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सर्वकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

पृष्ठ 162, कुल 410 में से

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पृष्ठ 162

१४४ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० २. आ०
भवति, तस्मान्न व्यञ्जकः संयोगः, उत्पादके तु संयोगे संयोगजाच्छब्दाच्छब्द-
सन्ताने सति श्रोत्रप्रत्यासन्नस्य ग्रहणम्-इति युक्तं संयोगनिवृत्तौ शब्दस्य
ग्रहणमिति ।
इतश्च शब्द उत्पद्यते, नाभिव्यज्यते; कृतकवदुपचारात् । तीव्रं मन्दमिति
कृतकमुपचर्यते = तीव्रं सुखं मन्दं सुखम्, तीव्रं दुःखं मन्दं दुःखमिति; उपचर्यते
च तीव्रः शब्दः, मन्दः शब्द इति ।
व्यञ्जकस्य तथाभावाद् ग्रहणस्य तीव्रमन्दता रूपवदिति चेद् ? न; अभि-
भवोपपत्तेः । संयोगस्य व्यञ्जकस्य तीव्रमन्दतया, शब्दग्रहणस्य तीव्रमन्दता
भवति, न तु शब्दो भिद्यते; यथा—प्रकाशस्य तीव्रमन्दतया रूपग्रहणस्येति ?
तच्च नैवम्; अभिभवोपपत्तेः । तीव्रो भेरीशब्दो मन्दं तन्त्रीशब्दमभिभवति, न
मन्दः । न च शब्दग्रहणमभिभावकम्, शब्दश्च न भिद्यते । शब्दे तु भिद्यमाने
युक्तोऽभिभवः । तस्मादुत्पद्यते शब्दो नाभिव्यज्यत इति ।
अभिभवानुपपत्तिश्च, व्यञ्जकसमानदेशस्याभिव्यक्तौ प्राप्त्यभावात् ।
'व्यञ्जकेन समानदेशोऽभिव्यज्यते शब्दः' इत्येतस्मिन् पक्षे नोपपद्यतेऽभिभवः; न
संयोग को उत्पादक मानने पर संयोगज शब्द से शब्दधारा सन्तान के उत्पत्ति-क्रम
से श्रोत्रप्रत्यासन्न शब्द का ग्रहण होता है, अतः संयोग की निवृत्ति होने पर शब्द का
ग्रहण उपपन्न ही है ।
इस कारण भी शब्द अनित्य है कि वह उत्पन्न होता है, अभिव्यक्त नहीं होता ।
यतः अनित्य में तीव्रता या मन्दता का आरोप किया जाता है । जैसे सुख में तीव्रतादि
का आरोप करके 'सुख तीव्र है, मन्द है', 'दुःख तीव्र है, मन्द है' कहा जाता है, उसी
प्रकार 'शब्द तीव्र है, मन्द है'—ऐसा उपचार होता है ।
यदि कहें कि व्यञ्जक के वैसा होने से तीव्रतादि का ग्रहण होता है, रूप की तरह ?
यह नहीं कह सकते; क्योंकि शब्द स्वाभिर्भाव से दूसरे आविर्भूत शब्द को दबाता है ।
तात्पर्य यह है—यदि कहो कि व्यञ्जक संयोग की तीव्रता-मन्दता से शब्द का ग्रहण होने
से उसमें तीव्रता-मन्दता होती है, शब्द भिन्न नहीं होता; जैसे—प्रकाश की तीव्रता-
मन्दता से रूप का ग्रहण होता है ? यह नहीं कह सकते; क्योंकि तीव्र भेरीशब्द मन्द
वीणाशब्द को दवा देता है, न कि मन्द तीव्र को । शब्दज्ञान यहाँ अभिभावक नहीं है;
और शब्द आपके मत में भिन्न नहीं होता । हाँ ! शब्द यदि भिन्न हो तब तो वैसा अभि-
भव युक्त है। इसलिये यह स्थिर हुआ कि शब्द उत्पन्न होता है, अभिव्यक्त नहीं होता ।
अभिभव अनुपपन्न भी होने लगेगा; क्योंकि व्यञ्जक समानदेशवाले शब्द की प्राप्ति
अन्यदीय शब्द की अभिव्यक्ति के समय उपपन्न नहीं है । तात्पर्य यह है कि 'व्यञ्जक से
समानदेशस्थ शब्द अभिव्यक्त होता है'—इस मत में अभिभव उपपन्न नहीं होता; क्योंकि
भेरीशब्द से तन्त्रीशब्द का संयोग तो हुआ नहीं । अर्थात् भेरीसंयोग तन्त्री से नहीं है ।