निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त । १११
इस प्रकार यह नैघण्टुक काण्ड समाप्त हुआ । इससे आगे
‘ऐकपदिक’ या ‘नैगम’ प्रकरण होगा । जिसका पहिला वाक्य
‘एकार्थमनेकशब्दम्’ यह है इति ।
व्याख्या ।
( १ अ० ) उपमा दो प्रकार से आती है, एक शब्दोपमा जो पूर्व
पादमें विस्तारसे दिखाई गई है ! दूसरी लुप्तोपमा या अर्थो-
पमा, हैं । उपमाके स्थलमें उपमाके वाचक ‘इव’ आदि शब्दोंके
रहनेसे शब्दोपमा होती है और इन्हीं इव आदि शब्दोंके लोपसे
उपमा लुप्तोपमा कही जाती है । एवम् उपमा वाचक शब्दके न
रहनेसे भी उसका अर्थ जो सादृश्य है प्रतीत होता है, इससे वही
‘अर्थोपमा’ कहलाती है । जैसे—‘सिंहो देवदत्तः’ अर्थात् सिंह
सदृश देवदत्त है । यहाँ सिंह पदके आगे इव आदि उपमा वाचक
शब्दके न रहनेसे भी उसका अर्थ सादृश्य प्रतीत होता है ।”
अर्थोपमा दो प्रकारकी होती है, एक प्रशंसा में, और दूसरी
निन्दामें । प्रशंसाके लिये ‘सिंह’ ‘व्याघ्र’ आदि शब्द दिये जाते
हैं और निन्दाके लिये ‘श्वा’ ( कुत्ता ) ‘काक’ आदि शब्द होते हैं ।
जैसे ‘श्वा पुरुषः’ कुत्ते जैसा पुरुष है, इत्यादि—
यद्यपि निघण्टुशास्त्रमें शब्दोपमाका ही पाठ है, किन्तु लुप्तोपमा-
का नहीं इससे यहाँ भाष्यमें इसके दिखानेकी आवश्यकता नहीं
थी, तथापि भाष्य ग्रन्थ विषयको विस्तारसे वर्णनके लिये ही होता
है, अतः अवसर पानेसे अर्थोपमाका व्याख्यान भी कर दिया
गया है ।
पक्षियोंके नामोंमें दो पक्ष हैं । (क) बहुत निरुक्ताचार्य मानते
हैं कि-प्राय करके पक्षियोंके नाम शब्दके अनुकरण पर ही हैं, अर्थात्
अर्थात् जो पक्षी जैसा शब्द करता है उसका नाम उसके समान ही
होता है । जैसे काक ‘काँकाँ’ शब्द करता है इसीसे उसका नाम
‘काक’ है ।