नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary
आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४६ नीतिवाक्यामृतम्
आयानुरूपो व्ययः कार्यः ॥ ४४ ॥
आय के अनुसार ही व्यय करना चाहिये ।
ऐश्वर्यानुरूपः प्रसादो विधेयः ॥ ४५ ॥
अपनी सम्पत्ति के अनुरूप ही दूसरों को भेंट और पुरस्कार आदि देना
चाहिए ।
स पुमान् सुखी यस्यास्ति सन्तोषः ॥ ४६ ॥
वही पुरुष वास्तविक सुखी है जिसको सन्तोष है ।
रजस्वलाभिगामी चाण्डालादप्यधमः ॥ ४७ ॥
रजस्वला स्त्री के साथ सम्भोग करनेवाला व्यक्ति चांडाल से भी अधिक
नीच है ।
सलज्जं निर्लज्जं न कुर्यात् ॥ ४८ ॥
सलज्ज व्यक्ति को निर्लज्ज न बना दें अर्थात् विनम्र भाव से रहने
वाले व्यक्ति को मुंहलगा बना कर ढीठ कर देना उचित नहीं होता ।
स पुमान् सवस्त्रोऽपि नग्न एव यस्य नास्ति सच्चरित्रम् आवर-
णम् ॥ ४६ ॥
जिस पुरुष के पास सच्चरित्र रूपी आवरण नहीं है वह वस्त्र पहने हुए
भी नंगा ही है ।
स नग्नोऽप्यनग्न एव यो भूषितः सच्चरित्रेण ॥ ५० ॥
जो सच्चरित्र से विभूषित है वह नंगा होने पर भी वस्त्रयुक्त है ।
सर्वत्र संशायानेषु नास्ति कार्यसिद्धिः ॥ ५१ ॥
सर्वत्र संशयभरी दृष्टि रखने वाले को कार्यों में सिद्धि नहीं प्राप्त होती ।
न क्षीरघृताभ्यां परं भोजनमस्ति ॥ ५२ ॥
दूध और घी से बढ़कर दूसरा भोजन नहीं है ।
परोपघातेन वृत्तिरभव्यानाम् ॥ ५३ ॥
दूसरों को पीड़ित कर अपना जीवन निर्वाह करना दुष्टों का काम है ।
वरमुपवासो न पराधीनं भोजनम् ॥ ५४ ॥
उपवास कर लेना अच्छा है किन्तु दूसरों के अधीन रहकर भोजन करना
श्रेष्ठ नहीं है ।
स देशोऽनुसर्त्तव्यो यत्र नास्ति वर्णसङ्करः ॥ ५५ ॥
उस देश में निवास करना चाहिए जहां वर्णसंकर अर्थात् क्षुद्र प्रकृति के
मनुष्य न हों ।
स जात्यन्धो यः परलोकं न पश्यति ॥ ५६ ॥
जो अपना परलोक का हित न देखे वह स्वभावतः अन्धा है ।