नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary
आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंव्यवहारसमुद्देशः १४६
स किं बन्धुर्यो व्यसनेषु नोपतिष्ठते ॥ १० ॥
दुःख के अवसर पर काम न आने वाला क्या बन्धु है ? अर्थात् वह कुत्सित
बन्धु है ।
तत्किं मित्रं यत्र नास्ति विश्वासः ॥ ११ ॥
जिस पर विश्वास न किया जा सके वह कुत्सित मित्र है ।
स किं गृहस्थो यस्य नास्ति सत्कलत्रसम्पत्तिः ॥ १२ ॥
जिसके पास सती भार्या रूप सम्पत्ति नहीं है वह गृहस्थ निन्दनीय है ।
तत्किं दानं यत्र नास्ति सत्कारः ॥ १३ ॥
विना सम्मान का दान निन्दनीय है ।
तत्किं भुक्तं यत्र नास्त्यतिथिसंविभागः ॥ १४ ॥
जिस भोजन में अतिथि का भाग न हो वह निन्दनीय भोजन है ।
तत्किं प्रेम यत्र कार्यवशात् प्रवृत्तिः ॥ १५ ॥
जहाँ प्रयोजन-वश प्रवृत्ति हो वह प्रेम निन्दनीय है ।
तत् किमाचरणं यत्र वाच्यता मायाव्यवहारो वा ॥ १६ ॥
वह आचार निन्दनीय है जिसमें अपयश और छल-कपट पूर्ण व्यव-
हार हो ।
तत् किमपत्यं यत्र नाध्ययनं विनयो वा ॥ १७ ॥
वह कुत्सित पुत्र है जिसमें न अध्ययन हो न विनय हो ।
तत्किं ज्ञानं यत्र मदेनान्धता चित्तस्य ॥ १८ ॥
मदान्ध चित्त वाले का ज्ञान निन्दनीय है ।
तत्किं सौजन्यं यत्र परोक्षे पिशुनभावः ॥ १९ ॥
जहां पीठ पीछे निन्दा की जाती हो वह सज्जनता कैसी ?
सा किं श्रीर्यया न सन्तोषः सत्पुरुषाणाम् ॥ २० ॥
उस लक्ष्मी से भी क्या जिससे सत्पुरुषों का सन्तोष न हो ।
तत्किं कृत्यं यत्रोक्तिरुपकृतस्य ॥ २१ ॥
किये हुए उपकार को जहां कह-कहकर प्रकट किया जाय वह उपकार
प्रशंसनीय नहीं है ।
तयोः को नाम निर्वाहो यौ द्वावपि प्रभूतमानिनौ पण्डितौ लुब्धौ
साहङ्कारौ ॥ २२ ॥
ऐसे उन दो आदमियों का परस्पर निर्वाह कैसे हो सकता है जो दोनों ही
बड़े अभिमानी, पण्डित, लोभी और अहङ्कारी हों ।
स्ववान्त इव स्व-दत्ते नाभिलाषं कुर्यात् ॥ २३ ॥