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सर्वकोश
अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)

अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1976 (उद्गम)

DevanagariHindipublished183 पृष्ठ

पृष्ठ 20, कुल 183 में से

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इसके बाद उसने किसी दूसरे गाँव जाकर
'हा! हा! मेरे स्वामी कहाँ गए सो कोई बतलाओ मुझे कि जिसके संग मेरा मन और चित्त का मोह दूर
किया था; नटनागरवर मनोहरवर हे प्राणप्यारे किधर गए--अब मैं क्या करूँ कहाँ जाऊँ? हा
हा! अब किस भाँति उस सुख को देखूँ?
इत्यादि दो प्रकार का यह विरह प्रकट करके पछताती हुई सब सखि
पर जब नहीं पाए तो फिर घर को लौट आई तब मन में विचारने लगी कि क्या अब कोई भी
ऐसा नहीं रहा जो प्राणनाथ कृष्ण से मिलावे, हा कृष्ण दयाल दयानिधे! हा हे प्रभु मेरी रक्षा
कीजिये ना! प्राण जीवन, चित्त चोरन श्याम! प्राण-नाथ मनमोहन, सुन्दर बदन
को ना भूलूँगी एक पलक कभी; तुम बिना सब शून्य
सुनो, जिस दिन मिले थे, रूप देखा था; सो तो रूप सदा ही
दीखता है; सुगन्ध से शरीर के सब कष्ट मिटे थे सो भी है, हा नाथ! सो तो
कहाँ, सो विचार करके वह सब रात रोती ही रही और सुबह को उठकर सब गोपियों
पास जाकर सब रूप में नारायण ही को जान कर किसी को भी पराया न समझा
जिस पर कृष्ण कृपा करे सो सब में कृष्ण ही को देखे और जब ऐसा जानेगा तो शोक, मोह
जाता रहेगा, सो उस को भी हो गया; सब को अपना ही समझ कर कहने लगी हे
सखि, उस मुरलीधर कृष्ण को तुम सब ने देखा है? जिसने परसों चित्त चुरा लिया और मुझ
को मत करो ऐसा, सुधि में रहो जी, सो कहा था, पर वह रूप न जाने कैसा
आनन्द का सागर था जिस का स्मरण सब ओर व्याप गया? अब तो हम को लगता ही नहीं
कि इस से भिन्न कुछ भी है और संसार में सब कुछ जो है सो कृष्ण ही
कृष्ण का रूप बन गया है, जिस रूप देखने को आँखें व्याकुल थीं सो सब
ओर?
कहती ही सुख मान रही थी कि इतने में--सब सखि सब को घेरकर कृष्ण
कृष्ण ही कहने लगी कि यह कृष्ण है
जब गोपियों ने ऐसा विचार किया सब मिलकर एक चित्त होकर तो सब सखि पर कृष्ण
लीला प्रकट हुई, भगवान् लीलाधारी सब के मन में आन विराजे सो गोपियों
ऊपर कृपा हुई
सब किसी ने मान ही लिया कि कृष्ण न केवल वन में ही हैं, पर मन में हैं तो--
कहाँ नहीं? सब मिलकर इस बात को विचार कर ध्यान में मग्न हो कर बैठ गईं और
सब अपने चित्त में ही रूप देखने लगीं, सो रस मिला; जो जिस भाव से चाहे सो वैसा
रूप देख लेवे
सो गोपियों को रूप का ध्यान बँध
सो रूप सब
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