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सर्वकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

पृष्ठ 163, कुल 410 में से

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पृष्ठ 163

१४. सू० ] शब्दानित्यत्वपरीक्षाप्रकरणम् १४५
हि भेरीशब्देन तन्त्रीस्वनः प्राप्त इति ।
अप्राप्तेऽभिभव इति चेत् ? शब्दमात्राभिभवप्रसङ्गः । अथ मन्येत-असत्यां
प्राप्तावभिभवो भवतीति ? एवं सति यथा भेरीशब्दः कञ्चित्तन्त्रीस्वनमभिभवति,
एवमन्तिकस्थोपादानमिव दवीयःस्थोपादानानपि तन्त्रीस्वनानभिभवेद्; अप्राप्ते-
रविशेषात् । तत्र क्वचिदेव भेर्यां प्रणादितायां सर्वलोकेषु समानकालास्तन्त्रीस्वना
न श्रूयेरन्निति । नानाभूतेषु शब्दसन्तानेषु सत्सु श्रोत्रप्रत्यासत्तिभावेन कस्यचिच्छ-
ब्दस्य तीव्रेण मन्दस्याभिभवो युक्त इति । कः पुनरयमभिभवो नाम ? ग्राह्य-
समानजातीयग्रहणकृतमग्रहणम् = अभिभवः । यथा-उल्काप्रकाशस्य ग्रहणार्ह-
स्यादित्यप्रकाशेनेति ॥ १३ ॥
न; घटाभावसामान्यनित्यत्वान्नित्येष्वप्यनित्यवदुपचाराच्च ? ॥ १४ ॥
न खलु आदिमत्त्वादनित्यः शब्दः । कस्माद् ? व्यभिचारात् । आदिमतः
खलु घटाभावस्य दृष्टं नित्यत्वम् । कथमादिमान् ? कारणविभागेभ्यो हि घटो न
भवति । कथमस्य नित्यत्वम् ? योऽसौ कारणविभागेभ्यो न भवति, न तस्याभावो
भावेन कदाचिन्निवर्त्यत इति ।
यदि संयोग न होने पर भी अभिभव मानोगे तो शब्दमात्र का अभिभव होने लगेगा ।
मतलब यह है कि 'संयोग न होने पर अभिभव होता है'—ऐसा मानोगे तो ऐसी स्थिति
में जैसे भेरीशब्द समीपस्थ वीणा शब्द को अभिभूत कर देता है, वैसे ही समीपस्थ
अभिभव की तरह बहुत दूर के वीणाशब्द को अभिभूत करने लगेगा; क्योंकि संयोग की
अप्राप्ति दोनों जगह समान है । तब कहीं एक भेरी के बजते ही उस समय संसार में
सभी जगह के वीणाशब्द अभिभूत होने लगेंगे ! उचित तो यह है कि नाना प्रकार के
शब्दसन्तानों के रहते श्रोत्र के सन्निकर्ष में किसी शब्द के तीव्र होने पर मन्द शब्द
अभिभूत हो जाता है । यह 'अभिभव' क्या चीज है ? ग्रहण करने योग्य वस्तु के
सजातीय ग्रहण से कृत अग्रहण ही 'अभिभव' कहलाता है । जैसे ग्रहणयोग्य उल्काप्रकाश
का सूर्य के प्रकाश से अभिभव (अग्रहण) हो जाता है ॥ १३ ॥
[ गत सूत्र में दिखाये गये हेतुओं में व्यभिचार दिखाते हैं—]
घटाभावसामान्य के नित्य होने से तथा नित्य में अनित्यवद् आरोप से (वे तीनों
हेतु शब्द का अनित्यत्व सिद्ध नहीं कर सकते ?) ॥ १४ ॥
आदि(कारण)मान् होने से शब्द अनित्य है—ऐसा नहीं है; क्योंकि वह हेतु
व्यभिचरित है । आदिमान् घटाभाव का नित्यत्व देखा गया है । आदिमान् कैसे है ?
क्योंकि कारणों का विभाग हो जाने पर घट नहीं रहता । नित्य कैसे है ? कारणों के
विभक्त होने पर जो नहीं होता, उसका अभाव किसी भी सत्ता से कभी निवृत्त नहीं हो
सकता ।
न्या० द०