होना है।
जब उन को, इसप्रकार संताप होने लगा तो, उनने जो गुरु दोनों जन को पढ़ाते
सिखाते उनके पास जा कर अपनी सब कथा कह सुनाई कि हम दोनों तो सब रीतिसे
एक दूसरे को सुख के लिये यत्न करते हैं परन्तु फिर भी हमारे घर में सब ही जन
जो इस बात कारण से कि हम परस्पर प्रेमसे सब काम कर रहे हैं सो दुःख पा रहे,
अब, यह दशा देख कर हम दोनों सदा क्लेश में रहते हैं! ऐसा न होवे,
तब हां, इन दोनों को ऐसा ज्ञान क्यों न हो! विद्या ही से सब काम सिद्ध हो सके,
सो ऐसा ही दोनों जन ने कहा! कृपा कर, दोनों जनों को पढ़ा दो, सब प्रकारकी
विद्या से पूर्ण करा दीजिये, कि जिससे सब रीति से गृहस्थ धर्मके आनन्द को दोनों
जन ही भलीभांति जान सकें।
इस रीति शास्त्र का सार उन को जब गुरुने पढ़ाया, विद्या पढ़ा
कर सब बातें उन दोनों को इस रीति पर समझाई कि जिस तरह अब तक वे
घर में रहकर भी सब बातों में अनभिज्ञ होकर क्लेश पा रहे थे, सो सब दूर
होकर गृहस्थ आश्रम में, गुरु की कृपा से गृहस्थ का सब सुख होने
लगा। सो इस प्रकारके विद्या से ही मनुष्य का गृहस्थ आश्रम भी सब
प्रकारके सुख से भर जाता, सो विद्या का प्रयोजन ही ऐसा है कि मनुष्य को
307
जीवन का स्वास्थ्य जो चेतना का रूप धारण करता है। इसके अतिरिक्त चेतना का कोई रूप
अस्तित्व में नहीं रह गया था। यह ही उसकी सीमाएं, इसके परे--जैसा भगवान् श्रीकृष्ण
को भी आभास हो रहा था विदेह स्थिति, वह संभव नहीं रह गई थी। इसलिए
कृष्ण के ऊपर कोई विपदा तो थी, पर वह विपदा एक ही थी और उसका स्वरूप
जीवन मात्र से ही बंध कर सीमित होने लगता था। इसलिए जब कभी कोई नया संकट
कृष्ण खड़ा कर सकते थे अथवा उनके सम्मुख उत्पन्न हो सकता था तभी वे चेष्टित
होते थे। इस प्रकार जब वे बलराम के समझाने पर मथुरा की ओर चलने को तत्पर हो रहे
थे। उसी समय विदा की बेला में जो संकट उनके सामने खड़ा हो रहा था, उसमें वे इस बात
को भली प्रकार समझ रहे थे कि-मथुरा की सीमाओं तक ही उनका अस्तित्व था।
सीमाओं के पार वे जा सकते थे लेकिन उस पार जाते ही विदेह की स्थिति खो जाती
थी, तो यह वास्तविकता के ऊपर चेतना का प्रहार ही माना जाएगा। कृष्ण इन सब बातों को
समझकर ही आगे बढ़ेंगे। लेकिन वे यह भी जानना चाहते थे कि
सब के सब एक साथ रोने के लिए तैयार क्यों हैं? यह कोई नया संकट नहीं
संकट से जूझने वाले सब लोग यह बात तो भली प्रकार समझ ही सकते हैं।
गोपियां तो शांत थीं।
कृष्ण ने देखा था, केवल दो गोपियां सिर झुकाए उदास मुद्रा में बैठी थीं,
जिन पर इस स्थिति अथवा विचार विशेष अथवा कृष्ण के चले जाने का कोई प्रभाव
पड़ना संभव नहीं था! राधा शांत बैठी थी, कृष्ण ने सोचा विदा तो वे लेंगे
ही, पर किससे लें, किससे पहले लें? यह बड़ा सवाल था, पर राधा सम्मुख आकर खड़ी
कृष्ण के उस प्रश्न का उत्तर दे देना चाहती प्रतीत होती थी, जो उन्होंने कभी
पूछा ही नहीं था। वह केवल यह सोचती थी, इस विदा का कोई महत्व नहीं
होगा इसलिए कि वह तो अब तक रोते रहे, पर उसने कभी एक भी आंसू नहीं,
जो उसकी इन आंखों तक आया हो, वह कभी भी रो नहीं सकती थी, रो सकती भी कैसे
जब सब लोग रोने लगेंगे तब कोई शांत बैठना चाहे तो उसे शांत बैठने देने का
अधिकार दिया जाना चाहिए अथवा नहीं? वह केवल यह कह सके, यह उसकी
शक्ति के बाहर होता जा रहा था। राधा विवश हो सकती थी, कृष्ण को भी यह
बात भली प्रकार से समझाई जा सकती थी। इस प्रकार वे सोचती थीं, तो कृष्ण भी
यह तो नहीं कह रहे थे। कृष्ण ने देखा सब कुछ शांत था। केवल यशोदानंदन
कन्हैया ऐसा नाम जिसे बार-बार पुकारा जाता था और वे रोते-रोते उस सीमा तक,
जिसमें केवल एक बात ही कही जा सकती थी। वे सब
केवल यही कह रहे, "कृष्ण केवल तुम।"
इसके बाद यशोदानंदन कन्हैया का ही अस्तित्व, कन्हैया केवल
कृष्ण ही केवल इस तरह से कन्हैया का अस्तित्व ही सब कुछ था। वह बलराम भी,
नंदबाबा भी केवल यह जानते थे। वह जानते थे। इस बात की बात भी नहीं
आवश्यकता समझी गई, पर यह भी सचमुच में संभव था, जब कृष्ण चले जाएंगे
तो, जो सब कुछ यहां शेष रह जाएगा वे केवल उस बात को, अपनी भाषा में
एक कन्हैया, एक कन्हैया, केवल कन्हैया, के रूप में व्यक्त करेंगे और इसके
बाद
एक भी नया रूप नहीं होगा, यशोदा मां का वात्सल्य जब जागृत होता तो
केवल मां, कृष्ण तक सीमित हो, उस बात को यशोदा ही कह सकती थी,
यशोदा भी इस बात को समझती थी, पर वे नंदबाबा के साथ थीं, इस बात का कोई
नया अर्थ तो नहीं हो सकता था। इस बात का अर्थ केवल इतना ही था, यह सब वे जानती
थीं, केवल उस समय यशोदा उस रूप में रोती, विवशता को ही अपना रूप दे सकी
और उस सीमा तक जहां तक
"हे कृष्ण केवल तुम।"
इसके बाद तो कुछ भी शेष नहीं था, पर उस पार जाना कोई बहुत
मुश्किल काम न होता तो शायद कृष्ण भी, जो गोकुल की सीमा लांघ न सके, उस
सीमा पार जाने का कोई प्रयास न करते या न ही गोकुल छोड़ कर जा पाते। कृष्ण
जानते थे कि मथुरा का रूप क्या हो सकता था। केवल विदेह स्थिति, जो वहां
समाप्त थी, वह सब अस्वाभाविक था, पर उस स्थिति को वास्तविकता प्रदान करने
का यश तो यशोदानंदन कृष्ण कन्हैया केवल एक रूप प्रस्तुत कर सकते थे, जो
वहां के लोगों के लिए आवश्यक नहीं था, कृष्ण केवल थे? इस सीमा को पार
कर वे वास्तविकता को स्वीकार करने के लिए नए रूप यशोदानंदन कन्हैया का
रूप प्रस्तुत करने जा रहे थे।
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