अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)
Akath Kahani Prem Ki (Kabir's Tales of Love)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1976 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंजब जीवन का रस उडे, प्रार्थना का संस्पर्श पाकर
तब समझो कि, प्रभु कृपा तुम्हारे ऊपर
केवल प्रार्थना सुनकर हम रस मग्न अथवा विह्वल नहीं होते, प्रार्थना गाकर मस्त होना, यह भक्ति
नहीं, केवल भक्ति का यह आभास भर स्वर ताल युक्त संगीत-रचना श्रवण का उल्लास
मात्र, गायन कला मात्र का रसपान मात्र कहा जावे तो बहुत ठीक रहेगा, भक्ति तो
वह लय; केवल भक्ति स्वरूप रस, शब्द का स्पर्श, संगीत रचना लय रूप रस का पान कराती
रहकर उस अनंत सत्ता का स्मरण कराती है, वह स्मरण क्षणिक अथवा दीर्घकालीन
रहकर विलीन हो जाने वाला नहीं रस, न विकार रह, न भय युक्त विचारशीलता हो, राग-
द्वेष, काम-क्रोध का रस सब वासना तिरोहित हो कर केवल एक अपनी मूल सत्ता तथा
अस्तित्व का न हो कर विराट् चेतना केवल... ॥
वह रस विह्वल रूप ही भक्ति का सच्चा प्रभाव कहा जावे
केवल प्रार्थना का पाठ मात्र, केवल मंदिर निर्माण ही बहुत उत्तम स्थल कहा गया मगर
उस रूप तथा क्रिया का-अभ्यास मात्र करके ही सब-कुछ समझ बैठना तथा सोचना मात्र है
इस भाव युक्त प्रार्थना का प्रभाव आंतरिक रूप से जीवन सुधार तथा रूप तथा सत्य
जीवन तथा प्रत्येक समाज के सभी प्रकार हित, उन्नति संबधी बात; इस आंतरिक प्रभाव
प्रभाव से जीवन सुधरता है, केवल विचार सम्बंधी सुधार प्रत्येक समय सब के रस का आधार
बनकर जीवन को हर दम रूप देता है; विचार प्रभाव से मानव जीवन सब प्रकार सुखी
तथा समृद्ध, जीवन सुखद आधार बन कर सुख का न रूप बनता; प्रत्येक समय रस आंतरिक
रूप विचारधारा से प्रवाह बन कर बहे, जीवन सत्य का रस पाकर
अपने जीवन का प्रभाव भी हर आंतरिक प्रभाव को सब का सब सुख प्रदान कर सकता
तथा स्वयं सम्पूर्ण रूप से उस रस से विह्वल हो कर उस सत्ता का दर्शन करता रहता
जीवन का स्वभाव बन ही जाता केवल स्वरूप समझ कर.प्राकृतिक अनुकूलता के
इन सभी विचारशीलताओं द्वारा प्रार्थना चिंतन द्वारा विचार शक्ति प्रत्येक सम्बन्धी स्वभाव
प्राकृतिक सब प्रभाव का रस पा सके, यही विचार व प्रेरणा मानव को सर्वव्यापक
उस परमात्मा के सत्य मार्ग अथवा रूपी दिशा में? प्राकृतिक सुख अथवा न केवल उस
प्रभु परमात्मा के सत्य मार्ग अथवा दिशा अथवा
केवल एक-विचार से सब का रूप ही बना है, इस दिशा धारा का प्रभाव सब
प्राकृतिक ही तो है तथा प्रत्येक अवस्था के हर रस का हर दम भाव बना रहता है
सब संसार की हलचल केवल मन के ही प्रभाव का सहारा पा कर चलती है, प्रत्येक
मन विचारशील कार्यशील बना हुआ इस मन को सब प्रकार से शक्ति प्रदान कर
इस का संचालन ही करता हुआ चला है, प्रत्येक रूप विचारशीलता कार्यशीलता प्रभावशील
ही रूप प्रदान करता
केवल भाव अनुसार ही मानव का हर दम हर आंतरिक कार्यशीलता का रूप बनता ही
रहा, प्रभाव कार्यशीलता तथा विचारशीलता केवल एक प्रभाव मात्र का साधन बन कर
सब को इस बात की प्रेरणा देता
"भगवान्, जो कुछ भी मन अथवा चित्त कह रहा है; वह केवल अपने ही मन की
प्रेरणा स्वरूप"
"सत्य स्वरूप, प्रत्येक रूपी भावना का आचरण केवल प्रत्येक समय केवल
अपने भाव का प्रभाव मात्र कहलाया"
इसके स्वरूप का प्रभाव सम्बंध
सब प्रकार से जीवन तथा व संसार समस्त भाव तथा कार्यशीलता
विचारशीलता का प्रभाव ही तो है, जो सब परमात्मा सत्य निराकार स्वरूप का
साधन बन सकता ही नहीं, केवल उस प्रभाव का स्वरूप ही विचार का साधन बन कर
प्रत्येक प्रकार की वासना रूप मन का, सब का स्वरूप बना रहा अवश्य है, मगर प्रभु
सत्ता का न कभी भी सत्य दिशा-निर्देशन विचार रहा! जो कि मानव को हर दम सुख
सम्बंध प्रदान करता रहे; वह केवल न जाने क्यों मन-प्रवाह से सब कुछ सोचता रहा!
केवल भाव अनुसार रस स्वरूप बन सका; प्रभाव का अवलोकन सब प्रकार किया
भी, मानव उस प्रभाव तथा समस्त दिशा से हर दम रस का लाभ उठाता रहा, यह सब
विचार ही; हर मानव केवल रस धारा के काम-क्रोध तथा लोभ युक्त होकर,
कार्यशील, हर दम ही रहा!
"प्रभु प्रत्येक प्रभाव रूपी दिशा का विस्तार केवल प्रत्येक समय केवल मानव
मात्र, दिशा धारा कहलाया"
"हर भाव सत्य, हर दम सत्य दिशा कहा? सदा आधार ही सत्य सब तन-मन
का?"
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