सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 419, कुल 1282 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 419

“ग्नास्त्वा” से वस्त्रके तैयार करनेकी क्रियाएं तथा उसमें स्त्री,
बालक एवम् पुरुषोंका पृथक् पृथक् उपयोग दिखाया है ।
“पोयतिवा” मन्त्रमें राम कृष्ण आदि अवतारोंके होनेकी
सूचना, तथा उनसे असुरोंके प्रतिकूल और सुरोंके अनुकूल बर्तावकी
स्वाभाविकता आती है । ऐसी ऐसी अनेक बातें मन्त्रोंसे मिल
सकती हैं, किन्तु अध्ययन करने वालेकी बुद्धि और ध्यान पर
निर्भर है ।
इति हिन्दी निरुक्ते तृतीयाध्यायस्य चतुर्थः पादः समाप्तः
॥ ३, ४ ॥
निरुक्तके तृतीयाध्यायका खण्ड सूत्र—
[प्र० पा०] कर्मनामानि (१) परिषद्यं (२) नहिय-
भाय (३) शासद्वन्हिः (४) अभ्रातेव (५) न जामये (६)
[द्वि० पा०] मनुष्य-नामानि (७) तदद्य (८) दृषाव-
निभ्यः (६) अभ्रातृं (१०) त्वयावयं (११) यथा सुपर्णा
(१२) [तृ० पा०] बहुनामानि (१३) तनुत्यजे (१४)
कुहश्चित् (१५) चतुरश्चित् (१६) प्रियमेधवत् (१७)
[च० पो०] अथ लुप्तोपमानि (१८) अर्वंति (१९) दिशो
(२०) रम्भः (२१) कतरा पूर्वा (२२) द्वाविंशतिः ॥
इति निरुक्ते पूर्वषट्के तृतीयोऽध्यायः ॥३॥
(नैघण्टुकं काण्डं समाप्तम् ।)
इति हिन्दी निरुक्ते तृतीयोऽध्यायः समाप्तः ॥३॥
(नैघण्टुकं काण्डं समाप्तम् ।)