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सर्वकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 509, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 509

हिन्दी निरुक्त ( ६० ) ४ अ० ४ पा० ४ खं०
अर्थात्--हे अग्ने ! तू 'ऋधक्' समृद्ध होता हुआ 'अयाः' आया
अथवा यज्ञको बढ़ाते हुएने यजन किया । 'उत' और 'ऋधक्'
बढ़ते हुए ने 'अशस्तिहाः' विघ्नों को शान्त किया ।
' अस्याः ' ( ६१ ) और 'अस्य' (६२) ये दोनों मुख्य
अर्थ में उदात्त होते हैं, और विशेषण या गौण अर्थ में अनुदात्त
होते हैं । क्यों ? जो उत्कृष्ट या अधिक गुणयुक्त होता है, वह
उदात्त होता है और अल्प या हीन गुणयुक्त अनुदात्त होता
है । (लोक में भी 'यह कुल उदात्त (समृद्ध) है'ऐसा प्रसिद्ध है ।)
प्रधान वाचक 'अस्या' (६१) का निगम—
“ अस्या ऊषुणः ” ०-० [ ऋ०सं० २, २, २, ४ ]
अर्थात्-हे 'अजाश्व' हे पूषन् ! 'अस्याः' ( अस्यै ) इस 'सातये'
लब्धि के लिये ( जिस प्रकार हम वाञ्छित अर्थ को प्राप्त हों )
'नः' हमारे 'उप' समीप 'भुवः' ( भव ) हो । ( क्योंकि-आप के
निकट होनेसे हम इस वाञ्छित अर्थ को प्राप्त हो सकते हैं ।)
( कैसे पास आओ ? ) ‘ अहेलमानः ’ ( अक्रुध्यन् ) क्रोध न
करते हुए । ( क्योंकि-सभी याचना करने से क्रोधकरता है । )
(फिर कैसे आ ?) ‘ररिवाञ्’ दान के अभिप्राय से युक्त होकर
‘अजाश्व’ हे अजनाश्व ! (शीघ्र चलने वाले घोड़ों वाले !
अथवा छाग ( बकरा ) रूप घोड़े वाले ' ॥ (‘अ वस्यताम् धन
की इच्छा करते हुओं के 'अजाश्व' हे छाग अश्व वाले ! ॥ )
निरुक्तार्थ —इस लब्धिके लिए हमारे पास आ । 'अहेल-
मानः' नहीं क्रोध करता हुआ । 'ररिवान्' कैसे ? ('रा'अदा०
प०) धातु 'अभ्यस्त' या दोहराया हुआ है। ' अजाश्व ' यह
पूषादेव को कहता है । (अर्थ क्या ? ) अजनाश्व । 'अज नाम
अजन ( चलने वाले ) । अब अनुदात्त । —