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सर्वकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 909, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 909

हिन्दी निरुक्त ( १४१ ) ८ अ० २ पा० १ खं०
करने वाला है। [ क्योंकि-यह वनों के = वृक्षादिकों के भीतर
रहता हुआ भी जलाने को समर्थ होता हुआ भी उन्हें जलाता
नहीं, इसी से उनका पालक है। ‘पाता’ और ‘पालयिता’
दोनों पदों में धातुओं का भेद है; और अर्थ एक ही है।]
‘वन’ कैसे संभजनार्थक ‘वन’ (त०उ०) धातु से है। क्यों
कि- उसे काठ, फल, फूल आदि के लिये सेवन किया जाता है।
“पिब” ऋतुओं के सहित = कालों के सहित पी। [ यह
देवता पद के विचार का न्याय, जैसा कि ‘द्रविणोदस्’ पद
पर दिखाया है, सर्वत्र देवता पद के विचारार्थ ग्राह्य है, ऐसे
विचारों से शिष्य की बुद्धि बढती है।] ॥ ४ (३) ॥
इति हिन्दीनिरुक्ते अष्टमोऽध्यायस्य प्रथमः पादः ॥८,१॥
द्वितीयः पादः ।
( खं० १ )
निघ०-इध्मः ॥२॥ तनूनपात् ॥ ३ ॥
नराशंसः ॥४॥ ईलः ॥५॥ बर्हिः ॥ ६ ॥
द्वारः ॥७॥ उषासानक्ता ॥८॥ दैव्याहो-
तारा ॥६॥ तिस्रोदेवीः ॥ १० ॥ त्वष्टा
॥११॥ वनस्पतिः ॥१२॥ स्वाहाकृतयः
॥ १३ ॥ इति त्रयोदश (१३) पदानि ।
(निरु०) अथात आप्रियः ।
आप्रियः कस्मात् ? आप्नोतेः । प्रीणातेर्वा ।