निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( १६४ ) ८ अ० २ पा० ६ खं०
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दैव्यौ होतारौ प्रथमौ सुवाचौ निर्मिमानौ यज्ञं
मनुष्यस्य मनुष्यस्य यजनाय प्रचोदयमानौ
यज्ञेषु कर्त्तारौ पूर्वस्यां दिशि यष्टव्यम्-इति
प्रदिशन्तौ ॥
'तिस्रो देवी:' तिस्रो देव्यः ।
तासाम्-एषा भवति—॥९(१२)॥
अर्थः- 'दैव्या होतारा' ( दैव्यौ होतारौ ) देवसाक्षीं में
होने वाले होता-देवतारूप होता वायु और अग्नि 'प्रथमा'
( प्रथमौ ) मनुष्य होता की अपेक्षा प्रथम हैं- पहिले हैं ।
'सुवाचा' ( सुवाचौ ) सुन्दर वाणी वाले हैं । 'यज्ञम्' यज्ञ
को 'मिमाना' ( निर्मिमानौ ) निर्माण करने वाले 'मनुष्य.'
( मनुष्यस्य मनुष्यस्य ) जने जने को 'यजध्यै' ( यजनाय ) यज्ञ
के लिये 'प्रचोदयन्ता' ( प्रचोदयमानौ ) प्रेरणा करने वाले
हैं । 'विदथेषु' ( यज्ञेषु ) यज्ञों में 'कारू' ( कर्त्तारौ ) करने
वाले हैं । 'प्राचीनं ( पूर्वस्यां दिशि ) ज्योतिः' पूर्व दिशा में
होने वाले आहवनीय अग्नि को 'प्रदिशा दिशन्ता' ( यष्ट-
व्यम्-इति प्रदिशन्तौ ) मन्त्र से या विधिवाक्य के अनुसार
यजन करना चाहिए-ऐसे आज्ञा करने वाले हैं । [ जो ये
दोनों अग्नि और वायु देवता इस प्रकार नित्य ही यज्ञ के
उपकार में रहते हैं, वे मेरे लिये भी ऐसा ही बर्ताव करें । ]
'तिस्रोदेवी:' (१०) क्या ? ( तिस्रो देव्यः ) तीन देवियें ।
"तासाम्०" उनकी यह ऋचा है ॥६(१२)॥