निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३३१ ) ६ अ० ५ पा० ६ खं०
को हम नहीं जानते । अथवा-मैंने तेरा अभिप्राय पा लिया-
“ अन्या किल त्वां परिष्वजाते-परिष्वङ्क्ष्यते ”
दूसरी ही मुझसे उत्तम स्त्री तुझे आलिङ्गन करेगी-उससे
मोहित हुआ ही तू मुझे आलिङ्गन करना नहीं चाहता । कैसे
तुझे वह आलिङ्गन करेगी ? “ कक्ष्येव युक्तं लिबुजेव
वृक्षम् ” कक्ष-बगल में उपजी हुई अच्छी बढ़ी बेल जैसे
अपने पास वाले वृक्ष को चारों ओरसे लपेट लेवे । इस प्रकार
'बतः' यह निपात खेद् और अनुकम्पा-दया अर्थमें है । ऐसे
ही प्रकरण संगत होता है ।
'बत' क्या ? बलसे अतीत-अलग-दूर गया हुआ-दुर्बल
होता है ।
' लिबुजा ' व्रतति-लता-बेल होती है । क्यों ? लप हो
जाती है विभक्त-न्यारी होती हुई भी ।
' व्रतति ' क्यों ? वरणा-स्वीकार- कर लेने ढांपलेने से ।
और शयन-सोजाने से । और ततन-फैलजाने से ।
' वाताप्य ' (११३) ( अनवगत ) उदक-जल होता
है । क्योंकि-वह वात-पवन से आप्यायन होता-बढ़ाया-
लाया जाता है ।
“ पुनानो वाताप्यंविश्वश्चन्द्रम् ” हे सोम ! तू
' विश्वः ' सब का सब 'चन्द्रम्' चमकीले-स्वच्छ 'वाताप्यम्'
जलको प्राप्त होकर पत्ता हुआहुआ [नृमन्तं-] 'पुनानः'पुत्र पौत्र
सहित यजमान को पवित्र करता हुआ । यह भी निगम है।
इस प्रकार यहां अर्थ और शब्द के सादृश्य से 'वाताप्य'
जलका नाम है ।