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अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1976 (उद्गम)

DevanagariHindipublished183 पृष्ठ

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कथा का प्रवाह किसी ओर बह रहा था। स्वामी जी जब कथा कह रहे थे तब सब लोग स्तब्ध थे,
केवल उनके मुख मण्डल तथा उनकी उस प्रतिभा को निहारते जा सकते थे। उसके पश्चात जब
व्यास गद्दी किसी दूसरे महात्मा को सौंपी गयी तो सब लोग उठ कर कथा मण्डप से दूर परस्पर
गप
लड़ाने लगे।
प्रद्युम्नसिंह जनसमूहके साथ आगे बढ़ा। आगे जाकर वह एक साधु महाराज के पास बैठा;
और उनके चरण दबाने लगा। कुछ देर के पश्चात साधु महाराज को कुछ चेतना आयी; फिर
वह आंखें खोल कर, इधर उधर देखकर कुछ चकित हुआ, आश्चर्य प्रकट करता हुआ साधु
क्या कहने लगा? प्रद्युम्नसिंह को देखकर साधु कहने लगा कि बेटा! तुम कौन हो। किसी को
खोजते हो क्या--प्रद्युम्नसिंह ने कहा स्वामी जी आप अन्तर्यामी हैं। सब कुछ जानते हैं
फिर मुझ जैसे पापी से पूछने की क्या आवश्यकता है। आप यह बतलायें कि हम जो कुछ
करते हैं, उसका परिणाम तो हमें न कभी न कभी भुगतना ही पड़ेगा। साधु कहने लगे
अवश्य ही कर्म-फल भोगना ही पड़ता है। कर्म सिद्धान्त का चक्र; फिर कौन सी ऐसी बात
समझना चाहते हो। प्रद्युम्न ने हाथ जोड़कर कहा कि यह तो बतलाओ कि
मनुष्य अपने कर्मों का फल कब तक और किस प्रकार से भोगता है।
साधु महाराज ने कहा--
"कर्मों का फल कर्म-फल के रूप में, जो रूप धारण करता है अवश्य होगा"
इतना सुनते ही प्रद्युम्न सिंह के मुख से पश्चाताप की एक लहर सी उठी।
कि इस संसार चक्र में इस कर्म के बन्धन से कौन छूट सकता है? उसने कहा
साधु जी महाराज ! यह बात किसी प्रकार से मिट नहीं सकती क्या? यदि ऐसा
नहीं; फिर उपाय क्या है? प्रद्युम्न ने अपने उस पाप को याद करके एक आह भरी
और कहने लगा, क्या उपाय? उस समय साधु ने कहा कि अरे भाई! तू तो सब कुछ
जान कर भी अनजान सा क्यों बनता है! जब तक ईश्वर की शरण में नहीं जाओगे
तब तक छुटकारा मिल पाना असम्भव है।
"कर्म-फल से त्राण भगवत्-कृपा से मिल गया तो, तुम बच जाओगे अन्यथा तो भुगतना
होगा"
प्रद्युम्न को फिर कुछ शान्ति मिली। जब वह स्वामी जी महाराज के पास से जाने
लगा तब, एक आवाज सुनायी दी, एक व्यक्ति कहता चला, जा रहा था कि
कन्हैया तुम्हारे कारण, सब लोग अपना काम छोड़ कर आ गये। हमारा काम बिगड़
गया; नुकसान बहुत हुआ। उस समय कन्हैया चुप था। वह केवल इतना ही
बोला कि! नुकसान सचमुच हुआ होगा पर हम सब का सहारा तो भगवान ही हैं
न? कन्हैया ने कहा सच कहना तो, सब बिगड़ जाता!
"कन्हैया ने सच ही कहा था।"
उस समय प्रद्युम्न सिंह सोच रहा था कि कन्हैया ठीक कहता है, हर बात सच ही
होनी चाहिए, सच को कोई कैसे छुपा सकता है। साधु महाराज सच कह रहे थे।
सच से बचा तो जा सकता है, पर झूठ से नहीं। प्रद्युम्न ने विचार किया कि
उसने जीवन में क्या सच कहा? किया या सुना? प्रद्युम्न सिंह सोच रहा था कि?
जो अत्याचार किया उसका परिणाम कितना भुगतना पड़ेगा? उसे अब समझ आ रहा
था कि पाप का परिणाम सच से अधिक भयंकर होता है, पाप कभी छिपता नहीं
केवल पाप से छुटकारा पा लेना ही श्रेयस्कर है, प्रद्युम्न को अपनी भूल
दिखाई पड़ने लगी थी। प्रद्युम्न का पश्चाताप और गहरा होने लगा।
प्रद्युम्न का शरीर, लरजने लगा। वह कांपने लगा; प्रद्युम्न सिंह एक
ओर जाकर बैठ गया। रात को जब सब सो गये तो प्रद्युम्न ने स्वयं को असहाय
सा अनुभव किया; प्रद्युम्न अपनी अकर्मण्यता पर रोने लगा, कि भगवान्
अब; प्रद्युम्न अपने पापों के लिए ईश्वर से प्रार्थना कर रहा था। उसके
पश्चाताप के आंसू निकल रहे थे। वह रात भर सो न सका। वह स्वयं को बहुत ही
नीच; पापी और कुकर्मी समझता हुआ रात भर तड़पता रहा; प्रद्युम्न ने सोचा कि
ईश्वर की शरण में जाने के लिए अब देर न करनी चाहिए, प्रातः काल प्रद्युम्न
सिंह ने सोचा कि प्रद्युम्न को अब कर्म--फल भोगना ही होगा, ईश्वर दयालु
और समर्थ हैं। प्रद्युम्न के मन में अब ईश्वर के प्रति श्रद्धा जागने लगी।
वह उठकर बैठ गया और भगवान के चरणों में ध्यान लगाने लगा।
इस प्रकार वह ईश्वर के नाम का जप करते हुए, प्रद्युम्न सिंह ने निश्चय किया कि
अब सब कुछ ईश्वर के ऊपर छोड़ देना चाहिए; ईश्वर बड़ा दयालु, कृपालु और सर्वव्यापी
है। प्रद्युम्न ने अपने मन को ईश्वर के प्रति एकाग्र किया।
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46

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47

होगा? सुनो, इस आत्मकथा लेखक लोग का इतिहास भी तो समझो। कभी-कभी तो

होगा? सुनो, इस आत्मकथा लेखक लोग का इतिहास भी तो समझो। कभी-कभी तो
ऐसा स्वर सुनाई पड़ेगा जिसके हर एक शब्द को सुन कर पाठक भय विह्वल हो उठेगा या
ऐसा स्वर सुनाई पड़ेगा कि वह, रोने लग जाय। सहानुभूति का भाव तो जागना ही चाहिये
हृदय से। सुनो
देखो, प्रत्येक आत्मकथा लेखक अपने सुख का वर्णन जितनी प्रसन्नता पूर्वक करता है
सम्भवतः दुःख का उल्लेख वह उतनी प्रसन्नता से न कर सके। यदि दुःख का उल्लेख वह
कर भी देवे, उस अवस्था को वह दुःख न समझेगा या समझेगा भी! तात्पर्य यह प्रत्येक
आत्मकथा में? लेखक ने तो अपने सुख को सब सुखों से बढ़कर माना ही, दुःख
को, प्रत्येक दुःख को एक प्रकार का सुख ही मान कर चला, लेखक तो यह सदैव चाहेगा
प्रत्येक दशा में कि वह, चाहे या न चाहे लोग उसकी प्रशंसा ही करें और उसका रोब
मान कर चलें सब लोग अथवा संसार; लेखक तो यह कभी चाहेगा ही न कि कोई
उसकी पोल खोले या कोई उसके छिद्रों की खोज करता फिरे या कोई उस पर छींटा
कसे; वह सब से तो यही चाहेगा! पाठकगण, आत्मकथा तो हर कोई लिख लेता होगा
पर सच तो यह लिखना प्रत्येक जन के वश की बात नहीं हो सकती। सच और झूठ, इन
दोनों पक्षों को, चाहे वह जन कितना बड़ा क्यों न हो लेखक, यह लिखना
आत्मकथा के हर लेखक प्रत्येक आत्मकथा रूपी ग्रन्थ में कभी नहीं सम्भव कर
सकेगा
आत्मकथा क्या सचमुच लिखा गया! क्या आत्मविश्वास प्रत्येक जन लिख
सका है या सच मान कर अपने को त्याग कर सकेगा या त्याग सकेगा भी तो वह जन
जो सब कुछ त्याग चुका अथवा जिसने अ--कथ्य व्यथा को जन--जन-तक भेजा हो,
जिसने अपना सब कुछ दे कर सोचा भी कुछ हो, तो पाठक गण! आत्मकथा लिखना
हर जन का काम अथवा विचार वश का काम नहीं हो सकता और सम्भव भी नहीं, सुनो,
सुनो, कभी--तो हर एक जन आत्मकथा को, स्वयं आत्मकथा मान प्रत्येक प्रत्येक
जन के भावों को तो क्या हर जन प्रत्येक सम्भावना के आधार पर भी नहीं लिख
पा रहा होगा या तो केवल उस बात जिसके आधार पर, वह स्वयं चलता ही अथवा
उसने सब पर उस बात अथवा उस भाव को लादना चाहा होगा। और यह भी तो
सच, कि जब--तो जन आत्मकथा के नाम पर भी अपने आप को नहीं समझ पाता होगा,
वह तो स्वयं एक जन के आगे आत्म--कथा कहने का भी साहस नहीं कर पाता होगा
या समझा सकेगा! इस का भी रहस्य छिपा रहा न हो। जब भी जन अपने को
आदरणीय समझ बैठा अथवा किसी को बना बैठा हो तो समझ लीजिये सब, प्रत्येक
बात सत्य मान कर चला जा रहा होगा न?
आत्मकथा पढ़ना सहज जन सम्भव
पर उस जन द्वारा लिखा हुआ प्रत्येक जन के लिये आदरणीय होना कठिन
जान पड़ा
प्रत्येक जन अपने रूप आकार को समझ कर प्रत्येक ही जन से आदरणीय हो
अथवा ऐसा भाव प्रत्येक जन के मन उपजा करे या ऐसा समझ प्रत्येक ही जन करे।
प्रत्येक ही समय सब अपने सुख साधन रूप में देखना चाहे आत्मकथा को तो
आत्मकथा न कह कर जन को आत्मकहानी कहना उचित होगा।
स्वयं का आत्मकथा या प्रत्येक का जन कहा जा सकता है। आत्मकथा का रूप तो
सुनो, इस आत्मकथा को भी समझ कर ही प्रत्येक को समझना चाहिये कि यह रूप
ऐसा सब विचार प्रत्येक आधार को ले कर बन सका हो अथवा न बन सका
पाठक समझता समझे चाहे जन उस बात को समझे आत्मकथा-सम्बन्धी
रूपान्तर हो तो सब जन न केवल--तो आत्मकथा रूप को समझेगा ही, पर
आत्मकथा ग्रन्थ को भी जन समझेगा; आत्मकथा प्रत्येक जन समझे न
समझे; प्रत्येक आत्मकथा ग्रन्थ एक कथा--कहानी न हो सकेगा"
"कथा-कथन के नाम जन-जन के मन का भ्रम दूर करना प्रथम तो प्रत्येक
ग्रन्थ लेखक का कर्तव्य या आधार होना चाहिये ग्रन्थ द्वारा"
"प्रत्येक, हर दशा में इस रहस्य जन को; हर प्रत्येक बात को समझ ले,
ऐसा सोचे"
यह सोच कर कह कर
जन रूप का मन सब प्रकार शांत समझ कर बोला पाठक।
जन बोला सुनो, जो बात कहना है, आत्मकथा रूप सुनो; प्रत्येक को सुख तो
मिल ही रहा सब कुछ पढ़ने पर क्या केवल सच ही जान, प्रत्येक को तो केवल
असत्य ही मिलेगा
48

जब जीवन का रस उडे, प्रार्थना का संस्पर्श पाकर
तब समझो कि, प्रभु कृपा तुम्हारे ऊपर
केवल प्रार्थना सुनकर हम रस मग्न अथवा विह्वल नहीं होते, प्रार्थना गाकर मस्त होना, यह भक्ति
नहीं, केवल भक्ति का यह आभास भर स्वर ताल युक्त संगीत-रचना श्रवण का उल्लास
मात्र, गायन कला मात्र का रसपान मात्र कहा जावे तो बहुत ठीक रहेगा, भक्ति तो
वह लय; केवल भक्ति स्वरूप रस, शब्द का स्पर्श, संगीत रचना लय रूप रस का पान कराती
रहकर उस अनंत सत्ता का स्मरण कराती है, वह स्मरण क्षणिक अथवा दीर्घकालीन
रहकर विलीन हो जाने वाला नहीं रस, न विकार रह, न भय युक्त विचारशीलता हो, राग-
द्वेष, काम-क्रोध का रस सब वासना तिरोहित हो कर केवल एक अपनी मूल सत्ता तथा
अस्तित्व का न हो कर विराट् चेतना केवल... ॥
वह रस विह्वल रूप ही भक्ति का सच्चा प्रभाव कहा जावे
केवल प्रार्थना का पाठ मात्र, केवल मंदिर निर्माण ही बहुत उत्तम स्थल कहा गया मगर
उस रूप तथा क्रिया का-अभ्यास मात्र करके ही सब-कुछ समझ बैठना तथा सोचना मात्र है
इस भाव युक्त प्रार्थना का प्रभाव आंतरिक रूप से जीवन सुधार तथा रूप तथा सत्य
जीवन तथा प्रत्येक समाज के सभी प्रकार हित, उन्नति संबधी बात; इस आंतरिक प्रभाव
प्रभाव से जीवन सुधरता है, केवल विचार सम्बंधी सुधार प्रत्येक समय सब के रस का आधार
बनकर जीवन को हर दम रूप देता है; विचार प्रभाव से मानव जीवन सब प्रकार सुखी
तथा समृद्ध, जीवन सुखद आधार बन कर सुख का न रूप बनता; प्रत्येक समय रस आंतरिक
रूप विचारधारा से प्रवाह बन कर बहे, जीवन सत्य का रस पाकर
अपने जीवन का प्रभाव भी हर आंतरिक प्रभाव को सब का सब सुख प्रदान कर सकता
तथा स्वयं सम्पूर्ण रूप से उस रस से विह्वल हो कर उस सत्ता का दर्शन करता रहता
जीवन का स्वभाव बन ही जाता केवल स्वरूप समझ कर.प्राकृतिक अनुकूलता के
इन सभी विचारशीलताओं द्वारा प्रार्थना चिंतन द्वारा विचार शक्ति प्रत्येक सम्बन्धी स्वभाव
प्राकृतिक सब प्रभाव का रस पा सके, यही विचार व प्रेरणा मानव को सर्वव्यापक
उस परमात्मा के सत्य मार्ग अथवा रूपी दिशा में? प्राकृतिक सुख अथवा न केवल उस
प्रभु परमात्मा के सत्य मार्ग अथवा दिशा अथवा
केवल एक-विचार से सब का रूप ही बना है, इस दिशा धारा का प्रभाव सब
प्राकृतिक ही तो है तथा प्रत्येक अवस्था के हर रस का हर दम भाव बना रहता है
सब संसार की हलचल केवल मन के ही प्रभाव का सहारा पा कर चलती है, प्रत्येक
मन विचारशील कार्यशील बना हुआ इस मन को सब प्रकार से शक्ति प्रदान कर
इस का संचालन ही करता हुआ चला है, प्रत्येक रूप विचारशीलता कार्यशीलता प्रभावशील
ही रूप प्रदान करता
केवल भाव अनुसार ही मानव का हर दम हर आंतरिक कार्यशीलता का रूप बनता ही
रहा, प्रभाव कार्यशीलता तथा विचारशीलता केवल एक प्रभाव मात्र का साधन बन कर
सब को इस बात की प्रेरणा देता
"भगवान्, जो कुछ भी मन अथवा चित्त कह रहा है; वह केवल अपने ही मन की
प्रेरणा स्वरूप"
"सत्य स्वरूप, प्रत्येक रूपी भावना का आचरण केवल प्रत्येक समय केवल
अपने भाव का प्रभाव मात्र कहलाया"
इसके स्वरूप का प्रभाव सम्बंध
सब प्रकार से जीवन तथा व संसार समस्त भाव तथा कार्यशीलता
विचारशीलता का प्रभाव ही तो है, जो सब परमात्मा सत्य निराकार स्वरूप का
साधन बन सकता ही नहीं, केवल उस प्रभाव का स्वरूप ही विचार का साधन बन कर
प्रत्येक प्रकार की वासना रूप मन का, सब का स्वरूप बना रहा अवश्य है, मगर प्रभु
सत्ता का न कभी भी सत्य दिशा-निर्देशन विचार रहा! जो कि मानव को हर दम सुख
सम्बंध प्रदान करता रहे; वह केवल न जाने क्यों मन-प्रवाह से सब कुछ सोचता रहा!
केवल भाव अनुसार रस स्वरूप बन सका; प्रभाव का अवलोकन सब प्रकार किया
भी, मानव उस प्रभाव तथा समस्त दिशा से हर दम रस का लाभ उठाता रहा, यह सब
विचार ही; हर मानव केवल रस धारा के काम-क्रोध तथा लोभ युक्त होकर,
कार्यशील, हर दम ही रहा!
"प्रभु प्रत्येक प्रभाव रूपी दिशा का विस्तार केवल प्रत्येक समय केवल मानव
मात्र, दिशा धारा कहलाया"
"हर भाव सत्य, हर दम सत्य दिशा कहा? सदा आधार ही सत्य सब तन-मन
का?"
49

जब यह बात संसार जान गया कि राम जैसा धर्मात्मा भी विपत्ति को न्योता दिए बिना रहता,
विपत्ति पड़ी, विपत्ति भोगने विवश हुए; तब सामान्य मानव का क्या कहना जिनके पग-पग प्रमाद
भरा जीवन ही अपराध बनता रहता गया जिसके कारण पग-पग वे प्राकृतिक दंड के रूप तीन प्रकार
अर्थात् आधिभौतिक और आधिदैविक व आध्यात्मिक नाम से जाने जाते कष्टों को भोगते चले आ रहे
भी भोगते चले जाते न हों; उनका कोई ऐसा उपाय तो हो न हो, पर संतोष न कर
"जो कुछ होगा, सो सब देखा जायगा न? पहले से सोचकर क्यों अपने सुख को छी-छीन
करें?"
देखा तो सब कुछ जायगा ही फिर ऐसा क्यों? पहले से सचेत हो छी-छन को, दुःख-
दारिद्रय को रोका न जाय? असम्भव बात तो थी नहीं किन्तु मानव समाज ने इस दिशा
पग ही न उठाये किन्तु-परन्तु का खेल खेलते रहकर समय बिताता रहा कि एक अध्यात्मवादी,
धर्म रक्षक, जो अध्यात्मवाद को ही सत्य, केवल सत्य मानता था समझा, जो
अध्यात्म का उद्गाता
जिसने देखा कि राम तक विपत्ति भोगने विवश हुए तब उनका अध्यात्म
कैसा जो इस प्रकार के राम को दुःख दिया न टले?
"कैसा अध्यात्म जो अपने परम भक्त को विपत्ति से बचा न सके? सो केवल मन बहलाव
बनकर रह गया जीवन का साधन नहीं"
जिसने केवल विचार तक नहीं दिया कि इस विपत्ति को मिटाने वैज्ञानिक
विज्ञान का सहारा ले दुःख दारिद्रय मिटा सुख साधन को क्यों जुटाएं?
जिसने वैज्ञानिक की खोज द्वारा सुख का साधन जुटा भी दिया पर वह केवल शारीरिक
सुख बनकर रह गया पर भीतर मन तो तब तक केवल अशान्त ही भटकता रहा; सुख साधन
भी मानव को सुख नहीं देकर केवल अशान्ति देकर सुख छीन ही तो रहे थे। तब विज्ञान के
आधार पर केवल सुख भोग ही तो हो सकता था पर भीतर का सन्तोष नहीं; तो विज्ञान
द्वारा सुख साधन पा कर सब सुखी हो सकते यह असम्भव ही बना रहा। साथ ही यह विज्ञान
ऐसा बन बैठा कि केवल धन से धन द्वारा खरीदा जा सकता था। जिसके पास धन न था
उसके लिए! तो वैज्ञानिक खोज का मानव को क्या सुख मिला जो साधन सब खरीद
सकने असमर्थ ही बना रहा
अध्यात्म से शांति न मिली; केवल जप, पूजन मात्र से शांति हो भी सकती थी,
केवल मन का वहम मात्र
फिर विज्ञान का सहारा खोजा गया क्या वह सुख दे सका?
जो भी था वह बाहर तक सिमट कर रह गया। भीतर की अशान्ति को मिटाने
विज्ञान के पास कोई उपाय न था। मानव सुखी अध्यात्म से रह नहीं सकता था; फिर
धीरे-धीरे विज्ञान का सहारा बढ़ तो चला, लेकिन अध्यात्म को छोड़ना पड़ा नहीं; सो
अध्यात्म का आडम्बर, पाखण्ड तो बढ़ता ही चला गया किन्तु उस आडम्बर
को भी सुख न--देना ही सम्भव बना
मानव को विज्ञान धीरे-धीरे पग, अध्यात्म धीरे-धीरे ढहता गया, पर
परिणाम दोनों का सन्तोष जनक न निकल कर और अशान्तिकारक सिद्ध हुआ; जिसे
केवल तन तक सुख मिला; केवल भोगों ने घेरा; पर मन फिर भी अतृप्त ही रहा। इस
प्रकार अशान्त मानव ने विज्ञान को सुख साधन माना जरूर, पर सन्तोष नहीं पाया!
तब विज्ञान की खोज बेकार सिद्ध होने लगी, जिसे अध्यात्म ही! तो
भी नहीं भुला सका क्योंकि वह भी केवल बाहर तक सोच कर ही रह गया था।
"सो दोनों ही बेकार सिद्ध हो गए ऐसा ही कहा जाय"
तब एक बात यह विचार विचार कर भीतर सोच समझ कर उठी; केवल भोगी
जीवन ही सब कुछ नहीं कहलाता बल्कि एक संयम भरा जीवन, जिसमें हर क्रिया
अध्यात्म को समेट कर ही हो सकी थी, न कि केवल बाहर भटक कर सब कुछ पाया
जायगा?
"आध-आध या कहें दस-दस पर शत का जो मेल बना उसी ने समाज
रचना आरम्भ कर समाज को सही दिशा प्रदान की होगी"
क्या यह अध्यात्म इस समय चल सकता था जब सब कुछ लूट रहा था, सब
मिटा जा रहा था? तब ऐसा विश्वास केवल विचार से नहीं हो सकता था जिसके
लिए किसी समाज रचना की खोज के बिना जीवन अधूरा रहता था और उस
वैज्ञानिक आधार आध्यात्मिक धीरे-धीरे रूप से समझना ही उस समय सम्भव समझा?
जिसे हर युग का सच कहा जाय।
केवल विज्ञान उस तक नहीं पहुंच सका था; तब केवल अध्यात्म
बिना विज्ञान सत्य के नहीं पा सकता; तब सब अध्यात्म खोज वैज्ञानिक
50

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52

ब्राह्मणों का काम ज्ञान, संन्यास देकर दूसरों का काम कर न ले अथवा संन्यासी
करेगा, न अन्य सम्प्रदाय चलेगा
ऐसा न्याय जहां वर्तमान
सरकार अपनी प्रजा का हर एक जन का हित करे
सो सब न्याय से धर्म सम्मत
न कोई राजा हो, न कोई प्रजा हो, सबही प्रजापालक बने
ऐसा भाव जहां जन का--मनुष्य समाज का हर एक का धर्म
सब एक रस हो, तब सुख शांत लय
सरकार अपनी प्रजा का हर एक जन का करे! सो सब न्याय से धर्म सम्मत सोई कर्म-योग
इसका नाम कहा, संन्यास का हर एक समाज का धर्म है, तब सुख शांत
व्यवस्था जहां समान वर्तमान वहां सब तरह का आराम मिलेगा
संन्यास साधन से जब जन को ज्ञान लाभ प्राप्त होगा, तब ज्ञान को जो ज्ञान
संन्यास कहा जाता सो ज्ञान, वह काम कर लेवे; ज्ञान सब सम्प्रदाय लय
सब ज्ञान समान एक स्थान में रहे, ज्ञान-योग का लाभ जो संन्यास--यथार्थ
संन्यास ज्ञान कहा गया सोई! सो सब सम्प्रदाय लय करके सब संसार को ज्ञान से भर
दे, संन्यास का रस, संन्यास का सुख सो सब जन को दे--तब समाज व्यवस्था ज्ञान से भर कर्म-
योग में ज्ञान लय--यथार्थ सब ज्ञान-योग साधन से जन-जन को ज्ञान दे; संन्यास
ज्ञान का अधिकार जो संसार में त्याग--का काम अथवा संसार का काम ज्ञान से होगा जहां
संन्यास को ज्ञान का हर स्थान मिलेगा वहां सब लोग ज्ञान योग को ज्ञान करके
सब ज्ञान को ज्ञान का जन जन को ज्ञान देगा सोई न लेवे; ज्ञान सब सम्प्रदाय
सब सम्प्रदाय जन को ज्ञान से भर देवे, व्यवस्था सब को सम्प्रदाय व्यवस्था से
संन्यास को जो सम्प्रदाय समाज का जो सम्प्रदाय जन सब ज्ञान लय करके जहां
जो ज्ञान व्यवस्था का रस सब व्यवस्था लय कर ज्ञान देगा, ज्ञान सम्प्रदाय सब
ज्ञान को न लय करेगा
ऐसा ज्ञान सब काल सब जन--समाज समाज का हर जन को मिले! सो सब जन
ज्ञान लाभ कर रस पावे, समाज का हर एक प्रकार से ज्ञान ले, तब सब जन
सब प्रकार से सुख शांत होकर ज्ञान लाभ करे संन्यास व्यवस्था
सब समाज को सुख शांत का व्यवस्था हो जो सम्प्रदाय जन-जन को ज्ञान
समाज व्यवस्था को सब प्रकार से ज्ञान से भर देवे, तब सब जन
सब एक रस होकर सब ज्ञान लाभ प्राप्त करेंगे सो काम ले ज्ञान कर
ऐसा न्याय जहां वर्तमान सरकार
सो सरकार, सब जन को जो सम्प्रदाय होगा, सब जन ज्ञान लय करके जो
ज्ञान सब को प्रदान करे, संन्यास ज्ञान सदा वर्तमान रहे, सो ज्ञान काम करेगा
अथवा सब जन का रस एक हो, तब सब समाज सब प्रकार से समाज का जन
जो सम्प्रदाय जन सब का हर एक काम करेगा संन्यास समाज का जो काम सब का रस
सम्प्रदाय जन सब का जो ज्ञान सम्प्रदाय सब को मिले
अथवा सब ज्ञान का ज्ञान लाभ जो जन को हर तरह ज्ञान होगा अथवा ज्ञान
जन-जन को जो ज्ञान लाभ न जन को प्राप्त होगा सो जो सब सम्प्रदाय का प्रचार
सो ज्ञान का काम करेगा सो रस
सब सम्प्रदाय सम्प्रदाय
जो जो सब रस सब प्रकार सम्प्रदाय होगा तब सब का, रस एक हो कर, काम
का रस पावे, काम सदा न बंद हो; सो रस संन्यास
सब सम्प्रदाय सम्प्रदाय
तब सब रस सब प्रकार का सब सम्प्रदाय का जो ज्ञान सो सम्प्रदाय का ज्ञान हो!
जब तक सब ज्ञान जन का सब ज्ञान सम्प्रदाय ज्ञान जन ज्ञान सम्प्रदाय का जन रस लय कर
ज्ञान रस का जन ज्ञान सब प्रकार का ज्ञान सब रस का जन ज्ञान सब ज्ञान लय
करेगा सो रस का संन्यास ज्ञान सब सम्प्रदाय का रस संन्यास को लय करेगा,
संन्यास का संन्यास का संन्यास का सम्प्रदाय सब जन ज्ञान संन्यास का रस होगा, ज्ञान
संन्यास को न संन्यास का संन्यास का ज्ञान रस ज्ञान लय संन्यास रस को रस ज्ञान
देवे; ज्ञान सब संसार को ज्ञान का ज्ञान रस ज्ञान सम्प्रदाय संन्यास का रस लय ज्ञान
देवे; ज्ञान जन सब रस सब ज्ञान संन्यास संन्यास ज्ञान को ज्ञान देवे; ज्ञान रस सब
सम्प्रदाय लय
ऐसा समाज सब प्रकार जन--ज्ञान सब प्रकार का हर तरह से हर प्रकार का
समाज सब ज्ञान लाभ पा ले; ज्ञान सब समाज को जो प्रकार सब ज्ञान लाभ करेगा
53

इस बात सिद्ध करने विषय में एक कथा

कथा इस बात सिद्धि करती कि मनुष्य को परमात्मा की आज्ञा माननी योग्य है; क्योंकि परमात्मा दयालु
पिता रूप है और पिता अपने पुत्रों, जिन को उसने उत्पन्न किया उन को अनेक प्रकार विद्या और उत्तम
शिक्षा दे कर अवश्य ही योग्य बनाता ही है॥
"जो कुछ दया और धर्मयुक्त काम हैं सो सब धर्म और जिसके विपरीत हैं सो अधर्म गिना जाता"
इस बात सिद्ध करने विषय में एक कथा
एक समय में राजा भोज बैठे हुए थे, कि इतने पश्चात् सभासद् ने निवेदन
करा महाराज इस सभा में जो-जो पुरुष धर्मात्मा हैं उनका नाम लिखा जाय सो प्रथम आप
धर्मात्माओं का नाम लिख के फिर उन सब राजा और प्रजा का नाम लिखिये जिस में धर्म की निन्दा
कदापि न होवे क्योंकि आप सर्वथा धर्मात्मा मनुष्य हैं; सो सुन करके राजा ने कहा भाई हम
धर्मात्मा नहीं किन्तु पाप रूप हैं क्योंकि हमने बहुत जीवों को दुःख पहुंचाया होगा? तब सभासद्
हाथ जोड़ के बोले महाराज आप तो सब न्याय युक्त काम करते हो? राजा ने कहा भाई विचारो तो,
हम सब पाप रूप हैं; सो सुनो इस पर कथा मैं कहता हूं॥
सुनो एक समय में एक पुरुष का बड़ा रूपवान् अति गुणवान् पुत्र था, उसने तन मन से
विद्या पढ़ कर सब प्रकार ज्ञान को प्राप्त कर के अभ्यास से विद्या का प्रकाश सब देश में कर
के बड़ा यश प्राप्त किया। तत्पश्चात् उसने अपने पिता से विनय की कि-अब आप आज्ञा देवे
जिससे मैं, देश देशान्तर में जा कर वेद धर्म का सब देश में प्रकाश करूं जिस से सब
मनुष्य सुख पावें तब उस के पिता धर्मात्मा पुरुष ने उस को आज्ञा नहीं दी। तब--पुत्र
ने हाथ जोड़, नम्रता से विनय--की महाराज सत्य वेद धर्म का प्रकाश तो सब देश में होना
अवश्य चाहिये जिससे सब मनुष्य अपने-अपने धर्म को पहिचानें ॥
तब पिता ने अपने पुत्र धर्मात्मा से कहा कि सुनो॥
जो कोई किसी प्रकार का उपकार करे और उस के बदले में जो उस का बुरा करे सो
सब जगत् पापी क्यों न कहे सो इस बात को विचार और धर्म का प्रकाश कभी मत कर,
जो तू मेरा कहना नहीं मानेगा॥
तब पुत्र ने हाथ जोड़ कर कहा कि, हे पिता ऐसा अपराध मैं कदापि नहीं कर
सक्ता जिस से आप अप्रसन्न होवें॥
तत्पश्चात् पिता ने कहा कि तू इस बात को अच्छी रीति से देख ले और विचार कर
कि परोपकार न करना ही, अच्छा है इस बात को॥
धर्मात्मा ने कहा कि इस बात को प्रत्यक्ष रीति से कहो जिस से मैं समझू॥
तब पिता ने कहा कि तू जो सब धर्मों का ज्ञाता और धर्मात्मा है सो इस बात को
भली प्रकार से समझ ले जिस से तुझ को ज्ञान हो जाय कि इस जगत् में सब कोई कृतघ्नी
सब जगत् में ऐसा कोई न होगा जिस के साथ भलाई की जाय और वह उस के बदले में बुरा न
करे सो इस बात को परीक्षा करके देख लेवेगा तब तेरे मन का भ्रम छूटेगा और तू अवश्य
इस बात विचार को छोड़ेगा कि किसी परोपकार भी हो, क्योंकि इस जगत्--के सब
मनुष्यों का मन पापयुक्त सदा रहता है॥
तब पुत्र ने कहा कि महाराज सत्य धर्मानुष्ठान को तो कभी भी नहीं छोड़ना चाहिये
यह वचन सुन पिता ने, उस अपने पुत्र से कहा॥
विचार तो ऐसा जान कि तू जो काम करेगा उस का विपरीत फल होगा; क्योंकि
संसार विषे सब लोग दुष्ट स्वभाव वाले ही पापी कृतघ्नी ही होते हैं अर्थात् धर्म को न मानेंगे,
परोपकार को बुरा मानेंगे विद्याभ्यास को दुष्टकर्म ही जानेंगे सो तू क्यों व्यर्थ पुरुषार्थ
करता है जिस बात में कोई भी फल सिद्ध नहीं होता; सो विचार करके बैठ जा विद्या
का, विस्तार मत कर जिस से, सब जगत् तेरे पर भी कुपित हो, सो निष्फल बात
है॥
तब उस धर्मात्मा पुत्र ने हाथ जोड़ कर प्रार्थना की कि ऐसा कदापि न होना
चाहिये, जिस से सत्य को छोड़ के असत्य बात को कोई माने वा सत्य धर्म काम न करे
सो धर्म काम तो मैं सदा ही करूँगा जिस से परमात्मा भी मुझ पर प्रसन्न हो और इस जगत् का
भी भला होवे; क्योंकि सब काम का दाता ईश्वर है, जिस बात को सब विचार कर के सत्य
जानें; पिता जी ने यह सुन कर के, निश्चय जान लिया कि यह नहीं मानेगा, तब पिता
ने उस को आज्ञा दी कि जा इस रीति से परीक्षा कर और जगत् का हाल प्रत्यक्ष देख
सब मनुष्यों का स्वभाव तू आप ही जानेगा तब धर्मानुष्ठान का विचार अपने मन से दूर
कर देगा क्योंकि जगत् का स्वभाव ही ऐसा है॥
पिता आज्ञा से उसने वन में जाकर देखा॥
एक बड़ा कूप सूखा हुआ था उस में देखा॥
बहुत प्रकार के जीव उस में पड़े थे॥
एक मनुष्य एक सिंह एक सर्प एक गिरगिट॥
54

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55

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56

द्वारा लिखित पत्र

पूज्य महाराज श्रीजी के
पावन सानिध्य
द्वारा लिखित पत्र

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य प्राप्त करने वाले साधकों के लिए इनका लिखा एक पत्रक
यहाँ पर उद्धृत कर रहे हैं। जिसका उद्देश्य मात्र यह है कि जीवन रूपी बगिया को महकाने के
लिए क्या करना है?

विषय रस विष त्यागो, हरि रस पीयो रे। नाम रूपी नौकापर जो मनुष्य चढ़े वे पार
हो ही जाते हैं। नाम नामी एक है। नाम रूपी नौका में बैठकर भी अविश्वास करे नामी, भगवान पर
शंका करे विश्वासहीन नाम का आलम्बन ले प्रभुपर जो शंका व भयभीत हो वह पार कैसे हो सकता
ऐसा शंका निवारण के लिए ही कहा है, भगवान केवल विश्वास स्वरूप ही रूप धारण कर
ही पार कर सकते हैं, ऐसा दृढ़ निश्चय ही साधक को पार ले जाता है।
हे साधक तुम आगे बढ़--भगवान का आश्रय लेकर सत्य मार्ग रूपी नौकापर जो भी
चढ़ा व तरे; प्रभु नाम नौका पर जो चढ़ा पार-पार हो गया सो तर गये; प्रभु शरण व नाम,
नाम व रूप।
विश्वास फल का वक्रीव का फल अवश्य होगा, जो संशय करेगा सो तो डूबा
निश्चय ही पार उतरे बिना नहीं; ज्ञान विज्ञान तो मात्र एक; सो ज्ञान उपदेशप्रद
मात्र पथ मात्र ही प्रभु नाम रूपी नौका रूप पद प्रभु का ध्यान ही नौका व प्रभु का
ध्यान नाम नौका, नाम नामी दोनों एक। केवल ज्ञान से पार नहीं व ज्ञान विज्ञान
ही है, ज्ञान से कर्म से कर्तव्य तो पार होना ही कठिन ही पार बिना कर्म, ज्ञान
का अधिकार ही क्या व कहाँ।
विश्वास ही पार रूप साधन ही शरण मात्र रूप ही कर्तव्य का फल;
बिना ज्ञान के आचरण व्यर्थ है। अज्ञानता से ज्ञान ही श्रेष्ठ है। ज्ञान से भी अधिक
कर्म जो निष्काम रूप से या श्रेष्ठ कर्म फल त्याग से ध्यान रूप ज्ञान श्रेष्ठ से
श्रेष्ठ ही ध्यान से श्रेष्ठ कर्म फल त्याग जिससे परम शांति प्राप्त हो। शांति
शांति से कर्तव्य का त्याग नहीं कर्म फल का त्याग, सो संन्यास व सो ही
प्रभु शरण सो ही स्वरूप प्राप्ति? प्रभु शरण से कोई वंचित नहीं व न ही
भक्ति से वंचित रहा? केवल कर्म से पार न साधन रूप से केवल व न
ही मात्र कर्तव्य त्याग ही से केवल कर्म-संन्यासियों को शांति प्राप्त हो,
संन्यास स्वरूप त्याग कर्मफल के त्याग रूप संन्यास रूप प्रभु शरण ही
प्राप्ति रूप ही स्वरूप का ज्ञान ही कर्तव्य मात्र श्रेष्ठ सत्य है।
एक बात व कर्तव्य ज्ञानपूर्वक ध्यान युक्त निष्काम ही कर्म संन्यास का
स्वरूप ही कर्तव्य मात्र ही अधिकार मात्र कर्तव्य से ही फल मात्र प्राप्त हो
कर्तव्य रूप कर्तव्य कर्म त्याग रूप ही कर्तव्य त्याग से ज्ञान त्याग से श्रेष्ठ
है, तो सो सो ही, तो फिर ज्ञान त्याग से संन्यास ही श्रेष्ठ है; तो श्रेष्ठ सो श्रेष्ठ
कर्म; त्याग श्रेष्ठ तो फिर श्रेष्ठ व प्रभु--का रूप ध्यान ध्यानपूर्वक श्रेष्ठ साधन ही
श्रेष्ठ; ध्यानपूर्वक ध्यान ही श्रेष्ठ, श्रेष्ठ, तो फिर श्रेष्ठ; श्रेष्ठ प्रभु व सो श्रेष्ठ ही
हो जाता श्रेष्ठ ही श्रेष्ठ रूप प्रभु का ध्यान।
केवल त्याग से, सो त्याग से त्याग का फल प्राप्त रूप ही केवल, पल-पल
स्वरूप प्रभु संशय से परे ही नाम उच्चारण के फल से पार हो गये, संशय
का त्याग विश्वास से; नाम रूप नाम उच्चारण फल केवल कल्याणकारी नाम फल
केवल से, फलदायक फल से फल त्याग संन्यास रूप ही फल कर्म संन्यास कर्म
त्याग फल से प्रभु शरण प्राप्त रूप ही फल प्राप्त रूप श्रेष्ठ श्रेष्ठ से श्रेष्ठ
ही! नाम ही केवल सार, सो ही सार है; सो उच्चारण केवल प्रभु शरण नाम
सार ही, तो नाम जप से श्रेष्ठ नाम जप ही से प्रभु रूप ज्ञान मात्र फल हो
ही; पल-पल नाम जपते हृदय स्थित प्रभु का पल-पल रूप प्रभु नाम व रूप
भगवान स्वरूप ध्यान ही हृदय स्थित स्वरूप का नाम जप से प्रभु व प्रभु
रूप नाम उच्चारण से भगवान स्वरूप भगवान रूप भगवान ही हो जाते
मात्र प्रभु रूप हो जाते हैं।
इस प्रकार स्पष्ट शब्दों में पल-पल भगवान नाम का ध्यान ही हर मनुष्य को हर
प्रकार के संशय से परे हटाकर उनके लिए केवल शांति स्वरूप होगा।

57

चित्र में देवनागरी लिपि के सभी अक्षर फ़ॉन्ट/ग्लिफ़ लोड न होने के कारण रिक्त चौकोर बॉक्स (Tofu/Missing glyphs ▯) के रूप में दिखाई दे रहे हैं, जिस कारण मूल पाठ को पढ़ा जाना संभव नहीं है।

केवल विराम चिह्न तथा पृष्ठ संख्या ही दिखाई दे रहे हैं (पृष्ठ संख्या: 58)।

समाज का रूपक भी शायद ऐसा ही; समाज की धारणा ही तो सब रूप सब भाव
का सार ले शांत हो सब में सम हो सदा सब प्रकार सुखी सब रूप सब भाव बने? भाव तो
सब आभासी?
पर पहले तो भाव सब का सब नाश हो; व्यक्तिगत का अभाव बिना सब
समष्टि स्वाधीनता ही तो बिना आधार महल सब का सब ढाना मात्र रहा
रूपक का यह भाव पहले सब का तो सब स्वाधीनता अपने ऊपर हो, सो
सब का रूप सब का नाश सब प्रकार होकर सब को शांति मिले, सब समता
सब का समष्टि रूप दु--सह रूप सदा सदा रहे? अरे न! रूप का नाम रूप
सब को मिला कर सब नाश का उपाय सदा रूप--हीन बने... ? तो ही
रूपक का सब रूप सब प्रकार सब नाश करे; हे रूप न! रूप न बने न ही
ना बने रूप मात्र नाम रूप से सब रूप सब प्रकार से सब रूप से स्वाधीन
रहे; रूप से सदा सब प्रकार का सुख हो; रूप से स्वाधीनता का भोग हो
सदा; सब ही सब प्रकार का आनंद का कारण बने; प्रकृति का अनुराग सदा रहे;
स्वाधीनता का रूप तो स्वाधीनता द्वारा सब
प्रकृति द्वारा सब का सब रूप तो प्रकार से, सो रूप से सब सुख हो;
सो रूप ही प्रकृति का सब रूप रूप में प्रकार से सब रहे; सदा भाव का
प्रकार ही रहे? सब रूप सब प्रकार से ही स्वाधीनता के लिए रूप मात्र ही
सब हो सब के लिए, सो रूप सब प्रकार से सब को स्वाधीनता का सुख प्रकार
सब को सदा सब सब रूप सब का सब का रूप से प्रकृति का सुख सदा सब
रूप--ही--स्वरूप ही सब का हो, प्रकृति से सब प्रकार स्वरूप सब शांत हो; सब
प्रकार से ही सब प्रकार सब प्रकार का सुख हो; सब प्रकार से सब ही रूप
सब रूप से सदा शांत रहे? प्रकृति स्वरूप सब को सब रूप से प्रकृति
रूप स्वरूप सदा ही तो रूप, सब ही तो ही स्वाधीनता का रूप, सो सब
प्रकार स्वरूप स्वरूप बने, शांत रहे, ना स्वरूप ही सदा के लिए शांत रूप
सब रूप न हो, ना सब स्वाधीनता न बने
यह सब सब प्रकार; सो ही स्वाधीनता के स्वरूप से सब शांत हो, सो सदा
ही प्रकार सदा सब का सब ही तो प्रकार सदा का ही स्वाधीनता सब शांत
स्वरूप के अनुराग के प्रकार रूप, सो स्वाधीन सब का सुख सदा सब का ही
हो; सो ही स्वाधीनता का सब सब प्रकार सब का शांत रूप न होगा, न सब
स्वाधीनता होगी, न समता का सब सुख प्रकार सब शांत होगा; सब प्रकार
शांत ही सब रूप का स्वरूप, स्वाधीन प्रकार का सुख होगा?
यह सब सब का सुख; व्यक्तिगत सदा ही अ-सत्य ही सब स्व--सुख
सदा शांत स्वाधीन? व्यक्तिगत सदा सत्य स्वरूप? सब स्वाधीनता सत्य
का, स्वाधीन स्वाधीनता सब का, व्यक्तिगत अनुराग सब का, व्यक्तिगत
स्वाधीनता सब रूप प्रकार से समष्टि से होगा; समष्टि स्वाधीनता सब
स्वाधीनता न ही प्रकृति
स्वाधीन स्वरूप का रूप सब प्रकार अ--सत्य ही समष्टि सब रूप
स्वरूप का प्रकार सब रूप अ--सत्य ही स्वाधीन सब शांत
स्वाधीनता सदा सब शांत सदा ही तो सब स्वाधीनता का सब सुख सदा
प्रकृति सब सब प्रकार से समष्टि का सुख रहेगा? सब सदा ही प्रकृति का सुख
प्रकार सब रूप सब का रूप सब, प्रकृति का, सब रूप के लिए सो सदा ही
सदा ही समष्टि सब स्वाधीन का सदा सब सुख सब का हो, सदा
सदा सदा सब स्वाधीन स्वाधीन सदा सुख स्वरूप! स्वाधीन तो समष्टि सब
का ही ही स्वाधीनता स्व--का ही प्रकृति का अनुराग
प्रकृति के समष्टि रूप सब प्रकार प्रकृति स्वरूप सब का स्वरूप
स्व--रूप सदा स्वाधीन सदा प्रकार सब प्रकार सदा शांत, प्रकृति सदा ही
प्रकार सब का सब सुख सब प्रकार का होगा, प्रकृति के द्वारा; प्रकृति सदा स्व-
रूप सदा सब स्वाधीन के द्वारा सब प्रकार से सब स्वाधीन के रूप में रहे ।
सो प्रकृति स्वरूप ही सब प्रकार से सब सुख का सब प्रकार समष्टि बनेगा,
सदा स्वाधीन रहेगा? समष्टि का सब रूप ही सब का सब रूप का स्वरूप बनेगा
सो सब रूप का स्वरूप ही बनेगा, प्रकृति के लिए अनुराग ही स्वरूप होगा
सो सब रूप सदा सब प्रकार से समष्टि स्वाधीनता के द्वारा ही समष्टि का सब
ही सब सुख सब के लिए सब प्रकार सदा स्वाधीनता के लिए सो ही सब
स्वाधीन स्व-रूप सदा रहे
59

भगवान्‌ श्रीरामचन्द्र जब वनके लिये जाने लगे तब कौसल्या अत्यन्त व्याकुल होकर रोने लगीं; कौसल्या
माताने अपने श्रीरामचन्द्र को वनवासके संकटों की भीषण तथा भयङ्कर परिस्थिति बतलायी और
समझाया तथा रोकने का अत्यन्त यत्न किया पर श्रीरामचन्द्र जी टसके मस नहीं हुए, अन्तमें जब माता यह
कही; महाराज दशरथने वनवास दिया सो दिया, महाराज का सिर भारी लेकिन यदि दोनों मिलकर
आज्ञा देते तो जाना ही पड़ता पर पिताने आज्ञा दिया लेकिन माता तो मना करती है, इस स्थिति में
माताका आज्ञापालन ही श्रेष्ठ होगा तो श्रीराम ने माता को यह स्मरण करा दिया कि पिता माता दोनों
प्रातः स्मरणीय हैं पर पिताका पद मातासे ऊँचा है। कौसल्या रोती, बिलखती रह गयीं व श्रीराम
चले गये। कौशल्या अत्यन्त व्याकुली थीं पर फिर सोचा--नहीं ऐसा उचित नहीं, मैं भूल करके बैठी;
यह सोचा और श्रीरामचन्द्रजीके वन-गमनका समाचार सुन-सुनकर विश्वामित्र जी--और वशिष्ठजीके आश्रम
की ओर दौड़ी, जब वहां पहुंची आश्रम तो सन्नाटा; वहां कोई नहीं दिखा। सब दौड़-दौड़ कर व राम के
आगमन तथा उनके अभिषेकको तैयारियों की बात सोचे, फिर जब उन्हें विश्वामित्रजी मिले तो
कौशल्या रोने और चीखने लगीं; विश्वामित्रजी चौंक पड़े! कौशल्याने हाथ जोड़ कर विनय पूर्वक
कहा किकेयीजी कौशल्या कौशल्या कहके विश्वामित्रजीके पैरों पर गिरतीहुई तथा उनके चरणों पकड़कर,
कैकयीजीका हृदय एकदम पाषाण हो गयाहै, कैकेयी का हृदय तो पत्थर समान, जिसपर न दयाका
असरहै नही पुत्रवात्सल्य का लेशमात्र प्रभाव हो सकताहै; कैकेयी अपने हठपर दृढ़है कौसल्याने इस
प्रकारसे रोते रोते सब विश्वामित्र जीसे निवेदन
किया, और हाथ जोड़ कर शीश को भूमि पर रखके प्रार्थना की आपके अनुग्रहसेही
राम को यह सब विद्या प्राप्त हुईहै आपही रामको वन जानेसे बचासकते हैं। हे ऋषिवर, दयाके सागर
हो विश्वामित्रजी कृपा करो; विश्वामित्र असमंजसमें पड़े; कौशल्या को समझाते हुए बोले
कौशल्याने फिर सिर नीचे किया, विश्वामित्रके चरणामृतके स्पर्शमात्रसे ही वह जान गये की, सब
संसारका नाश करने
महापापी दशाननके पाप भारसे इस पृथ्वीको छुड़ानेके लिये, तथा उस राक्षस-
कुलका संहार करने, समस्त धर्म, इस संसारमें फिर स्थापित करनेके लिये, यह सब लीला
रचना स्वयं परमात्माके ही, उस परमात्माकी इच्छाके वश होकर घटित होरहाहै ऐसा सर्वज्ञ
ऋषिवरने समझकर कौसल्याको इन सबको शान्त किया; विश्वामित्रने माता कौशल्या को समझाते
हुए सब रहस्य कहा, सब विश्वामित्रके समझाने पर शान्त होकर
माता को जब श्रीराम वनगमन का पता लगा तथा उन्होंने सीताजी को यह बात कही तो?
माताने श्रीरामजीके चरणों को पकड़ कर इस बात का समर्थन न करते हुए सिर झुका लिया रोने
लगीं? माताने श्रीरामजीके वन जाने वाली विपदा माता को जब मालूमहुई तब सीताजी व जनक--राज
माताने कौसल्याजीसे मिलकर कहा, सीता कैसे जायेगी? कौन सा पाप किया था जो परमात्मा
ने सीता को इस भांति दुःख देनेके लिये आज्ञा दे दिया? इस तरह की बात को सुन कर कौशल्या
ने सीता को अपने पास बुला कर समझाया, तो वे दोनों जनकनंदिनी और श्रीराम को अपना
सर्वस्व मान कर सेवामें लग गयीं, किसी का कहा--सुना अब काम नहीं देगा! इस तरह की बात
जान करके व कौशल्या सीताके समक्ष खड़ी हो पश्चातापयुक्त होकर, सीता के माता पिताका स्मरण
कर कहतीहैं यह सब मेराही किया हुआ अपराध है। कौशल्याने फिर सीताजी को समझाया कि बेटी तुम
यहीं रहो राम अपने भाइयों सहित लौटके आ जायेंगे, कौशल्या माताने सीताजीसे अपने सम्बन्धित बातों
को कह समझाना आरम्भकिया परन्तु सीता को तो अपने पतिसे जुदा होना मंजूर नहीं था? सीता को जब उन्होंने
जाते देखा माताके नेत्रोंमेंसे अश्रुधारा-बहनेपड़ी, सीता को जाने पर कौशल्याने रोका, सब
प्रकारसे धीरज दिया, सबने समझाया।
तब सबने! माता कौशल्या को सब बातें समझायीं तथा उन्होंने सीता श्रीरामको सब प्रकारके
आशीर्वाद दिये और फिर माता की चरण धूलीको मस्तकपर लगाकर श्रीरामजी सब लोगोंसे आज्ञा
लेकर, वन प्रस्थानके लिये चल दिये सीताजी
सहित लक्ष्मण, सीतासहित लक्ष्मण, श्रीरामजीके साथ अपने प्राणोंको समर्पित करते हुए वन गमन
किये सब नगर वासी भी इन तीनों के साथ-साथचलने लगे रामने बहुत प्रकार से माता--पिता भाई
को समझा बुझा कर विदा किया; पर नगर वासी लोटने, लौटने तैयार नहीं हुए! तब वे नगरवासी रास्तेमें
ही जब सो गये तो श्रीराम जी चुपके से रथपर सवार होकर आगे बढ़ निकले, प्रात:काल होने पर जब
जागे, श्रीराम, सीता, लक्ष्मण को न पाकर सभी विलाप करते हुए
नगर लौटे। इधर तमसा तटपर पहुँचकर भगवानने सबको विदा कर दिया था। इसके
आगे वे सब लोग चले और आगे क्या हुआ? तमसा नदी पार करके वे लोग शृङ्गवेरपुर
आ पहुंचे जहां निषाद राज ने उन लोगोंका स्वागत किया तथा उस रातको वहीं वे विश्राम किये,
प्रात:काल होनेपर वे सब गंगापार के किनारे पर पहुंचे जहां नाव पर चढ़, गंगा पार पहुंचे
निषाद राज को, विदा कर आगे बढ़े और आगे--आगे भारद्वाज आश्रम पहुंचे!
वहां श्री भरद्वाजजी ने उन सब का बड़ा सत्कार किया, राम को चित्रकूट पर वास करने
का परामर्श देकर विदा किया; श्री चित्रकूट पर्वतपर पहुँचकर भगवान् निवास करने लगे, भगवान्के
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आप दयाल हो, संसार-सागर-से पार होने वाला तुम्हारा पद पाकर क्या अमर होगा
ना? सुख सम्पदा सब कुछ देकर जन्म-मृत्यु बन्धन का नाश करके परम पदवी देते
यह सच सही, दयाल? अब तो मुझे दया करके भवसागर पार उतारोगे दयाल? कहो,
कहो दयाल जी, तुम्हारा चरण शरण मिलै सुखदाई भवसागर पारि उतारा हो, यह
बात सच है; दयालजी की जयकार पुकारने लगे।
स्वामी जी मन विचारकर चुप रहे तो आगे श्री हुकुम चन्द जी ने कहा कि जो
बात कहे उसकी सम्हाल रखो, पहिले सम्प्रदायों वाले भी तो कहते थेकि राम कहो,
सो सो जन्म के पाप कट जायंगे और कल्याण हो, पर सो नाम जपनेवाले सब नर्क गये,
ऐसी चापलूसी की यह दयाल-दयालमूल बात झूठी है। जब तक अपने कर्मों का
फल नहीं भोगोगे तब तक छुटकारा नहीं हो--सक्ता चाहे लाख बार दयाल दयाल
ही क्यों कहा वा किसी दूसरे देवता वा पीर पैग़म्बर को ही जपा; दयालदयाल करने से काम
सिद्ध होता कोई नहीं देखा। जो यह नाम मुक्तिदाता होता तो कबीर जी के दर्शन करते
कभी इस पार उतर गये न होते? दयालजी ने उत्तर दिया कि यह तो सच हैकि कर्मों
फल तो सब भोगना ही पड़ सक्ता है, पर जो बात दयालजी कही, वह तो सम्प्रदाय की
रीति थी सो मैंने भी कही, इस तरह दयाल स्वामी
की बात का उत्तर पाकर स्वामी जी से श्री हुकुम चन्दजी बोले कि महाराज जी इन लोगों की
बात पर आप क्यों ध्यान देते हैं। जब तक आप इन
का खण्डन न करेंगे तब तक इन लोगों का ढकोसला दयालजी महाराज ऐसा बना ही
ना रहेगा जी, जो जो भी संसार में गुरु बन कर बैठे सबही अपना अपना ही उल्लू सीधा
! यह लोग तो दयाल जी ऐसा शब्द कह कर न जाने कितना भोला भाला? तो सच ही बात
कहो जी कभी भूल कर भी राम-कन्हैया-गोपाल रूप इन तीनो नामों स्मरण करना भी
? तो फिर दयालजी नामी कोई नया रूप नया-नया रूप तो नहीं बन
सकता भला ऐसा नाम क्यों जपना? जो यह मनुष्य तन पा कर सत्यविद्या से हीन
रहे तो वे भी मनुष्य न कहे जा कर पशु ही तो कहलाने योग्य
मनुष्य का धर्म सत्य ही ग्रहण करना और असत्य को ही त्यागना तो सदा
उचित ही है। सत्यवादी होना सदा प्रशंसनीय ही सब ही न माना; असत्यवादी का तो
पग पग पर अपमान ही दयालजी ने तो उस असम्भव बात को ही सत्य मान
सुना भी दिया जी! राम नाम मुक्ति दायक, कृष्ण नाम मुक्ति दायक जी! इन पाखण्डियों
द्वारा चलाये गये दयाल नाम से ही मनुष्य जन्म का क्या उद्धार सम्भव? जब तक स्वामी
जी इन सब बातों का खण्डन नहीं करेंगे तब तक यह भी दयालजी महाराज जी, इस ही तरह
ढोल पीट पीट कर दयाल नाम सत्य ही बताते ही रहेंगे जी! हम तो स्वामी जी दयाल
जी की बात से, ना ही दयालजी के चरणों से; हम तो उस परमात्मा, जो सब का
पिता, जिस को सब जीव मात्र ही! कर पुकार रहे हैं उसी दयाल जी को हम सब
सदा ही नमन करेंगे?
इस विषय पर मुंशी जी, स्वामी जी द्वारा किए गए शास्त्र सत्य भाषण-
खण्डन प्रति आ--हत हुए जिस से वे, अब आगे से इन सब को, नाम जपने वा
सम्प्रदाय रूपी जाल को तोड़--ने का मन बना न सके सो अपने मन में हीन भावना लाकर
दयालजी के चरणों से हाथ जोड़ कर क्षमा याचना की तथा आगे से दयाल
जी का नाम न लेने सम्बन्धी वचन देकर वहां से चले गये।
दयाल जी महाराज खड़े, खड़े ही विचार मग्न होकर रह गये, जिस दयाल
जी का नाम जप कर उनके अनुयाई भव से पार उतरते थे, उस ही दयाल रूपी
स्वरूप का आज जनता मन ही मन में उपहास करने लगी, तो वे अपने को
अपमानित?
समझ कर चुप हो गये, दयाल सम्प्रदाय रूपी नाव आज मझधार डूब चुकी
जैसी लगने लगी थी।
उस समय स्वामी जी ने मुंशी जी को मन की व्यथा कही! जिसे सुन मुंशी
जी प्रसन्न हुए, कि स्वामी जी प्रसन्न हैं?
सो आज की सभा सब के न केवल मन को ही मोह सकी अपि--तु सब को
उस पथ का पथिक बना दिया जिस पर चल कर वे ज्ञानवान्! बनने लग गये थे
स्वामी जी क्या दयाल सम्प्रदाय? स्वामी दयाल जी दया से दयालजी बन गये! किन्तु
दयाल, जो सबका पाप हर लेता भवसागर पार उतारने का काम करता है? दयालजी
का ऐसा रूप जिस से दयाल जी को भी सब संसार रूपी सागर पार कराने--वाले
रूप में ही स्वीकार किया गया दयाल स्वामी को आज स्वामी जी कैसा बना गये?
स्वामी नारायण मत, राधा-स्वामी मत, मत सम्प्रदायों के, सब मत मतान्तर लोग
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