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सर्वकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

पृष्ठ 185, कुल 410 में से

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पृष्ठ 185

५९. सू० ] शब्दपरिणामपरीक्षाप्रकरणम् १६७
योश्च व्याघातादनर्थान्तरत्वं न भवति । अनियमश्च नियतत्त्वान्नियमो न भव-
तीति नात्रार्थस्य तथाभावः प्रतिषिध्यते, किं तर्हि ? तथाभूतस्यार्थस्य नियम-
शब्देनाभिधीयमानस्य नियतत्त्वान्नियमशब्द एवोपपद्यते । सोऽयं नियमादनियमे
प्रतिषेधो न भवतीति ॥ ५८ ॥
६. न चेयं वर्णविकारोपपत्तिः परिणामात्, कार्यकारणभावाद्वा; किं तर्हि ?
गुणान्तरापत्त्युपमर्द्धह्रासवृद्धिलेशश्लेषेभ्यस्तु विकारोपपत्तेर्वर्णविकारः ॥ ५९ ॥
स्थान्यादेशभावादप्रयोगे प्रयोगो विकारशब्दार्थः, स भिद्यते । गुणान्तरा-
पत्तिः-उदात्तस्यानुदात्त इत्येवमादिः । उपमर्दो नाम एकरूपनिवृत्तौ रूपान्तरोप-
जनः । ह्रासः = दीर्घस्य ह्रस्वः । वृद्धिः-ह्रस्वस्य दीर्घः, तयोर्वा प्लुतः । लेशः =
लाघवम्, स्त इत्यस्तेर्विकारः । श्लेषः = आगमः, प्रकृतेः प्रत्ययस्य वा । एत एव
विशेषा विकारा इति एत एवादेशाः । एते चेद्विकाराः उपपद्यन्ते तर्हि वर्ण-
विकारा इति ॥ ५९ ॥
का प्रतिषेध है । स्वीकृति तथा निषेध परस्पर विरुद्ध हैं, अतः ये पर्याय नहीं बन सकते ।
तथा 'अनियम' के नियमतः रहने से अनियम नियम नहीं है—ऐसा प्रतिषेध नहीं किया
गया है; किन्तु 'यही नियम है'—ऐसा ही भाव समझना चाहिये । इस प्रकार, छल-
वादी का नियम से अनियम में प्रतिषेध नहीं बनेगा ॥ ५८ ॥
६. हमारा यह वर्णविकारोपपादन परिणाम या कार्यकारणसम्बन्ध से नहीं, अपितु—
गुणान्तरापादन; उपमर्द, ह्रास, वृद्धि, लेश, श्लेष—इनसे विकारोपपादन होने से
वर्ण विकार हैं ॥ ५९ ॥
'विकार' से हमारा तात्पर्य है—स्थान्यादेशभाव होने से स्थानी अक्षर का प्रयोग
न कर आदेश का प्रयोग करना । उसके भेद हैं—
१. गुणान्तरापत्ति, जैसे—उदात्त स्वर का अनुदात्तविधान । २. उपमर्द से तात्पर्य
है—एक रूप की निवृत्ति होने पर रूपान्तर का उत्पाद । ३. ह्रास, जैसे—दीर्घ का
ह्रस्वविधान । ४. वृद्धि, जैसे—ह्रस्व का दीर्घ या ह्रस्व-दीर्घ का प्लुतविधान । ५. लेश
का अर्थ है—लाघव = अल्पीभाव, जैसे 'अस्ति' का द्विवचन 'स्तः', यहाँ 'अ' का लोप
करके लाघव किया गया । ६. श्लेष, अर्थात् प्रकृति या प्रत्यय का आगम । इतने ही
विशेष विकार हैं, अतः इतने ही आदेश हैं । यदि वर्ण में ये उपर्युक्त आदेश विकार
कहें गये हैं तो हम भी उसे वर्णविकार मान लेंगे । इस स्थिति में हमारा आप से कोई
विरोध नहीं ॥ ५९ ॥
[ इस प्रकार, वर्णों की अनित्यता का प्रतिपादन कर, अब शब्दप्रामाण्योपयोगी
'पद' का निरूपण कर रहे हैं—]