निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३३३ ) ६ अ० ६ पा० १ खं०
'रथर्यति' । सिद्धः-बनाहुआ ( सोम ) ' रथर्यति' ( तत्प्रे-
प्सुर्भवति ) उस-रथ रंहण - गमन की इच्छावाला होता है।
या रथकी कामना करता है । (यह नामधातु की क्रिया है । )
“एष देवो रथर्यति” ' एषः ' यह ' देवः ' सोम देव
'रथर्यति' रथ की या गमन की इच्छा करता है- यह भी
निगम है ।
'असक्राम्' (११६) यह अनवगत 'असंक्रमणीम्' ( नहीं
संक्रमण करने वाली ) के अर्थ में है ।
“धेनुं न इषं पिन्वतमसक्राम्” हे अश्विन् देवो!
'नः' हमारे लिये 'असक्राम्' हम से कभी अलग न होने वाली
'धेनुम्' गो को और 'इषम्' अन्न को 'पिन्वतम्' तुम दोनों
भराओ या बढ़ाओ । इस प्रकार यहां शब्द के सारूप्य और
अर्थ के अविरोध से 'असक्राम्' यह 'असंक्रमणीम्' ( अलग न
होने वाली ) के अर्थ में है ॥ ६ ॥
इति हिन्दीनिरुक्ते षष्ठाध्यायस्य पञ्चमः पादः ॥६,५॥
षष्ठः पादः ।
( खं० १ )
निघ०-आधवः ॥११७॥ अनवब्रवः
॥ ११८ ॥
निरु०—'आधवः' आधवनात् ।
“मतीनां च साधनं विप्राणां चाधवम् ।” (७,