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एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)

DevanagariHindipublished322 पृष्ठ

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117

जब यह समय आया कि वह नन्हीं कस्तूरबा भागी, तब तो काबा जी
चकराये कि अब क्या उपाय हो सकता है? तो, उन्होंने तो हरिकृष्ण बापू जैसे
घर-घर गये, उन्होंने सब उपाय से जी भर दिया तो देखा वैष्णव तो रो रहे हैं।
उनके रोने का कष्ट देखकर तो वैष्णव रोते कभी न थे। बापू
वैष्णव केवल इस वास्ते रो रहे थे कि प्रभु को जो भोग लगा दिया था
वह अब दूसरा भोग जब तक न हो तब तक वह, ठाकुर जी भूखे रहेंगे
सो कष्ट था उन्हें, उधर कस्तूरबा के हाथ से जो हो गया था उसका तो
वह कष्ट भोग रहे थे, तो बापू बोले कि, हे वैष्णव तुम धीरज धरो। भगवान् तो
सब का कष्ट मिटाने वाले हैं। प्रभु का नाम जप करो सब ठीक होगा।
ऐसा कह के चले गये, पर जा के वह प्रभु आगे बैठ गये और प्रभु की आज्ञा
जब हो गई, तो हरिकृष्ण कस्तूरबा के पास गये और बोले कि जाइके क्षमा
मांगो। फिर कस्तूरबा जा के बैठ गई और प्रभु से, हे प्रभु तू तो कृपानिधि
है, कृपा कर कस्तूरबा के सब दोषों को, क्षमा कर कस्तूरबा को दी गई
आज्ञा, फिर जब कस्तूरबा सब विधि जान गई वैष्णवों के भय से डर के
रो रही, कस्तूरबा भगवान् को हाथ जोड़ रक्षक रक्षक कह, फिर प्रभु,
सब जन जान, कृपा करो, भक्तों के स्वांग को भगवान् को जानना, प्रभु तो
सबके घट की जाने।
जब रात बीती और सब ने उठ कर स्नान संध्या किया तो, सो तो बा--
पूजी ने ध्यान में देखा
कि साक्षात् प्रभु कस्तूरबा के गोद स्वरूप विराजते।
सो सब जन उठ कस्तूरबा को प्रणाम करने लगे, सब रो रहे
थे, सब को भय था कि इस मूर्ति रूप में प्रभु रूप होके प्रकट हुये तो
हम से जो बन पड़े सो प्रभु की सेवा में करें, पर सो सब जन रो, के तो
प्रभु बोले कि, तू कृपा कर सब जन पर।
"वैष्णव सब शरण गये, तो वैष्णव रूप प्रभु प्रकट सब को, वैष्णवों
द्वारा अपना यश सब को दिखाया और सब वैष्णव सब को भोग लगा भोग
कराया और वैष्णव जन, जो प्रभु के शरणागत होके सब कुछ करते
वैष्णव रूप प्रभु को भोग लगा आगे वैष्णव रूप प्रभु सब जन को भोग
देकर सब वैष्णव तृप्तता को पा के प्रभु सब जन वैष्णव रूपी प्रभु की
जय जय रूप सब ने उच्चारण किया सब ने वैष्णव रूपी प्रभु के चरण छुए
सब ने जो भोग दिया घर-घर जाकर सब जन सब को प्रभु का भोग सब जन
दिया, सो सब वैष्णव का कल्याण हुआ।"
सो सब जन देख के, कस्तूरबा के, वचन से, वैष्णवों का मान हो,
कस्तूरबा रूपी बा-पू के चरणों में वैष्णव चरणों को वैष्णव रूप मानकर
कस्तूरबा के आगे सब शीश नवा रहे।
बापू जब ध्यान करके उठे सब वैष्णव, जन, कस्तूरबा, सबने अपने
अज्ञान के भाव मिटाके जो कस्तूरबा बा-पू थे, उनके श्री चरणों में साष्टांग
प्रणाम कर सबने अपने अज्ञान को मिटा-कर वैष्णव के जो भाव को समझा
वैष्णव रूप कस्तूरबा को वैष्णव रूप में देख सब वैष्णवों का
कल्याण हुआ सब सब लोग भाव प्रकाश कर प्रभु के नाम का स्मरण कर रहे
और ध्यान धर
रहे कि भगवान् के स्वरूप को जो सब समझ ले उस पर प्रभु कृपा हो
सो सब वैष्णव ने जान कर प्रभु के गुण को गाया; तो इस तरह बापू अपने
गांव को, फिर परिवार के सहित चले आये।
"हे प्रभु हम सब को सन्मति दो।"
हे प्रभु आज हम सब ने कस्तूरबा रूप देखा, हे प्रभु तेरी लीला
सब जन क्या जाने कोई कोई जन जाने व समझे; हे प्रभु सब को तू अपना,
प्रभु का दर्शन सब को मिले जिससे व जाने, हे भगवान्, सब जीवों का
कल्याण कर सब पर दया कर कष्ट मिटा दे सब जीवों को सब कष्ट से छुड़ा
कर सब जीवों को अपने ही नाम का दान देकर अपने चरणों शरण में तू
लीना।
जब बापू सब काम निपटा कर बाहर आंगन में आये तो क्या देखते
हैं कि एक वैष्णव रो रहा था कि अपने अज्ञान से प्रभु को कष्ट दिया
और उस जन का कस्तूरबा ने कष्ट निवारण कर उस पर दया की व प्रभु
118

इसलिए बार-बार समझाया जा रहा-था। संसार में रहकर ही मुक्ति का उपाय ढूँढ लो अन्यथा यह
तन छूटेगा
ताके, फिरि चौरासी न ॥ भाई, नर देहिया का न भरोसा पाछे परिहै काल की
फाँसी पर नर देहिया मिलेगी नहीं। जब तक यह नर देह मिली हुई तब तक अपने लक्ष्य को
तन से लगा लो भाई, नर देहिया फिर नहीं मिलनी है। फिर तो चौरासी की फाँसी में बंध
कर चले ही जाओगे और फिर सब का सब माया के चक्कर में फँसोगे। जो मनुष्य देह मिला
हुआ सब कुछ तो इसी में ही सब कुछ मिल सकता था। जब नर देह ही नहीं तो फिर
क्या? फिर काल चक्र घूमता ही ही ही रहेगा। चौरासी चक्कर लगा ओ!
इस शब्द पर सन्तमत व्याख्याता स्वर्गीय श्री तुलसीदास जी
का कहना बहुत ही सुन्दर व सार युक्त विचारणीय रहताथा-
"जिस मनुष्य रूप को, जिस मनुष्य शरीर जैसी अमूल्य वस्तु को सब ही
शास्त्र ग्रन्थ उत्तम मानते हैं। मन को सब से श्रेष्ठ मान कर मनुष्य को मुक्ति का साधन,
भगवद् का वा परमात्मा प्राप्ति का साधन मान कर साधन का ऐसा अमूल्य नर देह दिया
जिसमें न तो शक्ति की कमी थी और न बुद्धि की। जहाँ मनुष्य अपनी समझ से काम ले सकता
था। जिस देह से परमात्मा को भी वशीभूत कर सकता था। जिस नर देह से ईश्वर को
जाना जाता था और उस नर देह को, जो इतना सब कुछ कर सकता था। बिना किसी
खास उद्देश्य के यों नष्ट समाप्त किया जाय? जरा सा तो सोच देखो, बार-बार चेतावनी
सब सन्त महापुरुषों ने दी कि यह देह, इस देह को ऐसे न गंवाओ।"
बात ठीक, विचार कर सब कुछ किया जा रहा था। जब तक सन्त उपदेश दे रहे थे
समझाते थे, विभिन्न दृष्टान्तों से समझाते सब अपनी समझ लगा रहे थे कि हां,
सन्त ठीक समझा रहे हैं। सन्त रूपी गुरु शिष्य के हृदय रूपी कली को खिलाना
आरम्भ करते हैं। जब तक कली बन्द है, तब तक ज्ञान रूपी पुष्प की महक नहीं आ रही है
पर जब कली खिल जाती है, तो सब ओर महक फैल जाती है। सन्त भी यही चाहते हैं।
सब को, मानव-मात्र को, सब के घट में, सब के हृदय में सतगुरु परमात्मा का ज्ञान
जो प्रकाशित हो तो यह ज्ञान अन्धकार को हर लेता संसार के सब, प्राणी, जन...
॥
सब तो समझ में आनी वाली बातें हैं। समझ सब कुछ सकते हैं। पर फिर भी
ना समझ सा व्यवहार करते हैं। जो बातें मानव को घट रूप दीपक प्रज्वलित कर दी
जाने योग्य बना रही हैं। उन सब का प्रभाव उल्टा क्यों पड़ने लगता? इसका एक
मात्र कारण यह हो सकता है कि, मन का सब कुछ विपरीत
ही दिशा जाना था, मन का क्या भरोसा? इसका क्या विश्वास? मन सब को भर
मायेगा ही। मन का भरोसा ही सब को संसार की ओर खींचता चला गया।
इसका क्या उपाय सोचा जाय जिससे मन को वश में किया जाय? संसार के सब
बन्धन, मन द्वारा बाँधे जा रहे थे। मन के नियन्त्रण के लिए केवल
ही सतगुरु का नाम ही काम
आता देखा गया, पर जब तक जीव सतगुरु वचनों की ओर ध्यान नहीं दे रहा
होता था तब तक समझ में आ भी रहा होता था पर मन विचलित कर देता था।
सन्त गुरु समझा रहे थे कि, सतगुरु का, सन्त-गुरु का ध्यान मन द्वारा
किया जाय। सतगुरु नाम रूपी मन्त्र... का!
जो मन बार बार हर ओर भाग रहा, भटकाव में पड़ भटकता
फिर रहा था उस मन को बाँधने के लिए केवल सतगुरु नाम ही होगा? इसलिए जब
भी मन का ध्यान लगाया जाय तो पूरा-पूरा ध्यान केवल सतगुरु नाम में
पर होना चाहिए। ध्यान की सफलता के लिए ही तो मन को एकाग्र कर सब का
सब कुछ स्मरण किया जाता
केवल नाम का ही स्मरण करने से क्या सफलता मिलेगी? जब तक मन
केवल सतगुरु के ध्यान में एकाग्र न हो जाये? केवल मन को नाम द्वारा साध
कर क्या होगा? मन का क्या स्वरूप? जिसे सब ओर से मोड़
कर मन को केवल नाम रूप मन्त्र में एकाग्र करना पड़ा था।
स्मरण करने के लिए जब सन्त महापुरुषों से प्रश्न किया गया तो
उ त्तर, सन्त-गुरु ने स्पष्ट कर समझाया कि मन विकार रहित होकर
केवल ईश्वर नाम में ही ध्यान लगावे, तो संसार व सब विकारों से छूट
कर, मन का भटकाव सब दूर हो जाता तथा, नाम स्मरण करने
का अवसर आ ता, जिससे मन, सब ओर से हट, केवल परमात्मा का, प्रभु
नाम, रूप का स्मरण ही ध्यान में लाता, जिससे नाम का ही सिमरन हो
119

प्रत्येक पदार्थ अपने अपने स्वरूप कारण सत्ता अन्तःकरण का विषय बना, इसके दो रूप, १ रूप
वह जिसमें वह रहता वा वह १ जिसमें वह रहता अर्थ दोनों का एकही पर दो दो प्रकार
अनुभवगम्य है।
एक रूप तो इसका यह स्वतः सिद्ध वा यह रूप सब समय वर्तमानता से कह कहें
इस रूप से जगत का जो रूप वा रूप दृश्य जगत् उत्पत्ति-स्थिति वा प्रलय रूप यह जो
रूप सोई केवल रूप जगत् कह कह कह सत्य, जगत रूप जगत् का रूप उत्पत्ति-
स्थिति प्रलय का अनुगत ही स्वरूप कह जाता है।
इसमें जो भिन्न रूप वा जो भिन्नता सो दृश्य का रूप प्रत्यक्ष जगत् का जो
स्वरूप सो केवल रूप, केवल रूप जगत का, सो तो परिणामी ही, विकारात्मक
रूप ही सो सदा विकार सहित रूपार्थ में १ रूप सो, जो विकार रूप वह तो रूप सत्य
ही, पर जो रूप है, केवल परिणामी रूप में वह रूप सो, सो विकार रूप
सो रूप मिथ्या, केवल रूप जो रूप सो १ रूप सत्य ही जान पड़ता
वा १ प्रत्यक्ष के रूप सत्यता वा असत्य का निर्णय तो स्वतः ही बुद्धि द्वारा
प्रत्यक्ष हुआ कि?
सो प्रत्यक्ष रूप के सत्य असत्य कार्यकारणता से, जब विचार कर देखिये
स्वतः ही हो जाता कि जगत रूपार्थ सो परिणाम का रूप ही, जो केवल परिणामी है!
पर इस परिणाम का रूप जो सो, सो केवल ज्ञान रूप रूप १ रूप सत्य जान पड़ता
कि सब १ रूप का परिणाम रूप जगत् दृश्य परिणामी उपाधि से भिन्न केवल १
ही जान पड़ता है। कह कह सब जगत् परिणामी वा परिणाम के दो प्रकार
एक केवल सत्य वा सब दृश्य जगत रूप से सो सत्य, सो तो दो प्रकार जान
पड़ा
इत्यादि सब रूप से--इस रूप परिणामी सब जगत् रूप कह कर सो रूप से--इस
रूप विचार रूप, परिणाम स्वरूप विस्तार का निर्णय कह के, जगत् रूप को, सब
जगत् रूप मिथ्या रूप कहा, कह के इस बात को तो दो प्रकार से कह
दिया जगत् का सब रूप रूप का परिणाम
स्वतः सब परिणाम ही परिणामात्मकता को, परिणाम विस्तार रूप से जो दृश्य
जगत् सो तो सत्य ही कहा, जब कि परिणाम ज्ञान रूप कह के सत्य ही
कह कह कह कर कह के कह के कह, पर जो रूप दृश्य जगत् सो तो स्वतः ही वा दो
प्रकार सत्य ही, जो परिणाम के ज्ञान रूप से ज्ञान रूपी जगत् को ही सत्य
प्रकार कह
सत्य जान कर, केवल ज्ञान रूप को, केवल ज्ञान स्वरूप, केवल ज्ञान
रूप को ही जान लिया कि सब सो सब रूप कह कह कर, केवल
ज्ञान ही का रूप रहा कि?
केवल स्वरूप जान कर कह के कह दिया कि? यह ज्ञान केवल रूप जो
सो परिणाम का रूप कह कर कहा, जब कह दिया केवल, केवल ज्ञाना-
त्मकता ही केवल रूप कह गया, तो कह के यह निर्णय हुआ, कि केवल
परिणाम ही तो परिणाम के स्वरूप कह को कह दिया
तदनु; इन सब में परिणाम का स्वरूप यह कह के जो रूप सत्य कहा
सो सत्य ही तो स्वतः ही सत्य रहा, पर दो दो रूप में जो रूप सो सत्य ही
कहा ही, सो परिणाम के दो रूप में से एक रूप तो सब जगत् का केवल
जो रूप सो रूप ज्ञान रूप उपाधि से, सो ज्ञान रूप तो स्वतः सत्य रहा कि?
जब कह, सत्य रूप तो कहा ही, परिणाम परिणाम जान कह दिया ही, पर
रूप तो केवल
ही का रूप रहा जो सब जगत् रूप सो स्वतः सत्य रूप माना ही जाता
जान पड़ा? सो इस प्रकार से तो सब सत्य ही रहा कि? फिर दो परिणाम
कैसा रहा, कैसा रहा? फिर रूप से तो स्वतः जान सब जगत् रूप सो
कहा ही सो सत्य स्वरूप ही तो सब हुआ
पर दो दो रूप कह के तो इस रूप को दो प्रकार से तो कह दिया,
इस प्रकार जगत् के दो स्वरूप, एक रूप तो केवल जगत् रूप सो जो
सो तो सत्य ही, पर दूसरा रूप सो ज्ञान रूप में १ का रूप जो जो सो कहा
सोई सब परिणाम रूप से तो इस रूप में १ रहा, पर यह तो ज्ञान का रूप
जगत् उपाधि के रूप में तो स्वतः ही हो जाता कह के सब में १ रहा,
कह कर के केवल रूप जगत् का इस रूप कह के कह के कह १ रहा, सो
120

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The provided image contains text where all the characters have failed to render (displayed entirely as missing-glyph square/tofu boxes □) due to a missing font during PDF generation/rendering.

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122

पाँच श्लोकों तक तो इस महाकाव्यके रचनाकालके सम्बन्धरूपमें ग्रन्थ--रचना-उद्देश्यका ही
काव्योचित चमत्कारका प्रतिपादन कर अब ग्रन्थ के प्रारम्भ में जो मङ्गल रूप पद कहा गया था उसकी
व्याख्या की आवश्यकता समझ-बूझकर ग्रन्थकी रचना क्यों, किस प्रयोजन से कीगई,
मङ्गलके पद का क्या भाव हृदय में समाविष्ट था इसका अब वर्णन इस काव्य द्वारा करते हैं।
इस काव्य में जिस पावन चरित्र तथा उस चरित्र के अधिष्ठाता का गुणकीर्तन कियागया है
उस का स्वरूप क्या था तथा वह गुणकीर्तन किसप्रकार कियागया इसपर प्रकाश डाला गया
है, सो कहते हैं कि उस पद के द्वारा केवल इतना मात्र संकेत कर देने परकि 'जिनके द्वारा'
मात्र कह देने से तो काम नहीं चला, सो कैसा स्वरूप उन का था इस बात को स्पष्ट
समझने के लिये यह कहा गया है, सो पहिले अर्थ को समझ लें।
जो भव्य जीव जो भी आत्म या पर का स्वरूप देखते हैं, सो बिना
ही जाने वा, बिना जीवादि के यथार्थ स्वरूप जाने नहीं हो सकता, जिस से
संसार का अन्त हो जाय, ऐसी मुक्ति अवस्था के लिये जो भव्यजीव प्रयत्न--के
पात्र--अधिकारी हैं उनको जो उपदेश या प्रेरणा इस ग्रन्थ द्वारा दी गई है उसका
तात्पर्य ही मोक्षमार्ग को न समझने वाले अज्ञानी जनों के लिये यह ग्रन्थरूपी दीपक है।
ग्रन्थकार को भी मोक्ष पद को प्राप्त करानेवाला सिद्ध हो सके यह भी, कारण ग्रन्थ की
रचना करने में मुख्य तथा प्रधान हेतु समझा जा सकता है। इस प्रकार ग्रन्थ के
निर्माण का जो प्रयोजन, वह भव्य जीवों को सन्मार्ग की ओर ले जाने का साधन रूप सिद्ध
हो यह इस काव्य से, स्पष्ट समझ लिया जासकता है।
सिद्ध-जीवों का स्वरूप तो सब ही शास्त्रों में, कर्म रहित होने से शुद्ध ही
कहा गया है। सो इस पावन स्वरूप का कथन करने वाला ग्रन्थकार कैसा होना चाहिये!
ऐसा ग्रन्थकार भी शुद्ध होना चाहिये तभी वह इस प्रकार का ग्रन्थ लिखेगा! सो उस
ग्रन्थकाररूप पवित्र आत्मा को जो अपने ही स्वरूप का अनुभव कर रहा है ऐसा जो
सम्यग्दृष्टि है उस आत्मा को सम्यग् दर्शन, सम्यग् ज्ञान तो है ही, साथ
ही सम्यक् रूप आचरण भी उसका हो सकता है। यह ग्रन्थ-कर्ता का गुण है।
ग्रन्थ-रचना में, ऐसा यथार्थ-ज्ञान आत्मा युक्त ही हो कर ग्रन्थ को प्रमाण
बना सकता है। जब भव्य जीवों को इस ग्रन्थ का आदर करना हो अथवा इस
ग्रन्थ से लाभ उठाना हो तो इस ग्रन्थकारके स्वरूप का मनन करना बहुत ही
जरूरी बात समझी जाय, सो ग्रन्थ-रचना का जो भी कारण है, भव्य जीवों के
कल्याण की भावना मात्र है, ग्रन्थकार किसी भी लाभ के लिये, चाहे वह ख्याति के
रूप-में प्राप्तहोती हो अथवा द्रव्य के रूपमें मिलती हो, अर्थ-सम्बन्धी
प्राप्ति का ग्रन्थ कर्ता कभी भी अभिलाषी नहीं होसकता। केवल पावन चरित्र
रूप सिद्ध-पद का वर्णन ग्रन्थ-कर्ता ने किया, भव्यजनों को उस
ओर, आत्म-स्वरूप साक्षात्कार करने के लिये, साधन के रूप में,
सिद्ध-पद को प्राप्त हो कर जो सब से बड़े ग्रन्थकार हुए हैं उनका
रूप इस ग्रन्थ में बताया गया है जो कि भगवान् ऋषभदेव थे।
ऋषभ देवने केवल ज्ञान प्राप्तकर, सब ही जीवों के लिये
कल्याण का मार्ग बताया। ज्ञान ही तो आत्माका स्वरूप है, जो सब ही
संसारी जीवों में विद्यमान है। उस ज्ञानात्मक स्वरूप का वर्णन इस ग्रन्थ में
किया गया है, जिसका मनन प्रत्येक मुमुक्षु को करना आवश्यक समझा
गया है--यह सब ही भव्य जीव, जो इस ग्रन्थ को मन-वचन और काय
से पढ़ते हैं वे-भी इस पदके अधिकारी बन जाते हैं।
इस काव्य का भावार्थ यह, कर्मों के विनाश करने वाले पद को प्राप्त
करने के लिये उस पद का स्वरूप तथा उस स्वरूप वाले गुरु का पद सब ही
जीवों को, जो भव्य हैं और जो संसार से पार जाने के लिये उत्सुक हैं
उस पद को प्राप्त कर सकते हैं, इस लिये इस काव्य का आशय यह ही हुआ
समझ लेना चाहिये कि यह ग्रन्थ, मोक्ष को चाहने वाले भव्य
जीवों का, "मोक्ष को देने वाले भगवान् का यह स्वरूप है। उस
स्वरूप को तुम सब मनन करो जिससे, संसार के जन्म और मरणरूपी चक्र से
मुक्ति पा सको।"
यह भाव बतलाते हुए "केवल ज्ञानके इस स्वरूप को प्रकट किया"
ऐसा अर्थ समझना चाहिये।
इस ग्रन्थ-कर्ता ग्रन्थकारने जो कथन किया है, कार्य-रूप कारणका
कथन समझ कर सिद्धान्त रूप में समझ कर ग्रहण तो करना ही चाहिये, पर
केवल उस कथन रूप वचन के बलपर ही मात्र विश्वास कर लेना ही उचित
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पंचम अध्याय/सूत्र क्र. 20-21

ॐ नमः सिद्धम्
सर्वार्थसिद्धि
पंचम अध्याय/सूत्र क्र. 20-21
सूत्र 20
जीवो नाम चैतन्य रूप वस्तु सर्वदा चेतना गुणकौं धारक
रूप स्पर्श रस गंध रहित है स्वभाव रूप अरु स्पर्श
गंधादि पुद्गल रूप है ताकौं यह जीव पुद्गल के संबंध
करि नाना प्रकार जानि तन्मय होय सुख दुख कौं अनुभवै
इस जीव को यह सुख "दुःख" पुद्गल द्वारा उपजाया
सूत्र 21
जीव और पर रूप पुद्गल के जो परस्पर उपकार कहे
तिनकौं परस्परोपग्राही जीव कहा सो जीव कौं अजीव
अरु अजीव कौं जीव उपकार करै है यह बात प्रत्यक्ष में प्रमाण
परस्पर एक कार्य परस्पर तैं सिद्ध होय तैसे स्वामी
सेवक परस्पर उपकार सहित जीवैं स्वामी द्रव्य करि
सेवक का उपकार करै सेवक सेवा करि स्वामी
का तै भला उपकार करै सोई स्वामी सेवक कहलावे
स्वामी तैं जीवै सेवक तैं स्वामी द्रव्य पावै
ऐसे प्रमाण तैं सिद्ध होय स्वामी तैं सेवक
का भला सेवक तै स्वामी का भला सिद्ध
इस तरह एक एक परस्पर तैं काम निकसै
"जीव" जीव को सुख देवे पर जीव को
पर उपकार करे उपकार यहि तैं यह सिद्धांत
"जीव" तैं पर का भला पर तैं जीव तैं सिद्ध
जिस प्रकार स्वामी और सेवक एक दूसरेके काम आते, उपकार पर उपकार करे, सो तो,
प्रत्यक्ष ही सब को मान्य है, इसी से यह प्रत्यक्ष प्रमाण हुआ कि परस्पर उपकार होता है,
पर सो तो सब जगह ऐसा देखनें में नहीं आता, कहीं ऐसा भी देखाजाता है स्वामी
सेवकको भूखा मारता है, और जो देता भी, सोभी काम लेकरके पेटभर पेट नहीं देता,
सब ही काम पुरा लेकर भी पेट भरके आहारिक नहीं देता।
जो ऐसा भी स्वामि सेवकके परस्पर उपकार में कोई कहे कि यह बात तो न बनी,
तिस को उत्तर यह, कि जो ऐसा परस्पर में एक दूसरे को काम आकर उपकार नहीं
करे, वह तो न स्वामी, न ही सेवक कहा जा कर परस्पर का प्रमाण घटाया जा
सकता है सो स्वामि सेवक के दृष्टांत में इस वात का भी ज्ञान हो गया कि उपकार
एक दूसरेका काम सो ही है कि जो परस्पर उपकार का भाव रख कर एक दूसरे
परस्पर को सुख देने का भाव रक्खें सो उपकार भाव कहा गया है सो ऐसा ही
उपकार एक दूसरे जीवों का आपस में होना चाहिये।
सो तो हो सकता भला पर जहां ऐसा न हो अर्थात् एक दूसरेको दुःख देता होय
सो ऐसा तो सब ही प्रत्यक्ष प्रमाण बना ही रहता, तो फिर तो सिद्धांत ही गलत
ठहर जावेगा क्यों कि यहां तो परस्पर उपकार जीवोंका लिखा सो, तिस का उत्तर
ऐसा है कि जहां कोई जीव एक दूसरे को दुःख पहुंचाता वह अपने ही कर्मके उदय
वश ऐसा उपद्रव उस पर कर रहा है, तिस से उसका कोई संबंध
जीवके परस्पर के भाव रूप न समझना चाहिये सो यह तो कर्म सिद्धांत
पर बात आवेगी
परस्पर उपकारियों में तो एक दूसरे जीव का यह काम होना चाहिये कि धर्म,
के काम में, उप देश देवे परस्पर में एक दूसरे को धर्म की बात कहे! कि कोई
धर्म का विरोधी नित्य विपरीत न हो जाय सो ऐसा ही उपकार का प्रयोजन यहां
लिखा सो भी, जीव जीव के उपकारार्थ! समझ कर यह काम करे? जिससे कि
संसार के सब प्राणी एक दूसरेके उपकारार्थ हो सकें, इसीलिये जीवों
का उपकार, जीव परस्पर कर ही सकते
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विचारवान् पुरुष को अधिकार का त्याग व्यर्थ, विवशता समझ कर ही नहीं
स्वीकार कर लेना पड़ा, वरन् उसने इस बात को भी भली भांति समझ, जो कि सच थी,
पराक्रम और पुरुषार्थ दोनों जिसके स्वरूप में ही समाये हुए हैं क्या? विवेक को
इससे अलग है? पराक्रम क्या है? मात्र उद्दण्डता है? केवल हठधर्मिता का नाम ही
शक्ति स्वरूप कहा गया? उस उद्दण्ड, उस विवेक, उस हठ को धर्म का रूप दे कर
जो रूप संस्थापित हो वह विचारवान् को तो कभी मान्य नहीं होगा, जिसे सब धर्म
का, पुरुषार्थ का?
विकास के लिए किस प्रकार विचारवान् को इस बात स्वरूप देखना पड़ा हो होगा? इसे कोई
चाहे तो विवेक या पुरुषार्थ का रूप कह कर इसकी प्रशंसा कर सकता हो या निन्दा
कर इसे भय स्वरूप ही कह कर देखे, विचार तो इन सब बातों से, विशेष कर इस
बात को, जिसे हम भी समझ रहे; यह कि इस महा-त्याग के रूप में ही धर्म
रक्षा, समाज रक्षा का मार्ग है; इस सब को त्याग--के रूप में ही ग्रहण कर उस
समय, विचारवान् ने जो कहा था, "विचार करो!" वह आज का भी विचार बन कर आज
भी "विचार करो" के द्वारा अपनी स्थिति को तो कर रहा है, जिसे सब सब को आज
पुरुषार्थ का रूप देना
जिसे सब धर्म? सब विचारवान् के इस रूप में, जिसे विचारवान् रूप में
संस्थापित किया जा कर जिस रूप में रखा जा सकता था जिसे सब स्वीकार कर सके
जिस से सब लाभ उठा सके ऐसा रूप दिया जा सके सका हो, न कि केवल त्याग का
स्वरूप विकास कर ही पुरुषार्थ का स्वरूप बनाया जा सके जो फिर सब काल सब
व्यक्तियों के लिए, उन के सब रूपों के लिए, उन सब को पुरुषार्थवान् रूप में
ही सब संस्थापित हो, जिस से धर्म रूप
आज, समाज, विचार के इस रूप स्वरूप विकास स्वरूप रूप में नहीं
रूप में कहा जा रहा हो कि इस रूप में तो त्याग करने वाले को ही स्थान मिले
वरन् इस रूप में कि वह रूप सब को, अपनी शक्ति अनुसार त्याग का भी रूप दे
सके और इस रूप में पुरुषार्थ का रूप भी दे सके जिससे विकास रूप में वह समाया
रहे। आज, जो भी धर्म या विवेक का रूप इस स्वरूप में तो स्वीकार हो सकता
लेकिन, जो यह रूप पुरुषार्थ का तो भी इसका फल-तो मिलता ही था, जो-जो रूप
दिया, सो तो भला अपने विकास रूप में दिया हो पुरुषार्थ का व्यक्तिगत रूप भले
प्रकार दिया।
पुरुषार्थ विकास का विवेक के साथ ऐसा स्वरूप संस्थापित हुआ था
जिस से, जो रूप में सब को देखना न पड़ा, जिसके विकास का रूप इस रूप
में ही, विशेष-रूप दिखाई पड़े, जिस रूप को सब देख सकें, सो यह
रूप तो केवल त्याग-मात्र स्वरूप रूप का ही रहा, इसका दूसरा स्वरूप क्या?
सब काल सब को धर्म का विवेक रूप ही तो हो सकता--जिस बात को विचार
ने समझाया था, उस का रूप ही यह
प्रकार के रूप का यह स्वरूप भी तो सब पुरुषार्थ का एक रूप था,
जो केवल उस रूप तक पुरुषार्थ रहा, उस से समाज और विवेक को ही
रूप मिला जिस रूप स्वरूप को आज तक स्वीकार किया जा रहा था जिसे सब
लोग सब रूप में जिस रूप में देखा गया था, समाज इसे किस तरह स्वीकार
कर सका जब कि समाज रूप में तो इस तरह नहीं था, उस से आगे भी, जो
रूप था वह केवल संन्यास का रूप नहीं था, जिस में केवल त्याग था,
वह पुरुषार्थ स्वरूप न रहा, उस रूप में, उस स्वरूप तक सब को समाज ने देखा
रूप में जिस रूप में इस विवेक रूप रूप में समाज के स्वरूप को देखा, सो
वह रूप संस्थापित संस्थापना तक ही, समाज रूप न केवल ही स्वरूप अथवा
शक्ति के रूप में ही नहीं समाज रूप को सब तरह स्वरूप में ही समझा
गया रहा होगा ही, महा-दान स्वरूप के रूप में, उस बात तक समाज विवेक के
उस रूप तक स्वरूप रूप ज्ञान-दान स्वरूप किया गया, जिसे धर्म का
पुरुषार्थ रूप रहा
इस पुरुषार्थ रूप को विवेक का जो रूप स्वरूप कहा गया वह उस
रूप में दिया गया, जिसे त्याग का, सो विवेक रूप तक पुरुषार्थ का रूप था, सो
विवेक का वह स्वरूप तो रूप में जिस रूप संस्थापना स्वरूप के रूप में समझा,
सो रूप स्वरूप रूप में ही उस का विवेक स्वरूप रहा, सो रूप केवल उस
रूप तक ही ही नहीं समझा गया रूप में जिस के रूप में, उस विवेक को
समाज उस रूप रूप में जान रहा
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दृश्यमान चिह्नों के आधार पर प्रतिलेखन:

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128

तब वह बालक निराश होकर रोने लगा। निश्चय ही किसी बात आवश्यकता होने योग्य यह जीव रोता,
चिल्ला उठता होगा और वह समझना माता का काम था और यह काम पूर्ण
कर देती होगी। अचरजभरे कौतुक भरी दृष्टि लेकर बालक नवीन दृष्टि से देखता होगा
पश्चात्ताप भरा हृदय उसका पिघल उठा, आँखों से बहते दो अश्रुओं द्वारा पिघले हुए हृदय
निकला हो, उसका सारा हृदय रो रहा विवश-विवश था, केवल दो अश्रुओं द्वारा
पश्चात्ताप का स्वरूप और नहीं था। वियोग-वेदना तड़फते बालक को देखा तो, वह पिघल कर
स्वयं जल होकर बह जाने योग्य हुआ।
निश्चय हुआ, प्राण पश्चात्ताप को ही आधार पर जीतकर जीवित रखने का उपाय ढूंढ
निकालने योग्य हुआ था कि पश्चात्ताप स्वरूप के भय से ही जीवन का उपाय ही ढूँढ़ा
सकेगा।
"आज दिन-रात का विचार ही समाप्त करना पड़ा फिर भी नहीं, यह केवल दो दिनों
की बात नहीं यह बात नहीं पश्चात्ताप फिर जन्म के लिए आधार बनाकर, उस आधार पर ही
उस पापी को फिर नया जन्म फिर जन्म के लिए जीवित रहकर जीने की ओर ले जाए, तब तक
जब तक पश्चात्ताप हो, पश्चात भी बात का विचार ही ना करना पड़े।"
इसी विचार साथ प्राण को ऊपर उठना पड़ा फिर आधार ढूँढ़ते
हुए बालक को एक बार फिर देखना था कि उसकी
बात पूरी तरह समझ में आए फिर प्राण ऊपर से देखता
"बालक यह बात तो...।"
वह बालक शांत होकर पश्चात्ताप की स्थिति से इस संसार को
अपनी स्थिति से देख रहा था। उसके प्राण में ऐसी ही स्थिति
उत्पन्न हुई थी कि वह भी इस बात को समझ रहा था, जिस बात को प्राण
खुद सोच रहा।
केवल वाणी से ही सम्भव हो सका था बोलना, यह तो सब जानते थे! पर
वाणी का प्रभाव उस समय तक संभव हो सका था जब तक वाणी बोलने वाले
बात स्वयं तक सीमित थी। इस समय वाणी से बोलने की आवश्यकता थी ही नहीं
केवल वाणी भाव से सम्भव हो सकती थी। उस समय वाणी केवल भाव को
प्रकट करने का साधन थी, पर वाणी वाणी से परे, केवल
शब्द ही सब कुछ सम्भव कर देता था बात, वाणी; फिर यह तो सम्भव
ही नहीं था, पर; केवल वाणी वाणी से परे वाणी का प्रभाव सब
ओर दिखाई दे रहा था। वाणी, जो वाणी रूप में सब प्रकार
वाणी का ही प्रभाव सब पर असर कर रहा था। वाणी का ही प्रभाव था,
जब वाणी का प्रभाव था, तो इस प्रकार वाणी, इस से पूर्व नहीं थी,
पर वाणी का प्रभाव ही सब पर असर कर रहा था। वाणी का प्रभाव
केवल ही ही हो सकता था पश्चात्ताप वाणी रूप में नहीं था, वाणी-
वाणी ही ही था केवल पश्चात्ताप ही वाणी के रूप में सामने था।
उस बालक के मुख से कुछ शब्द बोलने के ढंग से नहीं पर केवल अश्रु गिरते
देखकर प्राण समझ ही रहे थे। बालक अपनी बात को कह नहीं सकता था पर
बालक के मन पश्चात्ताप का भाव जीवित था। प्राण समझ चुके थे बालक
को सब कुछ समझ हो, उस समय जब प्राण ने बालक के मुख की ओर देखा
बालक का मुख रोने लगा था। बालक के मुख को देखकर
बालक का स्वभाव ऐसा था, जिससे! पश्चात्ताप से ग्रस्त हो, बालक शांत
होना था, जिससे! बालक को शांत था, जिससे वह शांत भी हो रहा था, पर वह
स्वयं ही रो पड़ा था, उस बालक के मुख को देख, प्राणों के पश्चात्ताप का
अब पश्चात्ताप का कारण ही नहीं था। पश्चात्ताप सब कुछ था, सब
कुछ हो चुका था? पश्चात्ताप सम्भव था? पर सब तो समाप्त होने ही वाला था!
पर प्राण को जब इस बात का अहसास हुआ कि प्राण शांत होने लगा है, तब प्राण
शांत हो जाने से पहले एक बार फिर देखना चाहता था कि बालक किस
तरह बालक की ओर देखा और बालक के मुख की ओर देख
इस तरह पश्चात्ताप के भाव को इस ढंग से प्रकट करने से प्राण का
बालक की ओर से ध्यान हट कर स्वयं पश्चात्ताप करने लगा और स्वयं ही
केवल इतना "विश्वास था" कि यह स्वयं सब समाप्त होने
इस बात से स्पष्ट है, पश्चात्ताप का स्वरूप ऐसा ही था कि वह अपनी
पराकाष्ठा को पार करके विवश हो गया था। पश्चात्ताप ही सब कुछ था,
पश्चात्ताप केवल उस बालक के मुख से नहीं बल्कि पश्चात्ताप तो सब ओर फैला
129

विचार करूँ उसका फल अच्छा हो, परिणाम भी अच्छा हो, उसका आदर तो करना ही
होगा और विचार करूँ उसका फल बुरा हो-कुत्सित फल मिले वैसा विचार त्यागने
न ही तो आत्मा का हित होगा, आत्मा, मन, बुद्धि, शरीरा, इन्द्रिय सब ही शुद्ध हो
जाते और परिणाम जिसका फल बुरा होगा उसका फल भी बुरा होगा आत्मा
उसका तो भोग करेगा आत्मा न भी, सो भला-बुरा विचार सोचो कैसा होगा
विचार किया मन से सम्यक्त्व पहले मन विचार ही मन का काम करता
होगा, विचार मन कर रहा था मन मन मन आत्मा देखता होगा मन का परिणाम
आत्मा जाने मन का विचार सम्यक्त्व रूप हो अथवा मिथ्या रूप मन का जो विचार
हो, परिणाम तो सम्यक्त्व पहले होगा मन का काम ही करेगा
ऐसा विचार मन विचार करता था, सो ऐसा कर्म-प्रतिपक्ष काम सब किया
सो कर्म आत्मा सब क्षयोपशम राग-द्वेष को नाश विचार का फल न हो तो फल
किसका हो गया? विचार किया सो आत्मा मिथ्या छूटा, अब सो आत्मा का फल
मिलना सो, सो आत्मा स्वयं मन विचार को देखता ही रहा मन का काम, आत्मा
को उस फल आत्मा का फल तो अब सम्यक्त्व ज्ञान रूप सम्यक्दर्शन,
सम्यग्ज्ञान न हो सो, सो अब आत्मा का सम्यक्त्व राग-द्वेष क्षयोपशमपूर्वक
सो गया, सम्यग्दर्शन सो हुआ
सम्यक्त्व विचार रूप से सम्यक्त्व विचार रूप हो जाता है, सो विचार जो
हो सो सो कर्म-प्रकृति उपशम को हो सो सो कर्म-प्रकृति उदय को बंद
रहा सो सो काम सो काम सो हुआ, सो विचार कर्म का विचार सो सो बंदा सो
कर्म उदय मिटा, सो सो फल आत्मा को बंदा सो, सो फल उदय से मिटा
सम्यक्त्व विचार का फल हुआ? फल-सिद्धि सो, सो आत्मा का फल क्या हुआ?
अब फल आत्मा रूप फल हुआ ऐसा सो आत्मा का विचार आत्मा ही को बंद
आत्मा रूप फल सम्यक्त्व ज्ञान रूप आत्मा न हो तो सम्यक्त्व
राग-द्वेष कर्म मिटा? आत्मा, आत्मा, सम्यक्त्व रूप आत्मा काम रूप न बंद
सब ही आत्मा रूप आत्मा राग-द्वेष को समन स्वरूप मिटा, फल
क्षयोपशम रूप से काम आत्मा स्वयं हो सो सो विचार उदय बंद
ऐसा ज्ञान रूप ज्ञान सो ज्ञान, आत्मा ज्ञान सो, ज्ञान कैसा? रूप
ज्ञान जैसा सो, आत्मा सो सो रूप ज्ञान को सो जान आत्मा रूप ज्ञान का
आत्मा ऐसा सो, आत्मा सो ज्ञान को ज्ञान सम्यक्त्व रूप सो सो ज्ञान रूप
सो, रूप ज्ञान ज्ञान ज्ञान सो ज्ञान को ज्ञान सो जान आत्मा ज्ञान
ज्ञान ही रहा रूप ज्ञान ज्ञान ज्ञान सो, रूप ज्ञान सम्यक्त्व ज्ञान ज्ञान
ज्ञान रूप ज्ञान ज्ञान ज्ञान ज्ञान सो सो ज्ञान सो, रूप सो सम्यक्त्व रूप ज्ञान
सो ज्ञान सो ज्ञान ज्ञान ज्ञान सो सो ज्ञान, सम्यक् ज्ञान ज्ञान ज्ञान रूप ज्ञान
रूप ज्ञान ज्ञान ज्ञान सो, रूप सो ज्ञान सो ज्ञान ज्ञान रूप रूप आत्मा सो,
सो ज्ञान सम्यक् रूप ज्ञान सो, रूप सो ज्ञान सम्यक् ज्ञान, रूप ज्ञान
सो रूप सो
सो ज्ञान ज्ञान सो, रूप सो सम्यक्त्व ज्ञान सम्यक्त्व सो ज्ञान सो ज्ञान
ज्ञान, रूप सो सो! रूप रूप ज्ञान को बंद सो सो बंद सो रूप ज्ञान
ज्ञान, सम्यक् सो सम्यक्त्व सो सो ज्ञान सम्यक् ज्ञान सो रूप बंद, ज्ञान
सम्यक्त्व ज्ञान सम्यक्त्व सो सम्यक् रूप सम्यक्त्व ज्ञान रूप ज्ञान
ज्ञान सो ज्ञान रूप सम्यक् सो ज्ञान सो ज्ञान सम्यक्त्व सम्यक्त्व
सम्यक्त्व ज्ञान ज्ञान सो सम्यक्त्व ज्ञान बंद सो रूप ज्ञान-ज्ञान बंद सो ज्ञान
बंद बंद सो ज्ञान ज्ञान, सो ज्ञान सो सो बंद सम्यक् ज्ञान, सम्यक्त्व ज्ञान
सो बंद ज्ञान सो ज्ञान ज्ञान सम्यक् ज्ञान सो सो ज्ञान सम्यक्त्व ज्ञान बंद सम्यक्
ज्ञान सो ज्ञान बंद ज्ञान ज्ञान ज्ञान बंद सो ज्ञान सो ज्ञान सो ज्ञान ज्ञान
सो ज्ञान सो ज्ञान रूप ज्ञान ज्ञान सो सम्यक्त्व राग-द्वेष सम्यक्त्व न
हुआ सम्यक्त्व सम्यक्त्व सो रूप बंद ज्ञान सो ज्ञान? रूप सम्यक्त्व सो,
सम्यक् रूप रूप ज्ञान सो ज्ञान सो ज्ञान, ज्ञान ज्ञान रूप सो सो ज्ञान सो
ज्ञान सम्यक्त्व ज्ञान सो बंद सो सो ज्ञान ज्ञान सो ज्ञान ज्ञान सम्यक् सो, ज्ञान
रूप ज्ञान सो ज्ञान सो ज्ञान ज्ञान सो बंद सो सम्यक्त्व सो ज्ञान बंद
सो रूप ज्ञान ज्ञान, ज्ञान ज्ञान सो बंद, सो रूप सो ज्ञान बंद
ज्ञान, सम्यक्त्व ज्ञान ज्ञान रूप ज्ञान ज्ञान सो सम्यक् सो, ज्ञान
सो ज्ञान ज्ञान ज्ञान ज्ञान ज्ञान सो ज्ञान ज्ञान सो, सो ज्ञान ज्ञान ज्ञान रूप
सो ज्ञान सो सम्यक् सो ज्ञान ज्ञान सो, सो सो ज्ञान सो ज्ञान सो ज्ञान रूप ज्ञान
130

चित्र में मुद्रित पाठ (Text) के फॉन्ट लोड न होने/एन्कोडिंग त्रुटि के कारण सभी अक्षर खाली चौकोर बॉक्स (Tofu/□) के रूप में दिखाई दे रहे हैं, जिससे यह पूरी तरह अपठनीय है। केवल विराम चिह्न (Punctuation marks) और पृष्ठ संख्या (131) दृश्यमान हैं।

प्रत्येक वस्तु अपने मूल को छोड़ती नहीं उसकी जड़ पेड़ को छोड़ देती है। यह सर्व धर्म का नियम है।
दार्शनिक विचारक रूप से सब अपने जीवन सत्य से विलग हो रहे हैं। मनुष्य कितना भी धन
कमाले, मकान या महल या तिजोरी का मुंह कितना बड़ा या छोटा हो लेकिन आत्मिक शान्ति-
के दो, दो बात अपने बच्चों से बोलना वह भूलता
जाता है। मनुष्य रूपी यह पेड़ जब जड़ों रूपी बच्चों से दूर हो रहा है। इसके लिए
सब एक ही बात स्वीकारते नजर आते हैं, मनुष्य अब अपने मूल को भूल
कर भौतिक रूप में ही जीवन की सार्थकता देख रहा है। वह परिवार रूप में
परिवार को भूल गया। मनुष्य के भीतर जो अमृत था वह विष रूप में परिवर्तित
हो गया, मनुष्य जब तक अपने को इस जहर से मुक्त नहीं करेगा तब तक
वह न तो शांत रह सकता और न ही परिवार को संस्कारित कर सकता
है। वह, परिवार का नाम लेते ही यह प्रश्न खड़ा कर देता है कि परिवार से ही
सब कुछ होता तो फिर लोग अपने परिवार को छोड़कर बाहर क्यों जाते?
तब तो सब अपने घर में रहकर ही सब कुछ पा लेते। लेकिन यह सच नहीं
है, जब तक-परिवार को सही दिशा नहीं मिलेगी तब तक मनुष्य का
मन शांत नहीं होगा।
यह बात सत्य अवश्य माननी पड़ेगी कि परिवार ही मनुष्य का पहला स्कूल है,
लेकिन मां, बाप, भाई, बहिन के रिश्तों को समझने का माध्यम भी तो होना ही
चाहिए। इसके लिए सब से पहले मां, बाप अपने को संस्कारित करें ताकि बच्चों
को भी यह सब नजर आ सके। मनुष्य जब तक खुद को इस बात के लिए तैयार-
नहीं करेगा तब तक इस समस्या का हल होना मुश्किल नजर आ रहा है।
इस पर सब चुप थे, इसलिए उन्होंने फिर अपनी बात को आगे बढ़ाते
हुए कहा कि मनुष्य को यह समझना ही पड़ेगा कि उसके पास जो कुछ बचा
है उसे वह संभाल कर रखे। भौतिक सुख मनुष्य को कभी भी संतुष्ट नहीं
कर सकते।
मनुष्य का स्वभाव भी विस्मृत सा रहता है। वह सुख-दुःख की बात तो
बहुत करता दिखाई देता है लेकिन वह मन-बुद्धि, चित्त को नहीं
समझ पाता। मन के पार जाने की, बात वह करता तो है, लेकिन मन के पार तो
सुख-दुख दोनों एक हो जाते हैं। मनुष्य सुख चाहता है लेकिन उसके लिए
शांत, एकाग्र और निर्विकल्प होना जरूरी है। इस बात की शिक्षा मनुष्य
को घर से ही मिल सकती है। मनुष्य यदि अपनी दृष्टि को स्थिर कर ले, तो वह
सत्य को देख सकता है। सत्य को जानने के लिए, मनुष्य के पास विवेक दृष्टि
होना जरूरी है।
मनुष्य के स्वभाव के पीछे--जो शक्ति छिपी हुई है वह अनासक्ति भाव से परि-
पूर्ण है, और इस भाव को जगाए बिना मनुष्य का जीवन सफल कैसे हो
सकता है? मनुष्य अपने-आप सवाल करता है कि क्या कारण है, कि मैं सब कुछ पा
कर भी संतुष्ट नहीं हो पाता? संतुष्टि कहां है? मनुष्य बहुत दुखी है!
उसका अंतःकरण मथ रहा है। उसे अपने को जानना होगा। उसके
लिए यह जरूरी है कि वह अपनी चेतना को जागृत करे, जो उसकी आत्मा
को शांति प्रदान करेगी।
जब तक वह अंतर्मुखी होकर परमात्मा के ज्ञान को नहीं समझेगा
तब तक उसे सत्य का ज्ञान नहीं हो सकता। मनुष्य को यदि अपने
को समझना है, तो अपनी वृत्तियों को वश में रखना होगा। अपने शरीर में
जो प्राण है उसकी गति को साधना होगा, तभी परमात्मा का ज्ञान
संभव है।
आज मनुष्य मन को न समझकर केवल बुद्धि की बात करता
है। बुद्धि तो सांसारिक सुख की ओर ही ले जाती है। बुद्धि से मन
कभी शांत नहीं हो सकता, वह केवल विषय वासनाओं की प्यास बढ़ाती
जाती है। बुद्धि मनुष्य को अहंकार की ओर ले जाती है। यदि मनुष्य
इस पर विजय प्राप्त कर ले तो अपने जीवन को सफल बना सकता है।
जीवन को परमात्मा रूप समझकर जब मनुष्य जीने लगेगा, तभी
वह अपने आप को समझ पाएगा। ऐसा जीवन मनुष्य को मुक्ति दिलाता
है। वह इस पथ पर चल कर परमात्मा को प्राप्त कर सकता है।
132

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उपलब्ध पृष्ठ पर प्रयुक्त फ़ॉन्ट (Font) के करप्ट/मिसिंग होने के कारण सम्पूर्ण देवनागरी पाठ केवल आयताकार बॉक्स (Tofu/Missing glyphs '▯') के रूप में प्रदर्शित हो रहा है, जिससे मूल पाठ पढ़ा नहीं जा सकता। केवल पृष्ठ संख्या ही पठनीय है:

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134

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135

एक राजा अपनी सेना को लेकर जब किसी वन तरफ निकला व प्यासा हुआ तो एक ग्वाले को
वहाँ उपस्थित देख कर उससे जल माँगा तो उस ग्वाले ने शीतल सुगन्धित जल लाकर राजा को दिया,
जिसको पाकर राजा का मन बहुत प्रसन्न हुआ, वह विस्मित हो विचारने लगा, यह ऐसा स्वादिष्ठ
व सुगन्धित जल, अथवा इसके निकट का वातावरण इतना उत्तम क्यों, यह विचार विचार कर
उसने ग्वाले को इस स्थान विषयक सब भेद पूछा जिसके उत्तरमें ग्वालेने कहा कि यहाँ एक
महात्मा रहते, व जिनका
यह सब उत्तम प्रभाव देखने में आ रहा, पर महात्मा किसीसे बोलते अथवा बात न करके
मौन रहते वा ईश्वर के ध्यानमें लीन रहते हैं, जिसको सुनकर राजाको आश्चर्य हुआ
क्योंकि केवल मौन? तब राजा उस महात्माके दर्शन को व उस जल को देख आश्चर्य
करने लगा पश्चात् राजाने महात्माको, यह प्रश्न किया?
एक बार किसी विषयक बातों का जो एक बार उत्तर दिया, सो उस उत्तर व उस महात्माके
तपस्वी स्वरूप देखकर राजा विस्मित हुआ कि बिना तप के यह सब फल नहीं मिल सकते
वा महात्मा केवल मौन नहीं है, किन्तु यह आत्म ज्ञानमें वा परमात्माके भी ध्यान विषय ज्ञान रखता
हुआ सब भेद ज्ञान रखता जान कर के, जो एक बार जल का कारण का उत्तर मिला इसलिए?
राजाको यह दृढ़ निश्चय हुआ कि इस महात्मा द्वारा, मेरे मनका अज्ञान दूर हो सकता है। जिससे
कि राजा को भेद वा, अज्ञानताके कारण भ्रम था, जो दूर हुआ, अब मन शांत हुआ व राजा
विचारने लगा कि, अरे मन! महात्माके केवल शारीरिक स्वरूपको देख धोखा खाया जिस
पर अज्ञानताके कारण अज्ञानतावश यह भ्रम उत्पन्न हुआ था, उस अज्ञानता को, इन पूर्ण
महात्मा ने शांत कर दिया आदि।
इस लिए शिष्यका यह पहला कर्त्तव्य हो, जो सब प्रकार का मन शांत कर, पहले दिए
हुए सब उपदेशको मन शान्त करके सुने, ना कि दूसरेके रूप रंगको देख कर, अथवा
मन में यह बात धारण करके, ज्ञान ग्रहण करनेवाला शिष्यके गुण का पूरा लाभ उठाए
तथा दूसरेके मन को भी अपने दुर्गुण अथवा चंचलता द्वारा ना ही कष्ट पहुँचाए? जिससे दोनों
तरफ हानि होनेका सम्भव जान कर पश्चात् जो कुछ शिक्षा का लाभ, अथवा सन्मार्ग का
बोध हो सके आदि।
चौथा नियम यह कि प्रत्येक को इस बातका सदैव ध्यान हो कि जब व किसी
सत्संग वा शुभ कार्य पर या किसी सत्-संग स्थानपर जाएँ तो अपने मन को
काम-क्रोध विकारों से तथा मन की चंचलताके या विषय वासनाओं से बचाए रखें, ना
कि सत्संगपर जा कर भी, वासनाओं विकारों को मन द्वारा अपने अन्दर बसाए
वा विचार करे, कि दूसरा किस कर्ममें है, क्या कर रहा, ना ही उस कर्मको अपने
अन्दर जगह देवे वा, अपने मन को, शांत रखे वा, जिस मन द्वारा सत्संग अथवा
सत्संगके उत्तम उपदेशको ग्रहण करके अपने आचरणको शुद्ध बनानेका सदैव
यत्न
हो सके ऐसा करे, "सत्संग मनुष्य के लिए सब से उत्तम साधन है"
इस लिए मन को सदैव
सत्संगके वचनों पर ध्यान दे कर शुद्ध रखने की यत्न करे। सत्संग
विचार को शुद्ध करे, अशुद्ध को सब त्याग देवे, क्योंकि सत्संग ही ऐसा है कि जिस से
सब प्रकार का लाभ मिले इसलिए केवल सत्संग का ही लाभ ग्रहण करना चाहिए
जिस लाभ से प्राणी सब ही सब प्रकारके क्लेशों से छूट कर शान्तिको प्राप्त कर के
ना कि, इन वासनाओं वा सांसारिक प्रपंचों द्वारा तन-मन, बुद्धि-चित्त, सब
कर्म, कर्मेन्द्रियों, सब को दूषित बनाकर अज्ञानता विस्तार कर ले।
इस लिए जब सत्संग रूपी साधन मिला हो, जिस कल्याणकारीसाधन,
सच्चा सन्मार्ग मिला हो, तब मन को एकाग्र कर सत्संग रूपी रस ग्रहण कर के
जो कुछ अशुद्धता वा विकार था, उस को दूरकर व अपने अज्ञानको दूर करने का
जो सब लाभ का पूरा लाभ उठाए? सो ही उस साधन व ज्ञान दाता दाता का भी यश होगा
तथापि यह खुद संसार को छोड़ जाएगा? सो सब गुण का साधन ही सच्चा सत्य
कार्य कहा गया
पाँचवाँ नियम यह उपदेशका तथा जो उपदेशको मन द्वारा धारण किए हुए पूर्ण
सत् गुरु स्वरूप, जिस आज्ञा का पूर्ण रूप पालन करे व उसी अनुसार अपने मन को सब
ओर से हटा कर, उस एक चरणमें वा, उपदेश में, ध्यान को पूरा लय करे... ।
अर्थात् सो, उस आज्ञा रूपी हर एक बचन द्वारा आज्ञा अनुसार अपना मन
लगा कर सब ओर ध्यान को ना भटकावे ना ही मन रोके, ना ही मन को इस बात तरफ
दौड़े कि यह क्यों हुआ वा वह क्यों हुआ सो, इस प्रकार अहंकारको दूर कर शुद्ध मन को
गुरुके हर बचन रूप चरण आज्ञा में, अर्पण कर के सब प्रकार अज्ञान रूपी, मोह
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