निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३३४ ) ६ अ० ६ पा० १ खं०
७, १३, ४) इत्यपि निगमो भवति ।
‘अनवब्रवः’ अनवक्षिप्तवचनः ।
“विजेषकृदिन्द्र इवानवब्रवः ।” [ ऋ० सं० ८,
३, १९, ५ ] । इत्यपि निगमो भवति ॥१९(२९)॥
अर्थः-‘आधव’ (११७) कैसे ? ‘आधवन’-आकम्पन-सब
ओरसे कँपाने से ।
“ मतीनां च साधनं विप्राणां चाधवम् ”
हे देव ! पूषन् ! आदित्य ! हम तुझे मतिनों-प्रज्ञाओं-
बुद्धियों का साधन-देने-वाला मानते हैं । क्योंकि-सूर्य के
उदय होने से ही सब प्राणियों की बुद्धिएं प्रकट होती हैं ।
और मेधावी ब्राह्मणों का कँपाने वाला है। अर्थात् तू ऐसे
अपनी गुण शालिता-अपने गुणों को दिखाता है, जिस प्रकार
हृदय कांपते हुये वे तुझे स्तुति करते हैं। यह भी निगम होता
है । इस प्रकार यहां शब्द की समानता और अर्थ की अनु-
कूलता से ‘आधव’ नाम ‘आकम्पयिता’ ( कँपाने वाला ) के
अर्थ में है ।
‘अनवब्रव’ (११८) यह अनवगत ‘अनवक्षिप्तवचन ’
( जिसके वचन का कोई खण्डन न कर सके ) - अखण्डनीय
वचन के अर्थ में है।
“ विजेषकृदिन्द्र इवानवब्रवः । ” हे मन्यु देव
तू ‘इन्द्रः-इव ’ इन्द्र के समान ‘अनवब्रवः ’ अखण्डनीय
वचन और ‘विजेषकृत् ’ विजय का करने वाला है। यह भी
निगम है । इस प्रकार यहां ‘अनवब्रव ’ शब्द ‘अनवक्षिप्त-
वचन के अर्थ में है ॥ १ ( २६ ) ॥