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निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 815, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 815

हिन्दी निरुक्त ( ४४ ) ७ अ० ३ पा० १ खं०

वस्तुएं हैं, वहां अग्नि का संबन्ध रहता है- अग्नि का प्रत्यक्ष
मान न रहने पर भी, वहां अग्नि समझा जाता है,- यही
प्रयोजन भी इनके कहने का है कि- इनका और अग्नि का
संबन्ध उजाल होजावे या प्रकट हो जावे । [ वे कौन ?- ]
“अयं लोक०”। यह लोक-पृथिवी लोक । प्रातःसवन ।
वसन्त ऋतु । गायत्री छन्द । त्रिवृत् स्तोम । रथन्तर साम ।
और जो देवगण प्रथम स्थान ( नि० अ० ५ खं० १-२-३ ) में
गिनाए हैं । अग्नायी, पृथिवी, इळा, ये स्त्रियें । अब इसका
कर्म-हवियों का वहन-देवताओं के पास पहुंचाना । और
देवताओं का आवाहन = बुलाना । और जो कुछ दृष्टि सम्ब-
न्धि विषय है, वह अग्नि का ही कर्म है । अब इस के संस्त-
विक देवता हैं-जिन के साथ इस (अग्नि) की स्तुति होती
है ।—इन्द्र, सोम, वरुण, पर्जन्य और ऋतुएं । और आग्ना-
वैष्णव हवि है, किन्तु दश मंडल ऋग्वेद में साथ स्तुति की
ऋचा नहीं है—अग्नि देव विष्णु के साथ हविः का भोजन
तो करते हैं, पर किसी ऋचा में एक साथ स्तुति नहीं सुनते ।
देवताओं में सन्मान के ये दो अधिकार हैं- सहभोजन और
सहस्तवन, इन में से कोई एक अधिकार पा जाता है और
कोई दोनों को भी,-इसी प्रकार पृथिवी लोक के ईश्वर अग्नि
देव के यहां विष्णु देवता सहभोज का अधिकार पाए हुये हैं,
किन्तु एक साथ एक ऋचा में स्तुति का नहीं । और भी
आग्नापौष्ण-अग्नि और पूषाका हविः है, किन्तु संस्तव नहीं ।
तहां एक अलग स्तुति की ऋचा उदाहरण देते हैं-जिस एक
ही ऋचा में अलग २ वाक्यों से दोनों की स्तुति है-ऋचा तो
एक ही है पर स्तुति क्रम से अलग २ होती है-॥१(८)॥