निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( १६३ ) ८ अ० ५ पा० ६ खं०
हुईं, अथवा जनों को सुलाती हुईं, 'यजते' ( यजिष्ये )
यज्ञ कराने वालीं, 'उपाके' ( उपक्रान्ते ) आपस में मिलकर
प्रशंसा करने योग्य, या एक पर एक चढ़ी हुईं 'दिव्ये' द्युलोक
में उपजी हुईं, या चमकने वालीं, 'योषयो' स्त्री रूपिणी या
आपस में मिली हुईं, 'बृहती' ( बृहत्यौ ) ( महत्यौ ) बड़ीं,
'सुरुक्ये' ( सुरूचने ) सुन्दर रूचने वालीं 'शुक्रपेशसम्' शुक्ल
कान्ति ( गौरवर्णा ) 'श्रियम्' श्री ( शोभा ) को 'अधि-दधाने'
अपने ऊपर धारण करती हुईं, 'योनौ' यज्ञ के स्थान में
'नि-आसदतां' ( सीदताम् इति वा न्यासीदताम् इति
वा ) बैठें ।
'शुक्र' ज्वलन अर्थ में 'शुच्' ( भ्वा०प० ) धातु से है ।
'पेश' यह रूप का नाम है । कैसे ? 'पिश्' ( भ्वा०प० )
धातु से है । क्योंकि-वह विपिशित होता है- जिस द्रव्य में
वह रहता है, उसे व्याप्त कर भासता है । कोई कहते हैं, वह
पराश्रित होने से दूसरे में रखा हुआ जैसा होता है ।
'दैव्या होतारा' (६) ( दैव्यौ होतारौ ) देवताओं के
होता हैं । कौन ? यह पृथिवी का अग्नि और वोह मध्यम
लोक का अग्नि ( विद्युत् ) ।
“तयोः०” उनकी यह ऋचा है—॥८(११)॥
( खं० ६ )
[निरु०-] ‘दैव्या होतारा प्रथमा सुवाचा मि-
माना यज्ञं मनुषो यजध्यै । प्रचोदयन्ता विद-
थेषु कारू प्राचीनं ज्योतिः प्रदिशा दिशन्ता ॥”
[ ऋ०सं० ८,६,९,२ ] ॥