निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 508, कुल 1282 में से
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हिन्दी निरुक्त \qquad ( ८६ ) \qquad ४ अ० ४ पा० ४ ख०
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पाप 'न' नहीं 'अश्नोति' व्यापता है। अंहति, अंहस्, अंहु
ये तीनों शब्द निरूढोपध 'हन्' (अदा० प०) धातुसे हैं। ['नि
रूढोपध' जिसका अन्तिम अक्षर से पहिला अक्षर आदि में
किया जावे ।] अर्थात् - 'हन्' धातु के अकार को आदि में
लाकर हकार नकार को उलटा कर 'अंह' रूपसे बनते हैं ।
'चयसे' (५८) (चातयति) अनवगत पद का निगम-
"बृहस्पते चयसे" ०-० [ऋ० सं० २,५,१२, ५]
अर्थात्-हे बृहस्पते ! दान, आदि गुणोंसे युक्त ! तू 'पियारुम्'
देवताओं के अपूजक को 'इत्' अवश्य 'चयसे' (नाशयसि) नाश
कर देता है।
निरुक्तार्थ-हे वृहस्पति देव ! जो तू देवताओं के अपूजक
को नाश करता है। 'पीय' धातु का हिंसा अर्थ है ।
'वियुते' (५६) मिलेहुए द्यावा-पृथिवी दोनों लोकों का
नाम है। क्यों ? वियवन या परस्पर दोनों को पृथक् होनेसे ।
निगम-
"समान्या वियुते" ०-० [ऋ० सं० ३, ३, २५, २]
अर्थात्-'वियुते' द्युलोक और पृथिवी लोक दोनों 'समान्या'
परिमाण में समान हैं, 'दूरे' दूरतक हैं, 'अन्ते' जगत् के अन्त
तक हैं। [अर्थात्-इन दोनों का ही अन्त नहीं मिलता ।]
'समान' क्यों ? सम्मानमात्र या तुल्य परिमाण होता है।
'मात्रा' क्यों ? मान से। 'दूर' शब्द की व्याख्या हो चुकी ।
'अन्त' 'अत्' (भ्वा० प०) धातु से है।
'ऋधक्' (६०)-यह जुड़े हुए हुए का नाम है। और 'ऋध्'
(स्वा०प०) धातु के अर्थ में देखा जाता है।
निगम-
"ऋधगया" ०-० [य० वा० सं० ८, २०]
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