न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 186, कुल 410 में से
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शब्दशक्तिपरीक्षाप्रकरणम् [ ६०-७१ ]
पद-अर्थनिरूपणम्
ते विभक्त्यन्ताः पदम् ॥ ६० ॥
यथादर्शनं विकृता वर्णा विभक्त्यन्ताः पदसंज्ञा भवन्ति । विभक्तीर्द्वयी-
नामिकी, आख्यातिकी च । ब्राह्मणः, पचतीत्युदाहरणम् ।
उपसर्गनिपातास्तर्हि न पदसंज्ञा, लक्षणान्तरं वाच्यमिति ? शिष्यते च
खलु नामिक्या विभक्तेरव्ययाल्लोपः, तयोः पदसंज्ञार्थमिति । पदेनार्थसम्प्रत्यय
इति प्रयोजनम् ॥ ६० ॥
नामपदं चाधिकृत्य परीक्षा, गौरिति पदं खल्विदमुदाहरणम्, तदर्थे—
व्यक्त्याकृतिजातिसन्निधावुपचारात् संशयः ॥ ६१ ॥
अविनाभाववृत्तिः = सन्निधिः । अविनाभावेन वर्तमानासु व्यक्त्याकृतिजातिषु
गौरिति प्रयुज्यते, तत्र न ज्ञायते—किमन्यतमः पदार्थः ? उत सर्व इति ॥ ६१ ॥
व्यक्तिवादः
शब्दस्य प्रयोगसामर्थ्यात् पदार्थावधारणम्, तस्मात्—
वे वर्ण यदि विभक्त्यन्त हो तो 'पद' कहलाते हैं ॥ ६० ॥
स्वदर्शनोक्त ( २. २. ५९ ) प्रमाणानुसार विकृत वर्ण विभक्त्यन्त होने पर
'पद' कहलाते हैं । विभक्ति दो प्रकार की होती है—१. नामिकी ( प्रातिपदिक-
संबन्धिनी ), २. आख्यातिकी ( धातुसम्बन्धिनी ) । नामिकी विभक्ति का उदाहरण
है—'ब्राह्मणः' । आख्यातिकी का उदाहरण है—'पचति' ।
तब तो उपसर्ग, निपात शब्दों की पदसंज्ञा नहीं हो पायेगी, अतः 'पद' का लक्षणा-
न्तर कीजिये ? इसी लक्षण से ये भी 'पद' कहला सकते हैं; क्योंकि इनमें नामिकी
विभक्ति का शास्त्र में अव्ययप्रयुक्त लोपविधान है । यह पदसंज्ञा इसीलिए की जाती
है कि पद से अर्थसम्प्रत्यय हो जाये ॥ ६० ॥
[ प्रकृत्यर्थ भी नाम (प्रातिपदिक) से ही व्यवहृत होते हैं, अतः नाम के प्रधान होने
से उसकी परीक्षा से प्रत्ययों की परीक्षा भी हो जायेगी—यों ] नामपदों को लेकर
परीक्षा प्रारम्भ की जा रही हैं । 'गौ' यह पद उदाहरण है; उसके अर्थ में—
व्यक्ति, आकृति तथा जाति-तीनों की सन्निधि में उपचार होने से संशय
होता है ॥ ६१ ॥
अविनाभाव से रहना 'सन्निधि' कहलाता है । अविनाभाव से रहनेवालों में व्यक्ति,
आकृति, जाति—इन तीनों में 'गौ' यह प्रयोग होता है । यहाँ ज्ञात नहीं होता कि
'गो' पद का अर्थ व्यक्ति है, आकृति है, या जाति है, या तीनों मिलकर हैं ? ॥ ६१ ॥
शङ्का—शब्द के प्रयोगसामर्थ्य से पदार्थ का निश्चय होता है, इसलिए—