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सर्वकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

पृष्ठ 161, कुल 410 में से

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१३. सू० ] शब्दानित्यत्वपरीक्षाप्रकरणम् १४३
अतः संशयः—किमत्र तत्त्वमिति ?
अनित्यः शब्द इत्युत्तरम् । कथम् ?
'आदिमत्त्वादैन्द्रियकत्वात् कृतकवदुपचाराच्च ॥ १३ ॥
आदिः = योनिः, कारणम्, आदीयते अस्मादिति । कारणवदनित्यं दृष्टम् ।
संयोगविभागजश्च शब्दः कारणवत्त्वादनित्य इति । का पुनरियमर्थदेशना—कारण-
वत्त्वादिति ? उत्पत्तिधर्मकत्त्वादनित्यः शब्द इति, भूत्वा न भवति विनाशधर्मक इति ।
सांशयिकमेतत्—किमुत्पत्तिकारणं संयोगविभागौ शब्दस्य, आहोस्विदभि-
व्यक्तिकारणम् ? इत्यत आह—ऐन्द्रियकत्वात् । इन्द्रियप्रत्यासत्तिग्राह्य ऐन्द्रियकः ।
किमयं व्यञ्जकेन समानदेशोऽभिव्यज्यते रूपा दिवत् ? अथ संयोगजाच्छब्दा-
सन्ताने सति श्रोत्रप्रत्यासन्नो गृह्यत इति ?
संयोगनिवृत्तौ शब्दग्रहणान्न व्यञ्जकेन समानदेशस्य ग्रहणम् । दारुव्रश्चने
दारुपरशुसंयोगनिवृत्तौ दूरस्थेन शब्दो गृह्यते । न च व्यञ्जकाभावे व्यङ्ग्यग्रहणं
अतः सन्देह होता है कि इनके कौन मत समीचीन हैं ?
'शब्द अनित्य हैं'—यह (नैयायिकों का) उत्तर है । कैसे ?—
आदिमान् होने से, ऐन्द्रियक होने से, अनित्य की तरह उपचार होने से ॥ १३ ॥
आदि से तात्पर्य है योनि, अर्थात् कारण—जिससे आदान (उत्पादन) किया जाये ।
जो कारणवान् है वह अनित्य देखा गया है । शब्द भी संयोगविभागज होने से कारणवान्
है, अतः अनित्य है । यह क्या अर्थदेशना (अर्थप्राप्ति) हुई कि 'कारण होने से' ? हमारा
मतलव है उत्पत्तिधर्मवान् होने से शब्द अनित्य है, तथा वह होकर नहीं होता है (विनष्ट
हो जाता है), अतः विनाशधर्मक है !
तब तो संशय उठ खड़ा होगा कि क्या ये संयोगविभाग शब्द के उत्पत्तिकारण हैं ?
या अभिव्यक्तिकारण ? इसलिये कहते हैं—ऐन्द्रियक होने से । इन्द्रिय के सन्निकर्ष से
गृहीत होनेवाला 'ऐन्द्रियक' कहलाता है ।
क्या यह शब्द व्यञ्जक (इन्द्रिय संयोग) से समानदेशस्थ एकाधिकरणवृत्ति होता
हुआ रूप की तरह अभिव्यक्त होता है ? या संयोगज शब्द से शब्दसन्तान होने पर
श्रोत्रेन्द्रिय से प्रत्यासन्न (सम्बद्ध) होता हुआ गृहीत होता हैं ?
संयोगनिवृत्ति होने पर भी शब्द का ग्रहण होता है, अतः व्यञ्जक से समानाधिकरण
हो कर उस समान देश का ग्रहण नहीं हो सकता । काष्ठछेदनकाल में परशुदारुसंयोग
की निवृत्ति होनेपर भी दूरस्थ व्यक्ति को जैसे शब्द गृहीत होता है । व्यञ्जक के विना
व्यङ्ग्य का ग्रहण नहीं हुआ करता । इसलिये यहाँ संयोग व्यञ्जक नहीं है ।
१. वेदानां नित्यत्वे शब्दप्रामाण्यप्रयोजकगुणविरहप्रयुक्ताप्रामाण्यसम्भवनिरासाय
शब्दानित्यत्वप्रकरणमारभते सूत्रकारः ।