सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 447, कुल 1282 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 447

हिन्दी निरुक्त ( २८ ) ४ अ० १ पा० ३ ख०
नोर्विभागः । मेथातः आक्रोशकर्मा । 'अपापकं
जघानकमहंजातु' । 'कोऽस्मद्भीतः पलायते' ।
निधा (२) पाश्या भवति । यन्निधीयते । 'पाश्या'
पाशसमूहः । 'पाशः' पाशयतेः । विपाशनात् ॥२॥
अनुवादः ।
मन्त्रार्थः-किस बिना गाली दिए हुए भी सखा या
समान ज्ञान वाले मनुष्य ने सखा या समान ज्ञान (पुरुष)
को कहा [कि-'मुझे मत मार'] कभी भी किस पाप रहित को
मैंने मारा ? कौन मुझ से डर कर भागता है या भागा ।
'निधा' (२) पाश्या होती है। [अर्थात् बालों का या
तांत का पक्षियों के पकड़ने का जाल] 'निधा' क्यों ? जिससे
कि-यह पक्षियों के पकड़ने के अर्थ नीचे रखी जाती है, एवम्
जो 'निधि' या 'निधानी' कहना चाहिये 'निधा' कही जाती
है । 'पाश्या' क्या ? पाशों (फांसियों) का समूह । 'पाश' क्यों?
वधार्थक पाश (चु० उ०) धातु से है। क्यों कि- उससे विपा-
शन या वध होता है ॥२॥
१ ( ख० ३ )
[निरु०-] " वयः सुपर्णा उपसेदुरिन्द्रं प्रियमे
धाऋषयो नाधमानाः । अपध्वान्त मूर्णहि पूर्द्धि
१-"वयः सुपर्णाः" इति मन्त्रस्य शाक्यो गौरिवित्तिर्ऋषिः
त्रिष्टुप् छन्दः । अग्निष्टोमे मरुत्वतीयशस्त्रस्य परिधानीया एषा
निविद्धानीये सूक्ते ॥३॥