निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३३२ ) ६ अ० ५ पा० ६ खं०
'चाकन्' (११४) यह अनवगत 'चायन्-'पश्यन्' देखता-
हुआ) के अर्थ में अथवा 'कामयमानः' ( इच्छा करता हुआ)
के अर्थ में है ।
“वने न वायो न्यधायि चाकन् "हे इन्द्र ! 'वने'
'न' (वृक्षे इव) वृक्षमें जैसे पक्षी शिशु-जिसके पांख नहीं
जामी हों, 'वायः' अपने बच्चे को 'न्यधायि' (निदधाति)
रख देता है । सो जैसे वहां-घोंसले में रखा हुआ 'चाकन्' (पश्यन्)
भयसे चारों ओर दिशाओं को देखता हुआ रहता है,। अथवा
रक्षक की कामना करता हुआ रहता है । इस प्रकार यहां
'चाकन्' शब्द 'चायन्' (देखता हुआ) या 'कामयमानः'
(कामना करता हुआ) के अर्थ में है ।
'वायः क्या ? 'वेः पुत्रः' वि-पक्षी का पुत्र । शाकल्य
मन्त्रोंके पदकार ने 'वायः' शब्द के 'वा' और 'यः' ये दो पद
किये हैं। किन्तु यदि ऐसा होता तो 'न्यधायि' यह तिङन्त-
आख्यात पद उदात्तस्वर वाला होता, क्योंकि-“ यद्वृत्ता-
न्नित्यम् ” (पा० सू० ८, १, ६६) अर्थात्- 'यद्' शब्द के
के प्रयोग के अनन्तर तिङन्त पद कभी निघात-अनुदात्त नहीं
होता । इस नियम के अनुसार शाकल्य के मतमें 'यद्' शब्दके
'यः' रूपसे पर 'न्यधायि' आख्यात पद होता है, इस से यह
अनुदात्त न होकर उदात्त होना चाहिए था परन्तु यह उदात्त
नहीं बल्कि- अनुदात्त है। दूसरा कारण भाष्यकार यह भी
बताते हैं कि- “ अमुसमाप्तश्च अर्थः ” अर्थ भी अधूरा
रहता है ।
'रथर्यति' (११५) यह अनवगत 'रथ इर्यति' (रथ या रहस्य या गमन
की इच्छा करता है) के अर्थ मे है । अथवा रथ की कामना वाले के
अर्थ में है ।