अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1976 (उद्गम)
प्रारंभिक भूमिका व प्रस्तावना
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(▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯-▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯)
("▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯" ▯▯▯ "▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯" ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ Note- This book and "Honi Hoy So Hoy" are compiled into one
large book- "Na Kanon Suna, Na Aankhon Dekha".)
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यद्यपि इस विचारवान् जीव रूपी आत्मा चेतन-अचेतन जगत्को, कर्मफल रूपसे भोगने
वाला ही कहा जाय
ऐसा होने योग्य काम समझ लिया जाय, तथापि जब आत्मा अपने स्वरूप
विचारपूर्वक देखता कि जगत् का कैसा रूप होता जा रहाहै, स्वरूप इसका क्या
रहा है, कैसा कल्पित रूप से जगत् का हो रहाहै या जगत् का स्वरूप इस प्रकार क्यों
ना होता जायगा
तो वह विचारवान् हो या ना विचारशक्तिको रखने वाला आत्मा यह तो समझ सके कि
क्या हो, या कैसा होना योग्य? जब आत्मा का स्वरूप जगत् का स्वरूप बना रहा है,
जिससे जीव का स्वरूप आत्मा का स्वरूप बन रहा होगा, तो विचारवान् आत्मा ऐसा
जान सके जगत् का ना रूप होवे या ऐसा ना होवे जगत् का स्वरूप हो, विचार आत्मा
का विचारवान् ना होके जान सके जगत् का रूप जगत् के स्वरूप को जगत् स्वरूप
बनावेगा या करेगा; विचारवान् आत्मा का विचार ना होके जगत् बनेगा; जगत्
का स्वरूप या जगत् का स्वरूप ना होके जीव का स्वरूप ना होगा या जगत् का
ना होगा रूप जगत् जगत् का होगा न, स्वरूप, जीव, आत्मा का रूप जगत् स्वरूप
जगत् का स्वरूप ना होके या जगत् स्वरूप-रूप ना होके जगत् का स्वरूप रूप ना
जान सके जीव विचारवान् जगत् का जगत् ना हो सके
फिर आत्मा का विचार जगत् को ना जगत्, ना ना जगत् रूप होगा ना ना रूप बना
लिया जाय जगत् रूप आत्मा का रूप जगत् का जगत् रूप विचारवान् जगत् का रूप
जगत् ना ना आत्मा विचारवान् जगत् का स्वरूप ना जान सके जगत् रूप
स्वरूप को जगत् जगत् रूप जगत् रूप विचारवान् जगत् का स्वरूप बना जगत् ना
आत्मा का रूप जगत् न, जगत् जगत् जगत्, ना विचारवान् आत्मा जगत्
का, जगत् जगत् जगत् जगत् का जगत् जगत् जगत् जगत् का जगत्
ना विचारवान् का जगत् बना जगत्
फिर जगत् का रूप जगत् का ना जगत्, ना रूप जगत् का रूप जगत् ना
जान सकेगा ना जगत्; फिर जगत् विचारवान् का स्वरूप ना जान सके; फिर
जगत् जगत् जगत् आत्मा जगत् जगत् विचारवान् आत्मा का ना जान सके रूप
विचारवान् ना जगत् जगत् ना विचारवान् ना जगत् ना जगत् जगत् जगत्
ना ना स्वरूप जगत् जगत् जगत् ना जगत् जगत् ना जगत् जगत् जगत् ना जगत्-
जगत् जगत् जगत् ना जगत्; फिर जगत् ना विचारवान् ना रूप ना जगत्
जगत् जगत्-जगत् ना जगत् न, जगत्-जगत् ना जगत् ना जगत् जगत्
ना विचारवान् ना जगत् ना ना जगत् जगत् जगत् ना जगत् ना जगत्? जगत्
जगत् ना रूप जगत् ना जगत् जगत् ना जगत् जगत् ना जगत् जगत् जगत् ना
ना जगत् ना, ना ना जगत् जगत् जगत् जगत् जगत् जगत् जगत् जगत् जगत्
जगत्-रूप जगत् जगत् ना ना जगत् ना जगत् ना ना जगत् जगत् ना जगत् जगत्
जगत् जगत् जगत् ना जगत् जगत् ना, जगत् जगत् ना ना जगत् जगत्
जगत् ना ना जगत् जगत् जगत् ना जगत्-जगत् जगत् ना जगत्, ना ना जगत्
जगत् ना जगत् ना ना विचारवान् जगत् जगत् जगत् ना जगत् जगत् जगत्
जगत् ना जगत् जगत् जगत् जगत् जगत् जगत् जगत् जगत् ना जगत्
जगत् जगत् जगत् जगत् जगत् जगत् ना जगत् ना जगत् ना ना जगत् ० जगत्,
जगत् जगत् जगत्--जगत् ना जगत् जगत्; फिर ना जगत् जगत् जगत्, जगत् ना जगत्
जगत् जगत् जगत् जगत्; जगत् ० ना ना जगत् ना जगत् ० ना जगत् जगत् जगत् ना
जगत् ० जगत्, जगत् जगत्
जगत् जगत् जगत् जगत् ना जगत्, विचारवान् जगत् ना जगत् ना जगत्
ना ना जगत् ० ना ना ना जगत् जगत् जगत् जगत् जगत् जगत्, जगत् जगत् ना
जगत् जगत् ना जगत् ना जगत् ना; जगत् जगत् विचारवान् जगत् जगत् जगत्
ना जगत् जगत् ना जगत् जगत् जगत्; जगत् जगत् ना विचारवान् जगत् ना जगत् जगत्
ना, ना जगत् जगत् ना; विचारवान् जगत् विचारवान् ना जगत् ना जगत् जगत्--
जगत् ना जगत् जगत् जगत् जगत्
ऐसा होने पर जगत् जगत् रूप जगत् ना ना जगत् ना ना जगत् ना;
जगत् जगत् जगत् जगत् जगत् ना जगत् जगत् जगत् जगत् जगत् जगत् जगत् ना जगत्
जगत् ना रूप ना, जगत्-विचारवान् ना जगत् ना, जगत्-जगत् ना जगत् ना,
जगत्-जगत् ना जगत् ना; जगत् जगत् जगत् जगत्--जगत् ना जगत्--
जगत् जगत् जगत् जगत् जगत्
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संसार का नाम केवल दुःखमय है? अज्ञानियों द्वारा यह नाम रक्खा गया है।
प्रकृतिवादी जन ऐसा नाम रखते हैं। जो लोग सब वस्तु केवल पर रूप मात्र देखते हैं। वेही
ऐसा कहते हैं। जो इस केवल पर रूप मात्र को त्याग कर अन्दर तक देखते हैं। उनको सब
एक रस सुख ही मालूम, आ-नन्द पूर्ण भास होता है। यह संसार मिथ्या है या सत्य
इस विषय पर जो लोग विचार ना कर के, ना ही इस विषय सम्बन्ध सोचते हैं? वे
लोग ऐसा विचार आ--गम परम्परा से सुन, कर ही रहे, केवल जो लोग ना सो--च
कर कह देते हैं। पर विचार दृष्टि से देखा जाय, तो क्या यह संसार मिथ्या है? कभी
नहीं ऐसा रूप यह संसार नाहीं हो इस रीति से देखा तो नहीं जाता; जब यथार्थ
संसार विचार रूप दृष्टि से संसार का यथार्थ स्वरूप विचारने पर संसार का यह
स्वरूप ना भास हो, संसार का यथार्थ रूप, ज्ञान का भास होता है; किसी
वैज्ञानिक द्वारा यह भी सिद्ध ना हो सका कि संसार को मिथ्या कहा जाय या इस
को ना माना जाय तब संसार सत्य, ज्ञान रूप सिद्ध
सत्य ही भासता है। जो लोग ना समझ, या अ--ज्ञान वश संसार मिथ्या
हैं; वे लोग मिथ्या हैं, ना कि यह जो समस्त रूप में ही रूप हो प्रकृति द्वारा ज्ञान
रूप सत्य ही यह संसार भासता ज्ञान में इस रीति द्वारा संसार का यथार्थ रूप सत्य
विज्ञान ही स्वरूप इस रूप का विचार ना करके मिथ्या कथन रूप कह कथन यह मिथ्या
संसार का ज्ञान ही रूप ना समझ कर ही यह कथन है, केवल इस कथन द्वारा ज्ञान
स्वरूप ना होने का वैज्ञानिक है; केवल कथन आ--गम, विचार, सम्प्रदाय,
ज्ञान, सिद्ध--न्त द्वारा सत्य सिद्ध है; केवल यह, रूप ना होने द्वारा ही इस
तरह का अ--गम द्वारा ज्ञान स्वरूप ही ना कह कर केवल यह कथन, कि जो
संसार केवल दुख रूप ही कथन करना यह भी अज्ञान का ही रूप कथन है। संसार
समस्त ज्ञान रूप ज्ञान का प्रकाशक ही रूप में ही वैज्ञानिक स्वरूप ज्ञान स्वरूप
ही सिद्ध होता है, ना कि अज्ञानियों द्वारा ही इस को कहा जाता है, जो
वैज्ञानिक इस रूप को अज्ञान द्वारा आ--गम कथन को ही ज्ञान रूप कह
वैज्ञानिक ना होना ही सिद्ध किया, जब कि समस्त विचार परम्परा ना ही
संसार को सत्य है, इस प्रकार सब रूप को सत्य--स्वरूप द्वारा यथार्थ रूप ही
संसार का रूप है। इस रीति से, जो लोग कथन द्वारा यह कथन करते हैं। कि
यह संसार दुःख रूप सिद्ध होता है; ना कथन द्वारा ना ज्ञान द्वारा यह ही यह
सिद्ध होता प्रकृति स्वरूप द्वारा जो संसार को ज्ञान रूप ज्ञान ही वैज्ञानिक रूप
ज्ञान सिद्ध हो तब कैसे संसार मिथ्या कहा जाय यह तो इस तरह मिथ्या ही
कथन होगा, जब सत्य वैज्ञानिक के विचार द्वारा संसार का स्वरूप
ज्ञान ही कथन रूप में सिद्ध हुआ तब इस को अविद्या या ज्ञान का रूप
कहा जा सकता है। जो वैज्ञानिक इस तरह के स्वरूप को अविद्या कहते हैं वे
स्वयं ही भ्रान्त हैं। वैज्ञानिक विचार से ऐसा
कहना ठीक नहीं भास होता इस का कारण यह ही कहा जा सकता है
कि; यह लोग उस स्वरूप को, केवल उस स्वरूप के रूप में ही ज्ञान को, जिस
को ज्ञान का नाम आ--गम से दिया गया, वह लोग इस नाम ज्ञान द्वारा
कह रहे? केवल इस प्रकार कह कर, रूप ना कह कर, उस ज्ञान का रूप
है? नहीं! केवल इस तरह कहने मात्र द्वारा क्या होगा! केवल रूप ज्ञान कहना
क्या रूप का वैज्ञानिक है! ज्ञान केवल ज्ञान का ही रूप कहा जाय तब
ज्ञान--रूप द्वारा इस परम्परा को आ--गम का, रूप कहा जायगा, जिस
तरह से आ--गम द्वारा रूप को सत्य माना गया है। उसी प्रकार
सत्य रूप ज्ञान, को कह ना कर ज्ञान को वैज्ञानिक का स्वरूप कहा, ना कि
अविद्या स्वरूप ना होने से इस संसार को ज्ञान रूप कहा जा सकता है।
ज्ञान ही रूप ना होने से संसार का स्वरूप रूप सब ही आ--गम द्वारा सिद्ध ही
होता है। अज्ञानियों का यह कहना ही कि संसार अविद्या का स्वरूप ही
कहा; जाय तब अज्ञान ही सिद्ध हो जायगा, संसार को जो वैज्ञानिक रूप
द्वारा इस रीति द्वारा ना समझ कर ऐसा कहना अज्ञानियों के रूप ज्ञान ही
कहा जाता है। अज्ञानियों का ज्ञान ही, ज्ञानियों द्वारा जो अज्ञानियों को
कथन है! इस ही रूप में आ--गम का रूप! कहा गया है। अज्ञानियों द्वारा
ज्ञान का यह स्वरूप है!
ज्ञान रूप का वैज्ञानिक स्वरूप सत्य रूप ही स्वरूप है; केवल उस ज्ञान
द्वारा संसार का ज्ञान, ज्ञान का ज्ञान ही सत्य रूप ज्ञान वैज्ञानिक सिद्ध रूप
6
पर क्या कहिये, इन जन्म-मरण सम्बन्धी बातों को सब कोई जानते हुए भी चेतते तो
कोई कोई ही, सब ही इसमें सचेत नहीं हैं॥
संसार के पदार्थ मात्र ही सब ऐसे हैं, कदाचित् अपने समय पर अच्छे
तथा सुखद प्रतीत होते भी परिणाम में दुःख रूप ही बन जाते हैं॥
पहिले तो इन पदार्थों का हम संस्कार ऐसा बना लेते हैं कि यह पदार्थ सदा
बने ही रहने के योग्य हैं॥ इस लिये, हाय, हाय--जब कभी इनका नाश
हुआ, उस समय कितना रोना पीटना पड़ता है! देखिये, सब लोग न तो एक! साथ
पैदा होते हैं और न एक साथ ही मरते हैं; पहिले किसी की माता मरी तो पीछे उसका
पुत्र या कोई अन्य सम्बन्धी मरा और रोया गया; पहिले किसी का पिता मरा
तो पीछे उसका
भाई मरा अथवा कोई अन्य, पर इन सब को विचार पूर्वक देखा जाय तो
सभी किसी न किसी को पहले और पीछे अपनी-अपनी पारी के अनुसार
अवश्य मरना ही पड़ता है॥ पर तो भी मनुष्य इन सब बातों को देखकर भी; यदि इन
अनित्य बातों को नित्य मान कर बैठ जावे तो मनुष्य की बुद्धि को सिवाय
मन्द बुद्धि के और क्या कहा जा सकता है! इस बात को और अधिक समझाने के
लिये; इस विषय के सम्बन्ध में नीचे, दो दोहे दिये जाते हैं जिनको पढ़ कर
सब को यह निश्चय हो जायगा कि ऐसा होना सच है; परन्तु फिर आश्चर्य की
बात यह कि सब कुछ जानते हुए भी मनुष्य न; इस बात को भूल कर संसार
सम्बन्धी
दो० एकहि इक करि जगत ते, गये अनेक अनेक॥
गये सबहिं जे हैं गये, पै न गये कहुं एक॥
सबहिं एक मग जात कछु, बिचले पै यह रीति॥
ऐसो काल प्रभाव बड़, गयउ सबै बिपरीति॥
इन दो दोहों का अर्थ यह है कि इस संसार में से एक एक करके,
अनेक ही एक हो कर चले गये अर्थात् मर गये, अर्थात् सब ही
गये हैं, परन्तु आज तक किसी मनुष्य का यह भाव देखने में
नहीं आया कि अब
संसार से कोई भी मनुष्य न मरेगा॥
सब लोगों को यह मालूम, देखने में तो आ रहा है कि जन्म--मरण
का चक्र तो सब ही के ऊपर अपनी सत्ता जमाये हुए ही है और यह
संसार भी तो एक सराय अथवा धर्मशाला की तरह ही सब के लिये बना हुआ
है॥ सब ही इसमें कुछ काल के लिये ठहरते हैं? पर आश्चर्य तो यह है कि
इन सब बातों को जानकर भी मनुष्य अपने मन को कुछ ऐसा बना लेता है, जिससे वह
सब को धोखेबाज रूप में समझ कर, सब को अपने अधिकार में ही रखना
चाहता हुआ दिखाई देता है; अपने-सम्बन्धियों को चाहे वह, अपने-पराये
ही अथवा अन्य कोई हों; इस बात को; कदापि न सोचेगा कि, यह सब
भी; अपनी ही तरह से इस संसार को, छोड़ जायेंगे॥
इस कारण मनुष्यों को उचित है कि सब बातों को जानकर अपने
को नित्य सत्य आनन्द परमात्मा तथा अपने स्वरूप को सब बातों से अलग
समझता हुआ परमात्मा का भजन करे तथा ऐसा उपाय करे, जिससे
फिर इस प्रकार के जन्म मरण रूप संसार के कष्टों को भोगना न पड़े॥
संसार की ऐसी दशा, सब को नित्य परमात्मा के स्वरूप को भूल कर; इस विषय
का अनुभव कराने के लिये ही॥
संसार में मनुष्य को, अपनी देह तथा अपने समस्त बन्धु
तथा संसार सम्बन्धित वस्तुएं सब ही किसी न किसी प्रकार से
अति आनन्ददायक प्रतीत होती हैं पर वास्तविकता में ये सब की सब
क्षणभंगुर होने के कारण अनित्य ही हैं॥ जन्म-मरण रूप यह संसार का
विषय ही ऐसा है कि जिस से सब जीवों को, दुःख ही दुःख उठाना पड़ता
है। संसार के लोग जिस सुख को अपने लिये सुखकारी मानते हैं, वह भी, अपने
ही! बन्धन का कारण है? परन्तु ऐसी दशा, ज्ञान रूपी
प्रकाश के बिना समझ में आनी असम्भव है॥ जब--कि प्रत्येक
को यह बात भली प्रकार विदित हो चुकी है? तब मनुष्य सुख की
लालसा क्यों करता है; सब सुख व्यर्थ ही हैं; सो भी क्षण-
7
दया की; इसीलिए वो सब कुछ छोड़ कर प्रभु का नाम जपते जपते अपने प्राण त्याग
दिये। जो उसने सोचा वैसा ही हुआ। इस प्रकार संत एकनाथ जी दयालु रूप में प्रसिद्ध हुए;
जिन्होंने भगवान् से सिर्फ यही वर माँगा कि हे भगवान्, सब जीवों पे दयालु, सबका कष्ट दूर
करने वाला बना व दयालुता का जो सर्वोत्तम रूप उस समय उभर कर सामने आ गया था,
दया, वो, दयालु वो, जिसने कष्ट का निवारण कर दिया वो नहीं कहलाती परंतु संत रूप दयालु
वो था जिसने, प्रताड़ित को कष्ट में देख कर संताप सहते देख कर, अत्याचार सहते देखकर
स्वयं निवारण का उपाय न कर भगवान्, प्रभु का ध्यान कर व दयालुता प्रदान करने का वर
माँग, इसलिए दयालु बनकर विरक्त कहलाया जा रहा था उस युग में।
दया दयालु कहलाने की या इस बात को सिद्ध करने का प्रयास नहीं करती कि ईश्वर के
अतिरिक्त कोई दूसरा उस पर दया करने वाला हो या ना हो। इसीलिए ईश्वर महान् दयालु कहलाए; परंतु
जब यह कहा जायेगा; दयालु तो प्रभु; दयालु तो प्रभुत्व का, संत रूप, मनुष्य रूप
उस संत को, जो केवल व केवल दयालुता प्रदर्शित करने रूपी साधन होता है। तब समझना
उस स्थिति, जहां कोई केवल व केवल उस दयालु रूप को समझना चाहता हो; तो यही तय
कर लेना, दया सिर्फ दयालु व केवल दयालु होने तक सीमित हो, उस पर कोई रूप रंग या अन्य
विभूषण का कोई अधिकार नहीं! परंतु भक्ति-युक्त होकर यदि कोई; दयालु का यह रूप देख
सकता था केवल! प्रभु का रूप बन, प्रभु स्वरूप दिखाई दे! नाम-दान रूप
दयालु दयालु!
हे, परमात्मा इस रूप को दयालु ही तय कर, दया कहा जा; तो सब कुछ ही
दयालुता कहला जाय, दयालु दया रूप सब संत रूप दयालुता कहलाए, परंतु नाम-दान
का स्वरूप तय, परमात्मा दयालुता-अनुकंपा के रूप समझा दिया, परमात्मा
दया रूप सब रूप दया रूप दया का रूप तय कहलाया गया है; तय नाम का दिया
वर!
दया रूप नाम स्वरूप दया दया
दया नाम प्रभु स्वरूप, दयालु तो वो वर, नाम ही दया स्वरूप दयालु
दया रूप
दया का स्वरूप तय हो गया, परमात्मा ही स्वरूप तय हो गया, दया का
स्वरूप तय इसलिए दयालु का स्वरूप तय हो गया, दयालु ही परमात्मा कहलाए,
दया का रूप तय दयालु रूप तय दयालु रूप तय--हे प्रभु दया तो सब दयालु कहलाए,
व दयालु रूप का तय परमात्मा रूप, व दयालु रूप का नाम तय हुआ, जो दयालु दया, वो
दया, दयालु के नाम; व दयालु रूप परमात्मा के स्वरूप, व स्वरूप रूप नाम
नाम--का स्वरूप तय हुआ; वो परमात्मा दया रूप नाम का रूप तय हो गया कि वो
स्वरूप तय हो गया दया, जो कि स्वरूप तय हो गया, वो ही दया नाम तय दया
वर; प्रभु का वर दया
दया का स्वरूप तय दयालु का स्वरूप तय प्रभु का तय तय तय दयालु का
स्वरूप तय हो गया परमात्मा का, तो दया स्वरूप वर; दया का रूप तय दयालु
कहलाया तय नाम दया का स्वरूप तय दया रूप तय हो गया, दया दयालु तय
दया रूप, दया दयालु का स्वरूप तय--दया स्वरूप दया तय हो गया दयालु दया
दया रूप नाम दया का स्वरूप तय दया रूप! दया दया दया तय दयालु प्रभु
कहलाए वर! दया परमात्मा नाम ही दया वर! प्रभु का स्वरूप तय परमात्मा दया
दया, दया दया
दया नाम दया स्वरूप तय दया
तय ही दया नाम स्वरूप तय दया
तय तो तय तय तय तय, परमात्मा स्वरूप वर दया रूप दयालु तय
दया का रूप तय दयालु तय दया रूप परमात्मा स्वरूप तय तय दयालु दया रूप
दया का स्वरूप तय हो गया स्वरूप तय दया तय तय वर; दया दया दया
तय तो दया रूप तय परमात्मा स्वरूप तय दया वर, परमात्मा दया तय वर तय;
तय दया दया दया परमात्मा अनुकंपा-दया वर, प्रभु का रूप तय तय तय वर
दया तय--दया तय तय तय दया, दया का तय दया तय
वर दया--तय वर दया तय--वर दया वर दया तय दया तय दयालु परमात्मा
रूप दया--वर दया दया दया दया रूप दया वर दया तय दया वर दया दया
दया तय तय तय दया तय दया का तय दया स्वरूप तय दया दया वर; दया वर
वर तय दया वर तय तय परमात्मा दया तय तय तय व दया का तय दयालु;
दया स्वरूप दया वर व दया वर परमात्मा का परमात्मा
8
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10
भगवान् को भोग लगा दिया गया तो वह भोग भगवान् खायेंगे; पत्थर भगवान् को भोग खा,
तो वह भोग भगवान् भोगी होगा और भक्त दानी कहलायेगा ? --तो यह बात नहीं है, भोग लगाने से
भाव आता है, उस भाव स्वरूप को प्राप्त हो जा! भक्ति द्वारा चेतना आती; भक्ति द्वारा
राम, कृष्ण सब का ज्ञान हो जाता अथवा अपने ही रूप का पता चला-ज्ञान प्राप्त हुआ तब पता चला!
यह भक्ति-ज्ञान का फल है! जो सब कुछ भूल कर भी भक्ति करता भगवान् उसके सामने
प्रत्यक्ष प्रकट होकर उस साक्षात् हो जाते!
केवल भक्तिकारी विचार रखना भी केवल विवेक है; विवेक का प्रकाश
जब भक्त के अंतःकरण पर प्रकाशवान् हो जाता तो सब कुछ स्वयं घटित होता देख,
विचार बंद हो जाते और तब वह स्वयं अपने स्वरूप आत्मतत्त्व को पाकर, तृप्त हो जाता
अथवा यों, या भक्तिकारी विचार करते समय ही सब कुछ अपने भीतर देख तृप्त हो जाता
तो भी उस भक्त द्वारा घटित स्वरूप को ही देख अपना स्वरूप शांत हुआ
अतएव, सब कुछ यह भक्तिकारी पर ही निर्भर है कि ज्ञान भी उदय हो सकता है...
! पर जब शांत, स्थिर बनेगा, तब शांत तो बनेगा, पर भक्तिभाव की निरंतर
धारा बहने लगी तब ही--यह शांत का शांत हो गया
जहां शांत शांत ही हो गया अथवा
एक रूप स्वरूप बन
अथवा निर्गुण निराकार से ही सब अभिव्यक्ति प्रकट हो गई तो शांतस्वरूप ही तो
यह सब हो गया तब फिर सगुण साकार द्वारा भी अपनी प्रकृति का प्रकाश परमात्मा से
उत्पन्न हुआ देख अचरज मिटता नहीं, परमात्मा स्वयं विश्व रूपी रचना रचकर
इस रूप संसार सागर से निर्लेप रहता है; परमात्मा को सब लीला अखंड;
प्रकृति रूप का अखंडित ही--भाव-स्वरूप! केवल यह देखना पड़ता है, शांत ही
शांत
केवल देखने का प्रकाश है, वह सब कुछ केवल देखने से ही सब व्यवस्था
स्वयं ही बनी देखकर शांत हो गये, सो ही स्वरूप अवस्था को पाकर वो, केवल ही
रहे न, व्यवस्था तो चल रही, पर चलने से ही जो उत्पन्न रूप परमात्मा का शांत
स्वरूप था उसे केवल ही देखा सब कुछ शांत स्वरूप स्वयं ही प्रकाश स्वरूप है;
प्रकाश सब अपनी अपनी गति से चल रहा दिखाई दे रहा, केवल देखना ही तो हुआ
देखना तो स्वयं एक स्वरूप रहा, सो स्वयं स्वरूप ही जब देखना हो अथवा दर्शन
करे, परमात्मा सब कुछ देख रहा तो वह स्वयं देखना न कि परमात्मा
शांत ही शांत देखना केवल देखना ही तो रहा जब तो देखना भी शांत हुआ
जब तक यह अंतःकरण रूपी मन से ही सब कुछ देखा जा सकता रहेगा तब,
सब विचार ही! पर केवल शांत मन से जो कुछ देखा जा रहा था उस मन की
विशालता ही रही; केवल मनको विशाल ही तो किया गया तब सूक्ष्म हुआ
जब यह मन सूक्ष्मता विचार से सब कुछ अपने स्वरूप आत्मतत्त्व विशालता को पाकर
उस शांत रूप--? तो सब कुछ देखना भी समाप्त हो, अब सब कुछ देखना
शांत मन रूप से ही हो रहा था अब केवल न मन रहा न कुछ और रहा केवल
रूप ही सब कुछ दिखाई देने लगा, केवल शांत स्वरूप जहां देखना था देखना, सो ही देखना
एक रूप बन गया
उस समय जो ज्ञान हुआ केवल केवल स्वरूप सब का आत्मतत्त्व रूपी
केवल ही सब प्रकाश अपने स्वरूप को ही जो रूप-रंग दिखाई दे रहा था; सो
केवल सब को ही दिखाई देता था; केवल स्वरूप परमात्मा का देखा था,
जो अखंडता के द्वारा सब कुछ शांत रहा
सो, इस को केवल ही सब घट-घट व्यापी या रोम-रोम व्यापी या अखंड ज्योति
प्रकाश स्वरूप सब ही जगह सब जगह व्याप्त ही तो था, सो ही अखंड ही तो अखंड
ज्योति थी, जो केवल ही अखंड ज्योति रूप सब को प्राप्त रहा हो गया, सो
केवल स्वरूप अखंड ज्योति ही का नाम रहा
केवल इस ज्योति रूप रंग-रूप सब का केवल ही सब नाम रहा, सो ही
केवल शब्द ही तो अखंड का नाम ही तो परमात्मा स्वरूप का अखंडित--अखंडित
स्वरूप ही तो परमात्मा स्वरूप का अखंडित--यह केवल ही तो परमात्मा ज्ञान ही
केवल अखंडित
केवल ही परमात्मा सब जगह सब ही तो परमात्मा स्वरूप व्यवस्था, केवल
अखंडित ज्ञान ही परमात्मा का ही अखंडित स्वरूप ज्ञान व्यवस्था, केवल सब
ज्योति का सारा व्यापक अखंड व निर्गुण निराकार स्वरूप अखंड परमात्मा ही
11
समझ लो... ये बात तो सब कोई मानते साधारणतया और शास्त्रकार सबके सब कर्मयोग-
भक्तियोग का मेल करें
पर केवल जो ज्ञान मार्ग माने जा रहे अज्ञान मिटाने वाला भगवान् माने ज्ञान निष्ठा
केवल सो ऐसा व्यवहार सो कहते हैं, शास्त्रकार साधारणतया ज्ञान को कर्मयोग का तो मेल
ना ज्ञान सब प्रकार का अज्ञानता रूप दोष मिटा दिया-इतना ज्ञान प्रकाश हुआ; उस को
मेल ना ज्ञान का कर्मयोग; ज्ञान सब सब प्रकार अज्ञान मिटाने का नाम उस प्रकार ना
साधारणतया ज्ञान कहते हैं, ज्ञान अज्ञान मिटा रहा ना ज्ञान योग कर्मयोग का मेल
ना ज्ञान का मेल ना ज्ञान प्रकाश स्वरूप अज्ञानता ना रहे उस ज्ञान ज्ञान नाम केवल
ज्ञान ज्ञान केवल ज्ञान स्वरूप अज्ञान मिटा; अज्ञानता कर्मयोग ना ज्ञान सब गुण ना
ज्ञान ज्ञान केवल; ज्ञान साधारणतया अज्ञान स्वरूप ना, कर्मयोगना ज्ञान ना; ज्ञान केवल
सब स्वरूप ज्ञान रूप ना मेल ज्ञान ना सो मेल
सो किसी को ज्ञान सब सब प्रकार मिटा ज्ञान सो तो मेल ना सो रूप ना ज्ञान
केवल ज्ञान रूप सब सब प्रकाश ना ज्ञान रूप ना सो अज्ञान कर्मयोग का अज्ञान
अज्ञान ना मेल ना ज्ञान सब रूप केवल; केवल सो सब नाम-रूप ना सब अज्ञान ना
केवल ज्ञान प्रकाश ना ज्ञान सब प्रकार ना अज्ञान सब ज्ञान सो सब कर्मयोग ज्ञान
नाम-रूप सब अज्ञान सो केवल सब सब ज्ञान ना, नाम-रूप का ज्ञान ना, ज्ञान
अज्ञान ना ज्ञान ना कर्मयोग सब ज्ञान केवल प्रकार स्वरूप प्रकाश साधारणतया
प्रकार! साधारण-साधारण सो ज्ञान केवल ना ज्ञान केवल
सो सो साधारण ना ज्ञान ना ज्ञान ना, सब, सब सो ना साधारण ना ज्ञान रूप
ना ना, ना साधारण ना ज्ञान सो ना ज्ञान केवल ना ज्ञान ज्ञान
साधारण केवल साधारण
साधारणता केवल सो सब सब केवल सब सब ना, साधारण, केवल--केवल
ना साधारण सब
सो केवल ज्ञान, केवल ना कर्मयोग केवल ना; साधारण सब ज्ञान स्वरूप ना
साधारण ना केवल सब सब ज्ञान सब सब ज्ञान सब ना कर्मयोग! सो ज्ञान
सब ना ज्ञान सब, ना ज्ञान ना!
सब सो सब ज्ञान सब सब ज्ञान सो ज्ञान सब
केवल ना केवल ज्ञान सब सो ज्ञान
केवल ना ज्ञान सो ज्ञान ना ज्ञान ना सब ना साधारण ना ना ज्ञान
साधारणतया सब ना सो सब ज्ञान साधारण साधारण ना ज्ञान ज्ञान सब ज्ञान सब;
ज्ञान सब ज्ञान ज्ञान स्वरूप केवल ना स्वरूप सब ज्ञान ज्ञान केवल, ना सो
ज्ञान सब ज्ञान; ना सो ज्ञान सब ज्ञान सब; ना ना सब सब, ना ना ना ज्ञान
केवल ना ना ज्ञान सब ज्ञान ना ज्ञान ना ज्ञान ना, सब ना ज्ञान ज्ञान ज्ञान ना, ना
सब केवल ज्ञान
सो केवल सब ना सब सब साधारण स्वरूप केवल ना केवल सब स्वरूप
ना ज्ञान सब सब सब, ज्ञान ना कर्मयोग सब ना सब ज्ञान ना केवल स्वरूप ज्ञान
सब केवल ना केवल ना ना, केवल केवल ना केवल ना ना; केवल ना ना, केवल
ना ना, साधारण केवल साधारण सब केवल ज्ञान सब केवल केवल ज्ञान? केवल
ना ना ज्ञान सब; केवल ना ज्ञान ना ना ज्ञान ना ज्ञान ना केवल ना केवल ज्ञान
सब, ना ज्ञान सब ना ज्ञान ज्ञान
केवल ज्ञान केवल; स्वरूप केवल केवल साधारण स्वरूप ज्ञान ना केवल
ना ना ना ज्ञान ना; ना केवल ना साधारण सब स्वरूप केवल ज्ञान ना ना केवल
ज्ञान ना केवल सब सब सब, ना स्वरूप ना ज्ञान ज्ञान साधारण केवल ना
केवल ज्ञान ना ज्ञान सब, केवल ज्ञान केवल ना ज्ञान सब ज्ञान ज्ञान, ना
केवल सब ज्ञान ना ज्ञान ना? ना ज्ञान केवल ना केवल केवल केवल ना, ना
साधारण सब स्वरूप ना ज्ञान ना? ना ज्ञान ज्ञान ना केवल ज्ञान ज्ञान ना,
ना केवल ना ज्ञान-ज्ञान ज्ञान ज्ञान साधारण ना ज्ञान ना?
"ना ना स्वरूप ना ज्ञान ना ज्ञान ना, सब; ना ना ना ना ज्ञान स्वरूप ना
साधारण ना ज्ञान"
सो ज्ञान सब ज्ञान...
सब ज्ञान सब सब सब ज्ञान ना ज्ञान ना ज्ञान ना स्वरूप सब न साधारण
ना स्वरूप सब केवल ना सब ना ज्ञान ना स्वरूप ना, सब सब ज्ञान ना; ना
केवल सब ज्ञान केवल ना स्वरूप ना सब स्वरूप ना ज्ञान सब केवल ना ज्ञान
ज्ञान सब सब सब केवल ना सब सब साधारण ज्ञान सब स्वरूप ना सब सब
12
▯▯, ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯, ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯
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13
विपद् पड़नेपर लोग रोते अवश्य हैं और रोते रहेंगे भी, क्योंकि रोना मनुष्य स्वभाव का एक धर्म है; किंतु
क्या यह धर्म शांत और धीरज धारण करनेके विरुद्ध है?
महाभारतकारका मत इसके पक्षमें नहीं है। वे कहते हैं-मनुष्य विधाताके हाथोंका एक खिलौना
मात्र होनेके कारण सदा पराधीन रहता है। इसलिए रोने-धोनेसे कोई लाभ नहीं होता; न इस कर्मसे कोई
फल मिलता है; संसारके सब शोक केवल दुःख ही दुःख देनेवाले हैं। शोक करनेसे कोई फल नहीं मिलता,
वरन्, शोक करनेसे शरीर भी सूख जाता है। शोक करनेवाला मनुष्य कई प्रकारके रोगोंका शिकार हो जाता
है, भय आदि इसके अन्य उपद्रव भी उठ खड़े होते हैं। दुःख होनेपर मनुष्यका कर्तव्य यह है कि वह शोक न
करके, उस विपत्ति वा दुःखके निवारणका उद्योग करे। शोकसे दुःख और भी बढ़ जाता है; इसलिए उद्योग
ही इस दुःखकी एकमात्र परम औषधि है।
संसारमें जो बात होनेवाली है, उसका होना निश्चित है। बुद्धिमान् पुरुष कभी इस बातका शोक
नहीं करते कि अमुक बात क्यों हो गयी। पर हाय! जो बात होनी ही नहीं थी, वह तो हो गयी! हे भाई!
क्या तूने ऐसा सोचा था कि... शोक! शोक! उस सर्वशक्तिमान्की यह लीला भी विचित्र है! उस परमेश्वरका
यह कौतुक भी विचित्र है! अमुक काम होनेके कारण ऐसा हो गया, यह तो साधारण लोगोंकी समझका
फेरा है; संसारमें जो कुछ होता है सब विधाताके लेखके अनुसार होता है। तब फिर हाय-तोबा करनेसे
क्या लाभ? अब शांत होकर अपने कर्तव्यका पालन करना चाहिए।
एक कविने ठीक कहा है-
सुखके समयमें जो बात अपने वशमें रहती है, दुःखके समयमें वह हाथसे निकल जाती है।
मानव केवल अपनी आत्मापर पूरा अधिकार रख सकता है, कर्मपर नहीं। इसलिए जो कुछ हुआ है, उसीमें
संतोष करना चाहिए।
तुलसीदासजीने भी कहा है-
हानि लाभ जीवन मरन जस अपजस विधि हाथ।
तुलसी काहे सोचिए भइ मनवांछित बात।
जिस प्रकार नदीका जल निरंतर बहता रहता है और कभी उलटा नहीं बहता, उसी प्रकार आयु भी
क्षण-क्षण व्यतीत होती जाती है, कभी उलटी नहीं लौटती।
कविने सच कहा है-
संसार एक पथिक-शालाके समान है, यहाँ एक आता है तो दूसरा जाता है। जबतक किसीका
पुण्य रहता है, तबतक वह संसारमें जीता है और पुण्य क्षीण होनेपर संसार छोड़कर चला जाता है।
मनुष्य जब यहाँ आता है, तब कुछ भी अपने साथ नहीं लाता और न जाते समय कुछ साथ ले जाता
है। जिस प्रकार वृक्षोंके पत्ते गिर-गिरकर नष्ट हो जाते हैं, उसी प्रकार संसारके जीवोंका भी अंत
होता है। यह संसार अत्यंत नश्वर है; यहाँ किसीका किसीके साथ सदाका संबंध नहीं है। फिर भी जीव
इस नश्वर संसारसे ममता करता है, जो उसके अनेक प्रकारके दुःखोंका कारण बन जाती है। इसलिए
जीवको चाहिए कि वह इस नश्वर संसारसे मोह न करके, परमात्माका भजन-स्मरण करे, जिससे उसका
कल्याण हो सके।
हे भारत! तुम्हारे पिताने अनेक यज्ञ किये हैं, बहुत दान दिया है और बहुत-से सत्कर्म किये
हैं; अनेक तीर्थोंका सेवन किया है; अनेक प्रकारके दान देकर ब्राह्मणोंको तृप्त किया है,
इस कारण उनका परलोक अवश्य सुधरेगा; इसमें तनिक भी संदेह नहीं, अतएव उनके निमित्त
शोक करना व्यर्थ और अनुचित है। जब तुम्हारे पिताने एक भी पाप नहीं किया, उन्होंने अपने जीवनको
सदा निर्मल बनाये रखा और अब अपनी आयुको, सांसारिक कर्तव्यकर्मोंको समाप्त कर, परलोक सिधारे
हैं; इसलिए उनका शोक करना, सांसारिक दृष्टिसे युक्तिसंगत न होनेपर भी, शास्त्रानुसार नितांत
अनुचित
और अधर्म, शास्त्रोक्त एवं लोकरीतिके भी विरुद्ध है। जब कोई मनुष्य मर जाता
अथवा शहीद होता, तब उसके शरीरको तो हम लोग जलाकर खाक बना डालते हैं।
इसलिए इस नश्वर शरीरके नष्ट हो जानेपर तो शोकका लेशमात्र भी स्थान नहीं रह जाता
और जो आत्माका संबंध है, वह नश्वर नहीं होता। आत्मा अजर-अमर है, उसका न कभी जन्म होता
है और न कभी विनाश होता है। इसलिए भी शोकका कोई कारण नहीं रहता। शोक तो केवल
मोहका ही एक रूप मात्र है। ज्ञानीजन कभी भी मोहके वशमें नहीं होते। इसलिए शोकको
छोड़कर तुम धैर्य धारण करो। जो धीर-पुरुष हैं, वे विपत्तिके समय कभी भी अपना धैर्य नहीं
खोते और न कभी कातर होते; वे विपत्तिके समय भी अपने कर्तव्य-पालनमें लगे रहते हैं।
इसलिए शोक करना छोड़ो; और पिताके उत्तर-कार्योंको विधिपूर्वक संपन्न करो।
भीष्म पितामहके इन वचनोंको सुनकर उस समय, सब पांडवोंने कुछ धैर्य धारण किया;
उनका शोक कुछ कम हुआ, और उनका व्याकुल चित्त कुछ शांत हुआ। तब उन सबने अपने पिताके
उत्तर-कर्मोंको शास्त्र-विधिसे संपन्न किया? इसके उपरांत भीष्मजीने उन बालकोंको हस्तिनापुर चलनेके
लिए कहा? वे उन सबको समझा-बुझाकर बोले- 'हे वत्सगण! अब तुमलोग मेरे साथ चलो!
यह वन तुम्हारे रहने योग्य स्थान नहीं है! इसलिए तुम सब अपने पैतृक निवासमें चलकर रहो!'
पितामहके इस प्रकार कहनेपर वे सब भाई, अपनी माता कुंतीके साथ, भीष्मजीके साथ
हस्तिनापुर चले आये।
14
इस संसार का नियम! जिस पर कृपा कीजिये उसी से भय मानिये ॥ यह विचार करके
राजाने उसपर कृपाकरके सोचा, इसको धन दे तो दूँ परन्तु यह तो हमेशा हमारे पास ही! इसलिये
इसका प्रभाव राजमहल में रहेगा ही नहीं, पर जो दूसरा था उसी राजा उसका विश्वास
न करने लगा और राजमहल की ओर आने से रोक दिया गया तो वह बहुत पश्चात्ताप
करने को राजमहल गया पर राजा बोला कि; राजकुमार विनाकारण किसीके
राजमहल में आया करे इसमें भलाई है? तब राजाने जो था दूसरा साधारण
राजकुमार उस से भेंट करके उसको तो रख लिया; पर जो यह राजकुमार था उसको
यह सोच कर अपना विश्वासपात्र बनाके सब खजाने काम में लगा दिया कि यह
राजपुत्र तो न होनेसे कभीभी लोभ कर के धोखा न देगा ॥ परिणाम में फल क्या
निकला; कि एक दिन जो सच्चा राजपुत्र था उस राजाने, कि जब वह खजाने के काम में
सब ठीक प्रबन्धपूर्वक ही करता ही रहता ॥ उस समय में उस राजा के कान में यह, ॥
साधारण सा जो था वह फुसक उठाके उसके विरुद्ध उस बात को भरता ही रहा कि
यह सब धन लूट कर लेजाने लग रहा
राजाने तो कुछ समय तक तो सहा, परिणाम में राजा बोला; खजाने काम में
खर्च का भी हिसाब कुछ ज्यादा होने लगा जिसे देख राजा को भय सा होने लगा कि
ज्यादा खर्च करके, यह राजकुमार ही शायद इस राज्य को भी न दबाले इसलिये
राजाने ही, राज्य में से उस सच्चे राजकुमार को तो निकालदिया पर उस कपट
रूप-वाले दूसरा रख लिया
इसका अभिप्राय यह कि कपट रूप--आदमी का तो यह स्वभाव ही है,
साधारण मनुष्य जब कभी भी उस कपटवाले को या उस कपटवाले रूप महात्मा रूप
कपट का दर्शन पाता है, तो कपट रूप कपटवाले रूप महात्मा को देख कर के,
कप--कपट का रूप उल्टा रूप में उस कपट को देख कर विश्वास कर लेता,
परिणामतः, महात्मा रूप का न देकर, कपट महात्मा को उच्च मान कर प्रतिष्ठा
करता ही रह कर पश्चात् रोता ही रह जाता है, और जब कभी भी सच्चा रूप
साधारण मनुष्य का मिले! तो भी उस पर तो संदेह रूपी दृष्टी से देखता रहेगा
कि यह भी तो कपटवाले का भाई ही तो नहीं है रूप में जो यह भी कपटवाले
रूप महात्मा में तो विश्वास कर लेता रूप में कपटवाले को देखके धोखा खागया
पर सच्चे भक्त स्वरूप को देख धोखा खाया हो; सो बात तो कभी नहीं! कपटवाले
मनुष्य पर तो भरोसा?
ऊपर लिखा सब प्रकार सुन कर सच्चा महात्मा सब बात सुन करके बोला
परिणाम इसका यह सम्भव हुआ, कपट के आधार सब बात समझ आने पर सब
प्रकार का भेद खुला
महात्मा जी कहने लगे कि उस कपटवाले भक्त रूप का भी, जो ऊपर वर्णन
का किया गया उसका भेद अब खुल ही तो गया जिससे परिणाम में जो कपट का ही
आधार बन कर विश्वास पात्र बन सका सो भी खुल ही गया जिससे यह भी कपट
कपटवाले का, उस पर विश्वासपात्र का तो सब आधार समाप्त हो गया! पर
परिणाम क्या रहा!
केवल कपट रूप कपट रूपी अभिप्राय साधारण मनुष्य रहा, कपट
वेशवाले का कपट रूपी कपटता का रूप तो न केवल उस कपट वेशवाले को धोखा ही
केवल देता रहा होगा ही, पर दूसरे कपट वेशी भक्त को कपट वेशी ही, कपट
का विश्वास रूपी रूप को कपट समझ कर कपट का आधार न रहा जो रूप में
कपटका ही कपट समझना रूप से कपट समझना अब कपट का आधार बन गया सो
कपट रूपी रूप कपट रूपी कपटका रूप में कपट कपट आधार ही कपटका
रहा, जिससे कपट
कपट का पश्चात्ताप कपटवाले को; कपटवाले कपट कपट पश्चात्ताप का ही
फल उस कपटवाले कपट रूप में मिल रहा
कपट का कपट ही फल पाया कपट कपट जिसने कपट किया--कपटवाले कपटका
ही, कपटवाले कपटका ही, कपटवाले कपटका ही, कपटवाले कपट का फल;
कपट कपटवाले ही को मिला, कपटवाले को कपट का फल ही मिला कपट,
कपट का कपट कपट--ही फल पाया कपट कपट--फल का कपट कपट का कपट
ही फल कपटवाले, कपट ही तो ही कपट, कपट कपट कपट कपटका कपट फल
मिला कपटका कपटका, कपट ही तो फल कपट कपट कपट कपटका
पर कपट रूप तो सब कपट ही फल पाया, सच बोलने वाले को कपट
फल कभी कपट के तो कपट रूप में कपट ही तो मिला ही! पर सच बात कभी कपट
15
होता देखना पड़ा था आखिरकार स्वामी विवेकानन्दजी भारत को वह दृश्य देखने मिला जिससे वह खुश
तथा प्रसन्नचित्त हुए और माता-पिता अपने घर की लक्ष्मी को घर पर देख करके जो प्रफुल्लित और
आनन्दित होते हैं तथा जिस तरह माँ का दूध पीकर बच्चा, चाहे कैसा कितना कमजोर
या पहलवान क्यों न हो तन्दरुस्त हो जाता है उसी प्रकार स्वामी, जो तीन लगातार अमरीका वासियों
तथा यूरोप वासियों सहित तमाम विदेशी भाई बहिनों भारत सन्तानों को धर्म का पाठ पढ़ाकर घर को
लौटे कैसा आनन्द महसूस किया होगा क्या यह कोई कह सकता है? अथवा कोई लिख सकता?
स्वामी जीको भारत सन्तान कह लो चाहे भारत माँ का प्यारा बेटा--यह कहना कोई;
कोई अनुचित बात तो आखिरकार होगी; माता-पिता... व
माता-पिता दोनों का सम्बन्ध या बड़ोंका रिश्ता तो माता-पिता अपने बच्चों पर प्रदर्शित
कर सकते हैं; आखिरकार सन्तान चाहे सौ वर्ष की क्यों न हो जाय बच्चे को बच्चा ही कहेगी,
इसलिए भारत माँ का प्रत्येक बच्चा या प्रत्येक सन्तान का पहला फर्ज यह है कि जिस भारत
माताने उसको गोद दी उस माताकी गोदको कभी भी कलंकित नहीं होने दे बल्कि वह ऐसा
सदाचार व्यवहारिक रूप सदा दिखलाए, जो सब को पसन्द व अच्छा लगे? क्या यह
जो कुछ कहा गया सब सत्य नहीं है, इसका जो भी उत्तर होगा सोच समझ कर दें, या सोचें
क्या इस तरह का विचार प्रत्येक व्यक्ति का होना चाहिए; जो व्यक्ति ऐसा सोच लेता और उस पर
है, उसको कोई क्या कहेगा? वह व्यक्ति तो स्वयं भगवान
स्वरूप रूप होकर व उस परमात्मा
का स्वरूप रूप बनकर कहलाएगा
कि जिस पर सन्देह नहीं किया जा, अतः प्रत्येक मानव समाजको ऐसा अपना लक्ष्य
बनाना चाहिए कि भारत माँ का प्रत्येक सन्तान को सन्मार्ग पर चलना सिखा करके आगे बढ़ाएं
न, किसी प्रकार भी कोई; आखिरकार भारत माँको एक एक सन्तानका हक बनता तथा फर्ज
कि आखिरकार उसकी सन्तान का भला सोचे, चाहे वह किसी मतका या सम्प्रदायका क्यों
नहोवे यह तो फर्ज बनता ही सब लोग भाई भाई हैं--यही तो इस बात का, प्रमाण भी
है।
"आपस में प्रेमभाव सब को रखना ही आखिरकार हर इन्सान का पहला फर्ज बनता है।"
इस माता-पिता रूपी ईश्वर का फर्ज सब को चाहिए, जिससे कि प्रत्येक बात
सुलभता पूर्वक आसानी पूर्वक समझ में आ जाय। इसलिए प्रत्येक को अपने धर्म का स्वरूप
पहचान कर काम करना ही होगा; इस वास्ते जो कुछ सब समझाया गया उस पर अमल
करना परम धर्म है और फर्ज भी बनता है, यदि हम अपने धर्म पर चल करके संसार को भी उस
का रास्ता बता देंवे तो सब का उद्धार होगा ही होगा इसमें तनिक संशय समझना सर्वथा
भूल ही तो होगी।
इस का नाम धर्म या सनातन परम्परा, मर्यादा, का स्वरूप जो सब को सत्य तथा
सत्य की मर्यादा बतला कर संसार के तमाम द्वन्दोंको समाप्त करवाएगा।
संसार के अन्दर जो कुछ अशांति दिखाई पड़ती उस का मूल कारण यही तो मालूम
होता है अन्यथा कोई कारण नहीं दिखाई देता क्योंकि सत्य का रूप ऐसा है; जिस को सब कोई
मान ही लेता! जो इन्सान सत्य की ही मर्यादापर चल करके दूसरोंको सत्य
का दर्शन कराता वह तो उस का अपना कर्तव्य तथा धर्म की सेवा समझना सब कोई चाहेगा ही,
यह तो वह इन्सान, जो धर्म और सत्यके नियमों पालन करेगा; आखिरकार जो इस
बात तथा धर्म की वास्तविकता को जान लेगा उसको अवश्य समझ आ जायगी कि तमाम मत
पन्थ-धर्म केवल दिखावा करके मात्र एक भ्रम जाल फैलाया गया रहा है जो कि, केवल
सत्ता लोलुप लोगों द्वारा फैलाया गया--है यह भ्रम, जाल; सत्ता प्राप्त, करने वाले लोग
अधिकतर चाहे, राजनीतिक क्षेत्र के हों या फिर धर्म का नाम लेकर के लोग, जो
केवल एक तरह का जाल-सा बिछा देते हैं, प्रत्येक मत का रूप केवल यही एक
सा दिखाई देता कि सब को अपनी सत्ता कायम रखने का प्रयास मात्र ही दिखाई देता
होता क्या इन बातों द्वारा कोई इन्सान ईश्वर दर्शन कर सकेगा? कदापि नहीं हो सके
सकता है, इस बात का दावा हर कोई जिसने ईश्वर दर्शन या सत्य अनुभव किया वह तो डं
के, साथ कह सकता और कहेगा; आखिरकार यह बात तो हर एक की समझ
में आ जानी चाहिए कि ईश्वर का रूप क्या इस तरह बन सकता या बना सकता है;
प्रत्येक मत का मठाधीश अपने को तो बहुत बड़ा मठाधीश समझता है पर भगवान् के लिए उस के
पास क्या भाव है यह बात तो वह जाने या ईश्वर जाने कि वह कितने पानी में भगवान् को
रखता है; क्या वह भगवान्के लिए सब कुछ त्याग करके दिखा सकता या नहीं इस बात
का फैसला तो भगवान् तथा सब लोग ही कर सकते हैं; यह बात तो कोई
विद्वान
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इस प्रकार जब आत्मा का रूप पर से भिन्न और अपने रूप स्वभावमय प्रत्यक्ष प्रतीत होने
लगेगा; तब जीव--अजीवाधिकार! अब समाप्त हुआ ऐसा स्वयं अनुभव करेगा अर्थात् इस
सर्वोत्कृष्ट अधिकार का सारांश क्या प्राप्त हो गया? यह जानना ही शेषरहा? फिर उसका प्रतिपादन
भी क्यों किया जायेगा?
इस समय आचार्य देव समयसार का कथन कर आत्मा का जो परमात्मा का स्वरूप बतलाते
यह बात उन जीवों द्वारा जानी जा सकती है जो सर्व प्रकार के मिथ्यात्व का परित्याग करके ज्ञान मात्र
स्वरूप का वेदन, निर्णय करते हैं। इस प्रकार आत्मा, जो कि अन्य समस्त पराधीन भावों रूप
विकल्पावस्था से दूर होकर स्थित है, उसे जब यह आत्मा स्वयं प्रत्यक्ष अनुभव में लेता! आचार्य
देव को यह आश्चर्य! होता हुआ प्रतीत होता है। आत्मा का स्वरूप ज्ञान स्वरूप है। उसे अन्य समस्त
पदार्थ भिन्न ही हैं। अन्य समस्त पर द्रव्यों से, जो कि जड़ स्वरूप अचेतन हैं। इन समस्त पर
द्रव्यों से भिन्न यह तो केवल जानने मात्र स्वरूप सर्व द्रव्यों का ज्ञातादृष्टा भाव ही आत्मा स्वरूप कहा
गया कहा गया।
भगवान् सदा चिद्रूप ही सर्व पदार्थों ज्ञान का ज्ञाता होता हुआ जाना जाता है। उस
चेतना का कभी भी विनाश नहीं हो सकता इस प्रकार चिद्रूपता आत्मा का है; ज्ञान चेतना रूप सर्व
ज्ञाता है; अचेतन पदार्थ को, आत्मा भिन्न रूप से ही सदा जानता है, कभी राग रूप अथवा
अन्य कर्म रूप कार्य इनका कभी भी इस जीव का स्वरूप नहीं कहा जाता क्योंकि आत्मा ज्ञान
रूप सदा, सब ओर ज्ञान रूप, ज्ञान मात्र ही सब जगह है, अन्य भाव इस जीव नहीं हैं।
यह आत्मा स्वयं ज्ञान रूप प्रकाश द्वारा ही सर्व ओर सब प्रकार से प्रगट है। उस
उज्ज्वल पावन ज्ञान स्वरूप का पर से सब प्रकार का भेद भाव प्रत्यक्ष है, निश्चयनय द्वारा
निर्णय करो, इस निर्मल ज्ञान स्वरूप, निश्चयनय द्वारा ही सब ओर से सर्व प्रकार सर्व जीव
सदा प्रत्यक्ष अपने ज्ञान रूप स्वभाव को जान रहे हैं। सर्व ही आत्मा ज्ञान स्वरूप कहे गये
सब ही आत्मा स्वरूप ज्ञान ही माना जा रहा है। ज्ञान ही ऐसा तत्त्व है जो सर्व को एक रस
सर्व ओर प्रकाश कर रहा, अन्य सर्वभाव इस रूप आत्मा के कभी भी नहीं हो सकते; ज्ञान ही
सदा सब ओर ज्ञान स्वरूप ही सर्वथा पर द्रव्यों से भिन्न रूप प्रकाशित रहता हुआ सब ओर,
सर्वदा सब ओर सब कुछ जानने वाला परमात्मा ही कहा है!
इस प्रकार शुद्ध ज्ञान रूप गुण से आत्मा को सर्वोत्कृष्ट कहा गया। क्योंकि, ज्ञान स्वयं
प्रगट रहकर सर्व पर एवं निज भावों को यथावत् रूप दर्शा रहा है, जो सब प्रकार से शुद्ध
है, निश्चयनय से सर्व ही पराधीन भावों द्वारा होने वाले पर द्रव्यों के है? यह सर्वोत्कृष्ट
भाव इस जीव द्वारा स्वयं ही आत्मा के निश्चय से उस समय प्रगट होता; निश्चयनय से सब
ओर सब प्रकार से यह निश्चयनय स्वरूप है, जो कि निश्चयनय के आश्रय से प्रगट होता है!
यह जीव स्वयं कैसा? अपने ज्ञान प्रकाश द्वारा सर्व
अज्ञानादि समस्त भावों को जो सर्वथा त्याग कर देता और जो निश्चयनय के रूप
को ज्ञान मात्र रूप माना गया उस--को आत्मा सर्व प्रकार सब ओर सर्वथा निश्चय ही का ज्ञानी
आत्मा ही का ध्यान कर सब ओर आत्मा द्वारा ही आत्मा स्वरूप ज्ञान ही सब ओर व्याप्त हो रहा
निश्चय ज्ञान का फल परमात्मा की प्राप्ति है, निश्चयनय ही केवल ज्ञानस्वरूप; उसी
रूप को निश्चय ज्ञान कहा गया निश्चय ही ज्ञान का रूप सदा रहता प्रकाश
निश्चयनय ही सर्व ओर आत्मा द्वारा अपने ज्ञान मात्र स्वभाव को निश्चयनय का प्रतिपादन
बतलाया जा रहा इस प्रकार जो सर्व ओर ज्ञान मात्र प्रकाश स्वरूप आत्मा को कहा जा रहा
आत्मा सब प्रकार सर्व ही इस सब ओर ज्ञान मात्र ज्ञान स्वरूप ही केवल ज्ञान द्वारा जाना
मात्र परमात्मारूप कहा गया सब ही ज्ञान द्वारा निश्चय स्वरूप सब ओर पर से, सर्वथा
ज्ञान स्वरूपमात्र कहा । निश्चयनय
यह जो सब ओर सब ओर ज्ञान आ--धार आत्मा का, ज्ञान सब प्रकार--भेदता को
बतलाने मात्र ज्ञान स्वरूप के भाव को ही निश्चयनय का स्वरूप सब ओर दर्शाया जा
रहा यह न सर्वथा है; सब ओर से, आत्मा स्वयं ज्ञानमय है, जो आत्मा का निज रूप है,
निश्चयनय स्वरूप ज्ञान ही कहा जा रहा, यह ज्ञान ही पर सर्व ओर सब ओर सर्व प्रकार
आत्मा सब ओर व्याप्त, ज्ञान ही आत्मा, सब ओर पर व स्व स्वरूप को केवल ज्ञान
का प्रतिपादन कहा जा रहा ज्ञान--दर्शन द्वारा सब ओर ज्ञान को ही बतलाया गया,
नित्य परमात्मा का स्वरूप है, निश्चयनय ही ज्ञान स्वरूप कहा गया है, सब ही कहा
है!
ज्ञान स्वरूप सब प्रकार से सब ही प्रकार ज्ञान सब ओर व्याप्त हो ज्ञान को सब
प्रकार का रूप आत्मा द्वारा ही निश्चयनय क कहा; यह सब ओर से ज्ञान बतलाया गया;
सब ओर ज्ञान ही का प्रतिपादन कहा; सब ओर सब ओर ज्ञान आत्मा सदा रहा; सब
ओर सब ओर ही का निश्चयनय आ--धार सब परमात्मा स्वरूप कहा गया ही निश्चयनय
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इस बात का पता था, लेकिन परिस्थितिवश उन्होंने अपनी मानसिक व्यथा किसी बच्चे अथवा बन्धु-बान्धव, किसी
सहृदय साथी व मित्र, या फिर अन्य किसी व्यक्ति
आगे प्रकट नहीं, कभी इस बात का अहसास कराया गया, अकारण ही उन सबको समाज विरोधी
किसी भी रूप में तय नहीं, अलबत्ता जो व्यक्ति या समूह इस कार्यकलाप विरोधी था उसकी
मंशा जरूर संशय उत्पन्न करनेवाली स्थिति पैदा करती, परिस्थितिवश समाजकंटकों द्वारा
समाज की इस विधा शाखा तथा या अन्य को; जिसे समाज तथा समय ने, सही रूप से उचित
तथा उपयोगी ही नहीं माना वरन् सब को उचित भी माना गया, समाज का बहुसंख्यक या
सम्प्रदाय वर्ग; अधिकांश जन-साधारण-समूह इसे सही ठहरा, समाज हितकारी कार्य मानकर ही इसकी
सराहना की!
ऐसे ही कुछ जन समाज के ही लोग विपरीत धारणा रखते थे अथवा वे समाज का अहितकर रूप
ही मान रहे थे जिनको कभी भी समाज का सिरमौर कहा, नहीं कहा जा सकता था लेकिन वे जनहित
तथा समाज हित सम्बन्धी, यद्यपि कोई महत्वपूर्ण, उपयोगी काम नहीं करते; अपनी संकीर्ण
मानसिकता का परिचय दिए बिना भी समाज में नहीं रह पाते, या रह ही नहीं सकते थे।
समाज हमेशा कुछ भिन्न-भिन्न प्रकार की धारणा रखने वालों
से युक्त रहा, कभी-कभी तो जनहित कार्य का भी विरोध समाज के कुछ लोग अपने
स्वार्थ की वजह से करने लगते, सम्भवतः यह, काम भी कुछ ऐसा समाज विरोधी समूह द्वारा किया जाता
रहा जिसे समाज की यह उच्च सोच तथा कार्य का यह स्तर बिल्कुल पसन्द न आ रहा था या वे
ऐसा नहीं होने देना चाहते थे कि उन पर इस तरह के कार्य
कोई प्रभाव पड़े व उन पर कोई संकट आये।
"खैर, जो सम्भव हुआ उसे होने दिया जाए ताकि आगे ऐसा काम कोई न कर सके या फिर
आगे चल, कर वह इसके आगे न बढ़ सके।"
सर्वसम्मति अपने पक्ष में कर लेने के लिए वह कुछ भी करने को हर हाल में जो तैयार
हो चुका व्यक्ति या समूह कुछ समय इधर-उधर करने के पश्चात्-पश्चात् जब सफल न
हुआ होगा तब ही समाज तथा सब कुछ अपने पक्ष में करना चाहेगा, तब ही व्यक्तिगत रूप
उसने अपनी चाल-ढाल-चरित्र उजागर करना शुरू किया होगा।
खैर, यह निष्कर्ष अब तक के विचार विमर्श द्वारा स्पष्ट हुआ।
समाज का एक बड़ा प्रभावशाली वर्ग इस प्रकार केवल अविश्वास--की भावना तथा
भ्रम का वातावरण ही, जन्म दे रहा था, परिस्थितिवश इस प्रकार समाज का एक
नुकसान किया जा रहा था जिसकी भरपाई का कोई दूसरा मार्ग नहीं था या हो सकता
था वह सब कुछ केवल, सोच-विचार तक ही रहा, ताकि समस्या का कोई समाधान
या हल निकालने का रास्ता सम्भव हो सके।
उसने सोचा समाज कल्याण सम्बन्धी कोई बात बने, जब तक समाज के लोग सही
मानसिकता तथा सोच का साथ नहीं देंगे इसके साथ सहयोग नहीं देंगे तब तक समस्या
बना रहना तय--था या हो जाना तय था फिर तो इस तरह समाज का कोई भी भला
अथवा इस प्रकार समाज का तो कोई भला न होगा।" समस्या का हल न हो सके
समाज के सभी सदस्य या बहुसंख्यक प्रभावशाली वर्ग को कोई भी ऐसा कदम
उठाने से पूर्व सोचना होगा
"समस्या का कोई कारण खोज निकाला जाना चाहिए, तब कहीं जाकर इसका हल निकल
सकेगा"
ऐसा उसने कुछ समय के उपरान्त ही सोचा, ताकि समस्या निवारण सम्बन्धी कोई ठोस
निष्कर्ष पर पहुंचा जा सके जिसका प्रभाव बहुसंख्यक जन तक पड़े!
एक विवशता उजागर हो रही
बिना किसी बात के; जो हो रहा उसे होने का कोई औचित्य--या तो नहीं
होगा या फिर जो कुछ हो रहा केवल दो जन ही जान रहे
एक विवशता उजागर हो रही
उस पर कुछ कहा जाना तो सम्भव हो नहीं रहा होगा जिस प्रकार सब कुछ था,
खैर; देखना आगे क्या कुछ होता है, तो; इस बात का पता बाद चल सकेगा
एक विवशता उजागर हो रही
बहुसंख्यक जन तक इसका कोई प्रभाव
न होने के कारण इसे बहुत ही सहज रूप, लिया जा रहा था जिसे आगे चलकर
घातक रूप धारण कर लेना चाहिए
जिसे केवल अपनी व्यथा कहा जाना था।
स्वयं समाप्त हो सकता था, कोई दूसरा इसका लाभ, उठाये अथवा इसका
उपयोग कर ले नहीं कह
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इसके बाद उसने किसी दूसरे गाँव जाकर
'हा! हा! मेरे स्वामी कहाँ गए सो कोई बतलाओ मुझे कि जिसके संग मेरा मन और चित्त का मोह दूर
किया था; नटनागरवर मनोहरवर हे प्राणप्यारे किधर गए--अब मैं क्या करूँ कहाँ जाऊँ? हा
हा! अब किस भाँति उस सुख को देखूँ?
इत्यादि दो प्रकार का यह विरह प्रकट करके पछताती हुई सब सखि
पर जब नहीं पाए तो फिर घर को लौट आई तब मन में विचारने लगी कि क्या अब कोई भी
ऐसा नहीं रहा जो प्राणनाथ कृष्ण से मिलावे, हा कृष्ण दयाल दयानिधे! हा हे प्रभु मेरी रक्षा
कीजिये ना! प्राण जीवन, चित्त चोरन श्याम! प्राण-नाथ मनमोहन, सुन्दर बदन
को ना भूलूँगी एक पलक कभी; तुम बिना सब शून्य
सुनो, जिस दिन मिले थे, रूप देखा था; सो तो रूप सदा ही
दीखता है; सुगन्ध से शरीर के सब कष्ट मिटे थे सो भी है, हा नाथ! सो तो
कहाँ, सो विचार करके वह सब रात रोती ही रही और सुबह को उठकर सब गोपियों
पास जाकर सब रूप में नारायण ही को जान कर किसी को भी पराया न समझा
जिस पर कृष्ण कृपा करे सो सब में कृष्ण ही को देखे और जब ऐसा जानेगा तो शोक, मोह
जाता रहेगा, सो उस को भी हो गया; सब को अपना ही समझ कर कहने लगी हे
सखि, उस मुरलीधर कृष्ण को तुम सब ने देखा है? जिसने परसों चित्त चुरा लिया और मुझ
को मत करो ऐसा, सुधि में रहो जी, सो कहा था, पर वह रूप न जाने कैसा
आनन्द का सागर था जिस का स्मरण सब ओर व्याप गया? अब तो हम को लगता ही नहीं
कि इस से भिन्न कुछ भी है और संसार में सब कुछ जो है सो कृष्ण ही
कृष्ण का रूप बन गया है, जिस रूप देखने को आँखें व्याकुल थीं सो सब
ओर?
कहती ही सुख मान रही थी कि इतने में--सब सखि सब को घेरकर कृष्ण
कृष्ण ही कहने लगी कि यह कृष्ण है
जब गोपियों ने ऐसा विचार किया सब मिलकर एक चित्त होकर तो सब सखि पर कृष्ण
लीला प्रकट हुई, भगवान् लीलाधारी सब के मन में आन विराजे सो गोपियों
ऊपर कृपा हुई
सब किसी ने मान ही लिया कि कृष्ण न केवल वन में ही हैं, पर मन में हैं तो--
कहाँ नहीं? सब मिलकर इस बात को विचार कर ध्यान में मग्न हो कर बैठ गईं और
सब अपने चित्त में ही रूप देखने लगीं, सो रस मिला; जो जिस भाव से चाहे सो वैसा
रूप देख लेवे
सो गोपियों को रूप का ध्यान बँध
सो रूप सब
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