निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ
पृष्ठ 639, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 639| संख्या | शब्द | अर्थ ( तत्व ) अवगम | निगम । |
हिन्दी निरुक्त ( ५२४ ) ६ अध्याय
| संख्या | शब्द | अर्थ ( तत्व ) अवगम | निगम । |
| १२७ | कीकटेषु | कीकटा नामदेशोऽनार्यनिवासः की- | “किंते कृण्वन्ति कीकटेषु गावः” |
| | | कटाः किं कृताः, किं क्रियाभिरिति | |
| | | प्रेप्सा वा । | |
| १२८ | बन्दुः | द्रुषद्भवति । बन्दो वा, भिन्दो वा, | “तु विधां ते सुकृतं सुप्रयं धनुः साधु- |
| | | भयदो वा, भासमानो द्रवतोति वा । | र्बन्दो हिरण्ययः’ |
| १२९ | वृन्दम् | वृन्देन व्याख्यातम् । वृन्दारकश्च ! | |
| १३० | किः | कर्ता । | “अयं होता किरुसखसस्य” |
| १३१ | उल्बम् | (जरायुः) स्रोचोतैः । वृणोतेर्वा । | ‘महान्तुल्बं स्थविरं तदासीत्’ |
| १३२ | ऋबीसम् | अपगतभासम् । ( पृथ्वी ) | “हिमेनाग्निं घ्रंसमवारयेथां पितुमती |
| | ऋबीसमुर्बीसम् | | मूर्ज मस्ता अधत्तम् । ऋबीसे अत्रिम- |
| | इति निघण्टौ | | श्विनावनीत मन्निन्त्यथुः सर्वगणेरखस्ति” |
| | चतुर्थोऽध्यायः | | |
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