निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११६ २ अ० ६ पा० ५ खं० ।
सकता, अर्थात् कौन कह सकता है वे कितनो हैं, इसी प्रकार वेदि-
तव्या नामसे मन्त्रमें अनन्त अर्थ लिया गया है ।
( निरु० ) [ क्योंकि-मेघ रात्रि और दिनमें ही होते हैं, इससे
उनके ] पश्चात् तीस मेघके नाम हैं । 'मेघ' शब्द किस निर्वचनसे
है ? 'मेहति' सेचन करता है, इस कर्त्तृ वाच्य ( 'मिह' सेचने )
( भ्वा० प० ) धातुसे है । मेघ नामोंमें 'उपर' उपल' इन दो नामोंसे
पूर्व सब नाम पर्वतनामोके साथ साधारण हैं । अर्थात् मेघ और
पर्वत दोनोंके नाम हैं । 'उपर' और 'उपल' मेघ होता है । क्योंकि
इसमें अभ्र ( मेघ ) उपरत या आकर स्थित होते हैं । अथवा इसमें
जल उपरत होते हैं । र और ल के अभेदसे 'उपर' शब्दसे ही
‘उपल’ शब्द बन जाता है । उन मेघोंकी 'उपर' शब्द वाच्यतामें
विशेष लिङ्गको बतानेवाली यह ऋचा है—॥ ४ ॥
( खण्ड ५ )
( निरु० ) “देवा॒नां मा॒ने प्रथ॒मा अतिष्ठन्
कृन्तत्रा॑देषामु॒परा॑ उ॒दाय॑न् । त्रय॑स्तपन्ति पृथि॒वी-
मनू॑पा द्वौ बृ॒बूकं॑ वहतः पुरी॒षम् ॥
‘ [ ऋ० स० ७, ७, १६, ३ ]
“देवा॒नां” निर्माणे “प्रथ॒मा अतिष्ठन्” मा-
ध्यमिका देवगणाः । ‘प्रथस’ इति मुख्यनाम ।
प्रतमो भवति । विकर्त्तनेन मेघानामुदकं जायते ।
“त्रय॑स्तपन्ति पृथिवीमनूपाः” पर्जन्यो वायु रा-
दित्यः शीतोष्णवर्षैः ओषधीः पाचयन्ति ‘अनूपाः’
अनुवपन्ति लोकान् स्वेन स्वेन कर्मणा । त्रयमपि