निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ७६ ) ४ अ० ३ पा० ५ ख०
उत्पन्न करने वाला है । 'नाभि' नाभिदेश में बांधने वाला ।
इस द्यु लोक में अङ्ग सम्बन्ध को जोड़ने वाली यह बड़ी या
पूजनीय पृथिवी माता है । 'बन्धु' क्यों ? सम्बन्ध करने से ।
'नाभिः' क्यों? सन्नहन या बांध लेने से । [क्योंकि-] “ नाभि
[ सूंढी ] बंधे हुए गर्भ उत्पन्न होते हैं ” ऐसा विद्वान्
कहते हैं । इसी कारण से ज्जातियों को 'सनाभि' इस नाम से
बोलते हैं । और 'सम्बन्धु' यह भी (कहते हैं) 'ज्जाति' क्यों?
संज्ञान अच्छे प्रकार से ज्ञान या जानकारी से । ऊपर को
उठे हुए ःद्युलोक-पृथिवी लोक के बीच में अन्तरिक्ष है ।
उत्तान क्यों ? उत्तान है । अथवा ऊर्ध्वतान ऊपर
को तना हुआ है । उस में पिता पर्जन्य दुहिता [द्यु लोक
से जलको दोहने वाली] पृथिवी पर गर्भ धारण करता है ।
'शंयु.' (४८) अर्थात् सुखयु सुखी । निगम—
“अथानः शंयो ररपो दधात” [ऋ० सं० ७, ६,
१७, ७ ] । अर्थात्-हे पितरो ! ‘अथ’ और ‘नः’ हमारे अर्थ
'शम्' रोगों की निवृत्ति 'योः' भयों का नाश और 'अरपः' जो
कुछ पाप विना हित हो 'दधात' करो ।
निरुक्तार्थ-‘रपः’ 'रिम्रम्' यह दो पापके नाम हैं । शमन
रोगों का, और यावन ( भगाना ) भयों (डरों) का ।
और ‘शंयु’ वृहस्पति का पुत्र भी कहा जाता है । 'तत्'
( तदा ) तब ( हम ) ‘शंयोः’ वृहस्पति के पुत्र से 'आ-वृणी-
महे' सम्मुखभाव से मांगते हैं- ‘यज्ञाय’ यज्ञ के अर्थ 'गातुम्
देवताओं के प्रति जाने को, और ‘यज्ञपतये’ यजमान के
अर्थ ‘गातुम्’ देवताओं के प्रति जाने को । ' यह भी
निगम है ।