निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 827, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ५७ ) ७ अ० ३ पा० १० खं०
'विराट्' क्यों ? विराजन ( विशेष शोभन ) होने से,
अथवा विराधन ( विकल ) होने से । अथवा विपापणा (बढने-
से) । सम्पूर्ण अक्षर वाली होने से विराजमान है । अल्प
अक्षर वाली होनेसे विकल है । अधिकाक्षर होने से विप्लुता
उछली हुई जैसी ।
'पिपीलिकमध्या' यह नाम उपमांसे है। पिपीलिका (चींटी)
के समान आकार वाली होती है ।
'पिपीलिका' कैसे ? गति अर्थ में पेल, ( भ्वा. प० ( धातुसे
है । [क्योंकि- वह चलती ही रहती है ।]॥ ९ ॥
(खं० १०)
(निरु०-) इति- इमा देवता अनुक्रान्ताः-
सूक्तभाजः, हविर्भाजः, ऋग्भाजश्च भूयिष्ठाः। का-
श्चिन्निपातभाजः ।
अथोत अभिधानैः संयुज्य हविश्चो दयति-इन्द्राय
वृत्रघ्ने, इन्द्राय वृत्रतुरे, इन्द्राय अंहोमुचे-इति ।
तान्यपि एके समामनन्ति । भूयांसि तु समा-
म्नानात् ।
यत्तु संविज्जानभूतं स्यात् प्राधान्यस्तुति तत्
समामने ।
अथोत कर्मभिर्ऋषिर्देवताः स्तौति-वृत्रहा,
पुरन्दर इति, तान्यपि एके समामनन्ति । भूयां
सि तु समाम्नानात् । व्यञ्जनमात्रं तु तत् तस्या-