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सर्वकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 418, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 418

१२२ ३ अ० ४ पा० ५२ खं० ।
(ख) औपमन्यव आचार्य मानते हैं कि—शब्दके अनुकरण पर
कोई नाम नहीं होता, किन्तु सब नाम क्रियाके सम्बन्धसे धातु,
प्रत्यय आदि संस्कार युक्त होते हैं। उसके अनुसार अपने पक्षियों
तथा तिर्यक् (पशुओं) के कई नामोंकी व्युत्पत्ति भी दिखाई है।
जैसे—काक तित्तिरि, कपिञ्जल [पक्षी] श्वा, सिंह, व्याघ्र।
[पशु।]
यद्यपि निरुक्त शास्त्र वेदाङ्ग है, और वैदिक शब्दोंके निर्वचनके
अर्थ ही प्रवृत्त हुआ है, इससे इसमें सिंह, व्याघ्र, श्वा, काक ऐसे
अर्वाचीन नामोंकी व्याख्या आचार्यको नहीं करना चाहिये थी, किन्तु
निर्वचनके प्रकारको दिखानेके लिये कि-ऐसा भी निर्वचनका प्रकार
है, इन शब्दोंकी व्याख्या की है।
सिंह-‘सिंह’ शब्दमें ‘हिंस’ (रु० प०) धातुसे और सम्
(उप०) तथा हन् (आ० प०) धातुके मेलसे व्युत्पत्ति कह कर
दिखाया कि-शब्दोंके निर्वचन अनुलोम और प्रतिलोम दोनों प्रकार
से होते हैं। पहिले निर्वचनमें हिंस् धातुके आदिका अक्षर अन्तमें
आ जाता है और अन्तका आदिमें। इससे यह प्रतिलोम निर्वचन
हुआ। तथा दूसरेमें सकार, हकार दोनों अक्षर जहाँके तहाँ रहे
यही अनुलोम निर्वचनको प्रकार है। यह पक्ष वैयाकरणोंको भी
सम्मत है।
(३-१-५ खं०) इस खण्डसे पूर्व निघण्टु शास्त्रमें ऐसे ही नाम
दिये हैं, जो एक एक वस्तुके बहुत बहुत नाम हैं, किन्तु यहाँसे ३
य ४र्थ, ५म खण्डोंमें एक एक वस्तुके दो दो नाम हैं, उनकी
व्याख्या की है। एवम् इन्हीं शब्दोंके साथ नैघण्टुक काण्डकी
समाप्ति भी हो जाती है। इसके आगे चौथे अध्यायसे दूसरा
नैगम काण्ड आरम्भ होगा।
“अमैनांश्चित्” मन्त्रसे अमैथुन सृष्टि जो पुराणोंमें प्रसिद्ध है,
प्रमाणित होती है।