नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary
आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४८ नीतिवाक्यामृतम्
२७. व्यवहारसमुद्देशः
कलत्रं नाम नराणामनिगडमपि बन्धनं दृढमाहुः ॥ १ ॥
मनुष्यों के लिये भार्या बन्धन की लोह-शृङ्खला न होने पर भी दृढ़
बन्धन है ।
त्रीण्यवश्यं भर्त्तव्यानि माता, कलत्रम् , अप्राप्तव्यवहाराणि चाप-
त्यानि ॥ २ ॥
माता, स्त्री, और व्यवहार में अबोध सन्तति इन तीनों का भरण-पोषण
अवश्य करना चाहिए ।
दानं तपः प्रायोपवेशनं तीर्थोपासनफलम् ॥ ३ ॥
दान, तप और उपवास ये तीर्थ सेवा के फल हैं ।
तीर्थोपवासिषु देवस्वापरिहरणं क्रव्यादेषु कारुण्यमिव, स्वाचारच्युतेषु
पापभीरुत्वमिव प्राहुः ॥ ४ ॥
तीर्थ स्नान में वास करनेवाले देवता का द्रव्य नहीं ग्रहण करते यह कहना
वैसा ही है जैसे मांस भक्षक में करुणा का होना और अपने आचार-विचार
से भ्रष्ट पुरुष में पाप भीरुता का होना । ऐसा लोग कहते हैं ।
अधार्मिकत्वम् अतिनिष्ठुरत्वं वञ्चकत्वं प्रायेण तीर्थवासिनां
प्रकृतिः ॥ ५ ॥
अधार्मिक होना, अतिक्रूर होना, वञ्चना करना यह प्रायः तीर्थ-वासियों
का स्वभाव होता है ।
स किं प्रभुर्यः कार्यकाल एव न संभावयति भृत्यान् ॥ ६ ॥
वह स्वामी निन्दनीय है जो कार्य के अवसर पर ही सेवकों का पुरस्कार
आदि से सम्मान नहीं करता ।
स किं भृत्यः सखा वा यः कार्यमुद्दिश्यार्थं याचते ॥ ७ ॥
वह सेवक और सखा भी निन्दनीय है जो कार्य के समय अर्थ की याचना
करता है ।
याऽर्थेन प्रणयिनी करोति चाङ्गाकृष्टि सा किंभार्या ॥ ८ ॥
जो द्रव्य के कारण अनुराग और आलिङ्गन करती है वह भार्या निन्द-
नीय है ।
स किं देशो यत्र नास्त्यात्मनो वृत्तिः ॥ ६ ॥
वह देश कुत्सित है जहां अपना जीवन-निर्वाह नहीं ।