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न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

पृष्ठ 184, कुल 410 में से

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पृष्ठ 184

१६६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० २. आ०
अत्रेति प्रयुज्य चिरं स्थित्वा ततः संहितायां प्रयुङ्क्ते-दध्यत्रेति। चिरनिवृत्ते
चायमिवर्णे यकारः प्रयुज्यमानः कस्य विकार इति प्रतीयते ! कारणाभावात्
कार्याभाव इति अनुयोगः प्रसज्यत इति ॥ ५५ ॥
५. इतश्च वर्णविकारानुपपत्तिः-
प्रकृत्यनियमात् १ ॥ ५६ ॥
इकारस्थाने यकारः श्रूयते, यकारस्थाने खल्विकारो विधीयते-विध्यति
इति । तद्यदि स्यात् प्रकृतिविकारभावो वर्णानाम्, तस्य प्रकृतिनियमः स्यात् ।
दृष्टो विकारधर्मित्वे प्रकृतिनियम इति ॥ ५६ ॥
अनियमे नियमान्नानियमः ? ॥ ५७ ॥
योऽयं प्रकृतेरनियम उक्तः स नियतो यथाविषयं व्यवस्थितो नियतत्वान्नियम
इति भवति, एवं सत्यनियमो नास्ति । तत्र यदुक्तम्-‘प्रकृत्यनियमात्’ इति,
एतदयुक्तमिति ? ॥ ५७ ॥
नियमानियमविरोधादनियमे नियमाच्चाप्रतिषेधः ॥ ५८ ॥
नियम इत्यत्रार्थमभ्यनुज्ञा, अनियम इति तस्य प्रतिषेधः । अनुज्ञातनिषिद्ध-
का प्रयोग करता है। इवर्ण के चिरनिवृत्त होने पर प्रयुज्यमान यकार किसका विकार
प्रतीत होगा ! कारणाभाव से कार्याभाव है-ऐसा अनुयोग आपके हेतु हेत्वाभास
ही है ॥ ५५ ॥
५ इस कारण भी वर्णविकार का उपपादन नहीं होगा-
(वर्णविकारों का) प्रकृतिनियम न होने से ॥ ५६ ॥
इकार के स्थान में जो यकार श्रुत होता है, जैसे-‘विध्यति’, यहाँ यकार के स्थान
में इकार का विधान उपलब्ध है। यदि वर्णों का प्रकृतिविकृतिभाव होता तो प्रकृतिनियम
बन सकता था; क्योंकि लोक में विकारी पदार्थों का प्रकृतिनियम देखा जाता है ॥ ५६ ॥
छलवादी की शंका-
यह अनियम में नियम होने से अनियम नहीं, (नियम ही है) ॥ ५७ ॥
आप ने यह जो वर्णों के विषय में प्रकृति का अनियम सिद्ध किया वह अपने विषय के
लिये व्यवस्थित होने के कारण ‘नियम’ ही सिद्ध होता है। ऐसा होने पर अनियम कहाँ
रहा ! अतः आप ने अभी जो ‘प्रकृत्यनियम’ हेतु दिया था, वह अनुपपन्न है ॥ ५७ ॥
उत्तर-
नियम ‘अनियम’-दोनों का शाश्वतिक विरोध होने से, अनियम में नियम बताने
से प्रतिषेध नहीं बनता ॥ ५८ ॥
‘नियम’ इस शब्द से तदर्थ की स्वीकृति है, ‘अनियम’ इस शब्द से तदर्थ
१. 'वर्णविकाराणाम्' इत्यधिकः पाठः क्वचित् ।