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सर्वकोश
अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)

अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1976 (उद्गम)

DevanagariHindipublished183 पृष्ठ

पृष्ठ 7, कुल 183 में से

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पर क्या कहिये, इन जन्म-मरण सम्बन्धी बातों को सब कोई जानते हुए भी चेतते तो
कोई कोई ही, सब ही इसमें सचेत नहीं हैं॥
संसार के पदार्थ मात्र ही सब ऐसे हैं, कदाचित् अपने समय पर अच्छे
तथा सुखद प्रतीत होते भी परिणाम में दुःख रूप ही बन जाते हैं॥
पहिले तो इन पदार्थों का हम संस्कार ऐसा बना लेते हैं कि यह पदार्थ सदा
बने ही रहने के योग्य हैं॥ इस लिये, हाय, हाय--जब कभी इनका नाश
हुआ, उस समय कितना रोना पीटना पड़ता है! देखिये, सब लोग न तो एक! साथ
पैदा होते हैं और न एक साथ ही मरते हैं; पहिले किसी की माता मरी तो पीछे उसका
पुत्र या कोई अन्य सम्बन्धी मरा और रोया गया; पहिले किसी का पिता मरा
तो पीछे उसका
भाई मरा अथवा कोई अन्य, पर इन सब को विचार पूर्वक देखा जाय तो
सभी किसी न किसी को पहले और पीछे अपनी-अपनी पारी के अनुसार
अवश्य मरना ही पड़ता है॥ पर तो भी मनुष्य इन सब बातों को देखकर भी; यदि इन
अनित्य बातों को नित्य मान कर बैठ जावे तो मनुष्य की बुद्धि को सिवाय
मन्द बुद्धि के और क्या कहा जा सकता है! इस बात को और अधिक समझाने के
लिये; इस विषय के सम्बन्ध में नीचे, दो दोहे दिये जाते हैं जिनको पढ़ कर
सब को यह निश्चय हो जायगा कि ऐसा होना सच है; परन्तु फिर आश्चर्य की
बात यह कि सब कुछ जानते हुए भी मनुष्य न; इस बात को भूल कर संसार
सम्बन्धी
दो० एकहि इक करि जगत ते, गये अनेक अनेक॥
गये सबहिं जे हैं गये, पै न गये कहुं एक॥
सबहिं एक मग जात कछु, बिचले पै यह रीति॥
ऐसो काल प्रभाव बड़, गयउ सबै बिपरीति॥
इन दो दोहों का अर्थ यह है कि इस संसार में से एक एक करके,
अनेक ही एक हो कर चले गये अर्थात् मर गये, अर्थात् सब ही
गये हैं, परन्तु आज तक किसी मनुष्य का यह भाव देखने में
नहीं आया कि अब
संसार से कोई भी मनुष्य न मरेगा॥
सब लोगों को यह मालूम, देखने में तो आ रहा है कि जन्म--मरण
का चक्र तो सब ही के ऊपर अपनी सत्ता जमाये हुए ही है और यह
संसार भी तो एक सराय अथवा धर्मशाला की तरह ही सब के लिये बना हुआ
है॥ सब ही इसमें कुछ काल के लिये ठहरते हैं? पर आश्चर्य तो यह है कि
इन सब बातों को जानकर भी मनुष्य अपने मन को कुछ ऐसा बना लेता है, जिससे वह
सब को धोखेबाज रूप में समझ कर, सब को अपने अधिकार में ही रखना
चाहता हुआ दिखाई देता है; अपने-सम्बन्धियों को चाहे वह, अपने-पराये
ही अथवा अन्य कोई हों; इस बात को; कदापि न सोचेगा कि, यह सब
भी; अपनी ही तरह से इस संसार को, छोड़ जायेंगे॥
इस कारण मनुष्यों को उचित है कि सब बातों को जानकर अपने
को नित्य सत्य आनन्द परमात्मा तथा अपने स्वरूप को सब बातों से अलग
समझता हुआ परमात्मा का भजन करे तथा ऐसा उपाय करे, जिससे
फिर इस प्रकार के जन्म मरण रूप संसार के कष्टों को भोगना न पड़े॥
संसार की ऐसी दशा, सब को नित्य परमात्मा के स्वरूप को भूल कर; इस विषय
का अनुभव कराने के लिये ही॥
संसार में मनुष्य को, अपनी देह तथा अपने समस्त बन्धु
तथा संसार सम्बन्धित वस्तुएं सब ही किसी न किसी प्रकार से
अति आनन्ददायक प्रतीत होती हैं पर वास्तविकता में ये सब की सब
क्षणभंगुर होने के कारण अनित्य ही हैं॥ जन्म-मरण रूप यह संसार का
विषय ही ऐसा है कि जिस से सब जीवों को, दुःख ही दुःख उठाना पड़ता
है। संसार के लोग जिस सुख को अपने लिये सुखकारी मानते हैं, वह भी, अपने
ही! बन्धन का कारण है? परन्तु ऐसी दशा, ज्ञान रूपी
प्रकाश के बिना समझ में आनी असम्भव है॥ जब--कि प्रत्येक
को यह बात भली प्रकार विदित हो चुकी है? तब मनुष्य सुख की
लालसा क्यों करता है; सब सुख व्यर्थ ही हैं; सो भी क्षण-
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