निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ५६ ) ७ अ० ३ पा० ६ खं०
है (ठहरता है) इस से 'त्रिष्टुप्' है । अथवा 'त्रिवृद्' तीन
धारवाला वज्र होता है, उसको स्तोभन (स्तुति) करता है,
इससे 'त्रिष्टुप्' है । “यत् त्रि०” 'जिससे कि-इसने तीन
वार स्तुति की है, वह त्रिष्टुभ्का त्रिष्टुभ् पना है' यह ब्राह्मण
श्रुति में जाना जाता है ॥ ८ (१९) ॥
( खं० ६ )
( निरु०- ) 'जगती' गततमं छन्दः । जल-
चरगति र्वा । “ जल्गल्यमानोऽसृजत ” इति च
ब्राह्मणम् ।
'विराट्' विराजनाद् वा । विराधनाद् वा ।
विप्रापणाद् वा । विराजनात् सम्पूर्णाक्षरा ।
विराधनाद् ऊनाक्षरा । विप्रापणाद् अधिकाक्षरा ।
'पिपीलिकमध्या'-इति औपमिकम् ।
'पिपीलिका' पेलतेर्गतिकर्मणः ॥ ९ ॥
अर्थ:-'जगती' क्या ? गततम (बिलकुल गयां हुआ) छन्द ।
[क्यों ? वह सब छन्दों से अन्त का छन्द है, इससे पर छन्द
नहीं, किन्तु अतिच्छन्द हैं ।) अथवा जलचरगति होने से
'जगती' है । (क्योंकि-उसका प्रस्तार जलकी लहरियों जैसा
होता है । ] “ जल्गल्यमानो० ” प्रजापति ने इसे जल-
गल्यमान ( क्षीण हर्ष) होते हुए रचा है या देखा है (क्योंकि-
छन्द नित्य हैं, उनकी रचना का संभव नहीं इससे 'सृज'
का दर्शन अर्थ ही संभव होता हैं ।) यह ब्राह्मण है :