अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1976 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपूज्य महाराज श्रीजी के
पावन सानिध्य
द्वारा लिखित पत्र
पूज्य महाराज श्री के सानिध्य प्राप्त करने वाले साधकों के लिए इनका लिखा एक पत्रक
यहाँ पर उद्धृत कर रहे हैं। जिसका उद्देश्य मात्र यह है कि जीवन रूपी बगिया को महकाने के
लिए क्या करना है?
विषय रस विष त्यागो, हरि रस पीयो रे। नाम रूपी नौकापर जो मनुष्य चढ़े वे पार
हो ही जाते हैं। नाम नामी एक है। नाम रूपी नौका में बैठकर भी अविश्वास करे नामी, भगवान पर
शंका करे विश्वासहीन नाम का आलम्बन ले प्रभुपर जो शंका व भयभीत हो वह पार कैसे हो सकता
ऐसा शंका निवारण के लिए ही कहा है, भगवान केवल विश्वास स्वरूप ही रूप धारण कर
ही पार कर सकते हैं, ऐसा दृढ़ निश्चय ही साधक को पार ले जाता है।
हे साधक तुम आगे बढ़--भगवान का आश्रय लेकर सत्य मार्ग रूपी नौकापर जो भी
चढ़ा व तरे; प्रभु नाम नौका पर जो चढ़ा पार-पार हो गया सो तर गये; प्रभु शरण व नाम,
नाम व रूप।
विश्वास फल का वक्रीव का फल अवश्य होगा, जो संशय करेगा सो तो डूबा
निश्चय ही पार उतरे बिना नहीं; ज्ञान विज्ञान तो मात्र एक; सो ज्ञान उपदेशप्रद
मात्र पथ मात्र ही प्रभु नाम रूपी नौका रूप पद प्रभु का ध्यान ही नौका व प्रभु का
ध्यान नाम नौका, नाम नामी दोनों एक। केवल ज्ञान से पार नहीं व ज्ञान विज्ञान
ही है, ज्ञान से कर्म से कर्तव्य तो पार होना ही कठिन ही पार बिना कर्म, ज्ञान
का अधिकार ही क्या व कहाँ।
विश्वास ही पार रूप साधन ही शरण मात्र रूप ही कर्तव्य का फल;
बिना ज्ञान के आचरण व्यर्थ है। अज्ञानता से ज्ञान ही श्रेष्ठ है। ज्ञान से भी अधिक
कर्म जो निष्काम रूप से या श्रेष्ठ कर्म फल त्याग से ध्यान रूप ज्ञान श्रेष्ठ से
श्रेष्ठ ही ध्यान से श्रेष्ठ कर्म फल त्याग जिससे परम शांति प्राप्त हो। शांति
शांति से कर्तव्य का त्याग नहीं कर्म फल का त्याग, सो संन्यास व सो ही
प्रभु शरण सो ही स्वरूप प्राप्ति? प्रभु शरण से कोई वंचित नहीं व न ही
भक्ति से वंचित रहा? केवल कर्म से पार न साधन रूप से केवल व न
ही मात्र कर्तव्य त्याग ही से केवल कर्म-संन्यासियों को शांति प्राप्त हो,
संन्यास स्वरूप त्याग कर्मफल के त्याग रूप संन्यास रूप प्रभु शरण ही
प्राप्ति रूप ही स्वरूप का ज्ञान ही कर्तव्य मात्र श्रेष्ठ सत्य है।
एक बात व कर्तव्य ज्ञानपूर्वक ध्यान युक्त निष्काम ही कर्म संन्यास का
स्वरूप ही कर्तव्य मात्र ही अधिकार मात्र कर्तव्य से ही फल मात्र प्राप्त हो
कर्तव्य रूप कर्तव्य कर्म त्याग रूप ही कर्तव्य त्याग से ज्ञान त्याग से श्रेष्ठ
है, तो सो सो ही, तो फिर ज्ञान त्याग से संन्यास ही श्रेष्ठ है; तो श्रेष्ठ सो श्रेष्ठ
कर्म; त्याग श्रेष्ठ तो फिर श्रेष्ठ व प्रभु--का रूप ध्यान ध्यानपूर्वक श्रेष्ठ साधन ही
श्रेष्ठ; ध्यानपूर्वक ध्यान ही श्रेष्ठ, श्रेष्ठ, तो फिर श्रेष्ठ; श्रेष्ठ प्रभु व सो श्रेष्ठ ही
हो जाता श्रेष्ठ ही श्रेष्ठ रूप प्रभु का ध्यान।
केवल त्याग से, सो त्याग से त्याग का फल प्राप्त रूप ही केवल, पल-पल
स्वरूप प्रभु संशय से परे ही नाम उच्चारण के फल से पार हो गये, संशय
का त्याग विश्वास से; नाम रूप नाम उच्चारण फल केवल कल्याणकारी नाम फल
केवल से, फलदायक फल से फल त्याग संन्यास रूप ही फल कर्म संन्यास कर्म
त्याग फल से प्रभु शरण प्राप्त रूप ही फल प्राप्त रूप श्रेष्ठ श्रेष्ठ से श्रेष्ठ
ही! नाम ही केवल सार, सो ही सार है; सो उच्चारण केवल प्रभु शरण नाम
सार ही, तो नाम जप से श्रेष्ठ नाम जप ही से प्रभु रूप ज्ञान मात्र फल हो
ही; पल-पल नाम जपते हृदय स्थित प्रभु का पल-पल रूप प्रभु नाम व रूप
भगवान स्वरूप ध्यान ही हृदय स्थित स्वरूप का नाम जप से प्रभु व प्रभु
रूप नाम उच्चारण से भगवान स्वरूप भगवान रूप भगवान ही हो जाते
मात्र प्रभु रूप हो जाते हैं।
इस प्रकार स्पष्ट शब्दों में पल-पल भगवान नाम का ध्यान ही हर मनुष्य को हर
प्रकार के संशय से परे हटाकर उनके लिए केवल शांति स्वरूप होगा।
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