नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary
आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसदाचारसमुद्देशः १४७
व्रतं, विद्या, सत्यमानृशंस्यमलौल्यता च ब्राह्मण्यं न पुनर्जाति-
मात्रम् ॥ ५७ ॥
शुभ संकल्प, सद्विद्या का अभ्यास, सत्यपालन, अक्रूरता और गाम्भीर्य
गुणों से मनुष्य ब्राह्मण होता है केवल ब्राह्मण जाति में जन्म लेने से नहीं ।
निःस्पृहाणां का नाम परापेक्षा ॥ ५८ ॥
जो व्यक्ति निःस्पृह हैं—जिनको किसी बात का अभिलाष नहीं हैं उनको
दूसरे व्यक्ति की सहायता आदि की क्या आवश्यकता है ।
कं पुरुषमाशा न क्लेशयति ॥ ५९ ॥
आशा किसे नहीं दुख देती ।
स संयमी गृहाश्रमी वा यस्याविद्यातृष्णाभ्यामनुपहतं चेतः ॥ ६० ॥
जिसके हृदय में अज्ञान और तृष्णा नहीं है वही व्यक्ति वस्तुतः संयमी
और गृहस्थ है।
शीलमलंकारः पुरुषाणां न देहखेदावहो बहिः ॥ ६१ ॥
पुरुषों के लिये 'शील' ऐसा आभूषण है जो बाहर से देह को किसी
प्रकार का कष्ट नहीं देता अथवा भार नहीं लगता ।
अप्रियकर्त्तुर्न प्रियकरणात् परम् आचरणम् ॥ ६३ ॥
अप्रिय आचरण करने वाले व्यक्ति के प्रति प्रिय व्यवहार करना सर्वश्रेष्ठ
आचरण है ।
अप्रयच्छन्नर्थिने न परुषं ब्रूयात् ॥ ६४ ॥
जिसे कुछ देना न चाहे ऐसे याचक के प्रति कम से कम कठोर वचन तो
न बोले ।
स स्वामी मरुभूमियेत्रार्थिनो न भवन्तीष्टकामाश्च ॥ ६५ ॥
वह स्वामी मरुभूमि के समान है जिससे याचकों की अभीष्ट याञ्चा न
पूर्ण हो ।
प्रजापालनं हि राज्ञो यज्ञो न पुनर्भूतानामालम्भः ॥ ६६ ॥
राजा का यज्ञ प्रजापालन है न कि जीवों की बलि देना ।
प्रभूतमपि नानपराधसत्त्वव्यावृत्तये नृपाणां बलं धनुर्वा किन्तु
शरणागतरक्षणाय ॥ ६७ ॥
राजा की प्रचुरशक्ति सैन्य बल आदि अथवा दृढ़ धनुष निरपराध
व्यक्तियों को नष्ट करने के लिये नहीं किन्तु शरणागतों की रक्षा के लिये
होता है ।
[ इति सदाचारसमुद्देशः ]