निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 446, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( २७ ) ४ अ० १ पा० २ ख०
अनुवादः ।
"एकार्थ अनेक शब्द' हो, ऐसा प्रकरण कहा गया । ['ए-
कार्थ'-एक अर्थ पृथिवी आदि रूप अनेक गो आदि शब्दोंका
जहां तत्वभूत कहा जावे । 'अनेक शब्द' जहां अनेक गो आदि
शब्द पृथिवी आदि एक अर्थ के वाचक कहे जावें ।] अब जो
अनेकार्थ एक शब्द पद हैं, वे यहां से अनुक्रम से कहे जावेंगे ।
['अनेकार्थ'-जिन 'दयति' "अकूपार" आदि पदों के उपद्या,
दान दहन, और हिंसा आदि अनेक अर्थ वाच्य हैं । 'एक
शब्द'-जिन उपद्या, दान, दहन, और हिंसा आदि अनेक
अर्थों के दयति, अकूपार, आदि एक एक शब्द वाचक हैं वे
अर्थ मात्र ।] और अनवगत संस्कार, जिनके संस्कार या प्रकृति
प्रत्यय विभाग न जाने जावें, ऐसे निगमोंको कहेंगे । उस दोनों
प्रकार वाले प्रकरण को आचार्य 'ऐकपदिक' इस नाम से कहते
हैं [जैसे-] 'जहा' (१) का जघान या मारा यह अर्थ है ॥१॥
१ ( ख०२ )
[निरु०] “कोनुमर्य्या अमिशितः सखा सखाय-
मब्रवीत्। जहा को अस्मदीषते” [ऋ०सं०६,३,४९,२,]
मर्य्या इति मनुष्य नाम । मर्य्यादाभिधानं वा
स्यात् । मर्य्यादा (मर्यैरादीयते मर्य्यादा) मर्य्यादि-
१-“कोनुमर्य्या” [ ऋ० सं० ६, ३, ४९, २, ] इस मन्त्र
का त्रिशोक ऋषि । गायत्री छन्दः । महाव्रत में महदुक्थ में
तृचाशीति में शस्त्र है ॥ २ ॥