निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ८० ) ४ अ० ४ पा० १ खं०
निरुक्तार्थ—यज्ञ के लिये गमन । यज्ञपति (यजमान)
के लिये गमन ॥ ५ ( २१ ) ॥
इति चतुर्थाध्यायस्य तृतीयः पादः ॥ ४, ३ ॥
चतुर्थेऽध्याये-
चतुर्थः पादः ।
( १ खं० )
[ निरु० ] ‘ अदिति ’ (४१) अदीना देव-
माता ॥ १ ( २२ ) ॥
अनुवादः ।
‘अदिति’ यह अनवगत पद है । १ (२२)
क्योकि-इसमे प्रकृति और प्रत्यय तथा अर्थ की प्रतीति
नहीं होती । ‘अदीना’ इसका अवगम और देवमाता इसका अर्थ है ।
निरुक्तार्थ-अदिति (४६) क्यों ? वह अदीना है, दीन
नहीं है, वह क्या? देवमाता। [यह अर्थ ऐतिहासिक पक्ष से है]
नैरूक्तो के मत मे ‘अदिति’ शब्द के उतने ही अर्थ है, जितने कही जाने
वाली ऋचा में दिखाए है । अर्थात्-द्यौ, द्युलोक अन्तरिक्ष, माता, पिता, पुत्र,
विश्व सर्व देव, पञ्चजन [ गन्धर्व आदि या ब्राह्मण आदि ] जात, भूत
जनित्व, [ भविष्यत् । ]
( २ खं० )
१ [निरु०] अदितिर्द्यौरदिति रन्तरिक्ष मदितिर्माता-
१ “अदितिर्द्यौः” इति राहूगणस्य गोतमस्य इयमार्षम् ।
तृतीयसवने सर्वस्तोमेष्वेव, वैश्वदेवस्य शस्तस्य परिधानीया
एषा ।